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ताना बाना

'दुनिया बदल सकते हैं प्यार और फुटबॉल'

ईरान के करिश्माई फुटबॉल कोच आफशिन घोतबी कहते हैं कि दुनिया में बस प्यार और फुटबॉल फैला दीजिए, सब ठीक हो जाएगा. खुद को ग्लोबल सिटीजन बताने वाले घोतबी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी बेबाक राय देने के लिए मशहूर हैं.

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ईरानी कोच का मानना है कि फुटबॉल का खेल और खुला दिल कई देशों को करीब लाता है. 48 साल के ईरानी कोच कहते हैं, ''2002 में फीफा ने जापान और कोरिया को लाकर बहुत बढ़िया काम किया. अब 2022 के बारे में जब मैं सोचता हूं तो लगता है कि पश्चिमी दुनिया और मध्य पूर्व का एक दूसरे के करीब आएंगे.''

प्रेम में

अमेरिका में रहने वाले ईरानी मूल के नागरिक घोतबी का फुटबॉल और जीवन के बारे में सोच उनके साथियों से बिलकुल अलग है. वह गूस हिडनिक कोचिंग स्टाफ के प्रमुख थे जब 2002 में दक्षिण कोरिया विश्व कप के फाइनल में पहुंचा था. एशिया कप जैसे ही खत्म होगा होगा वह सुदूर पूर्व में जे लीग में शिमजू एस पल्स को प्रशिक्षण देने चले जाएंगे. लेकिन उससे पहले उनकी तमन्ना है कि ईरान के प्रशिक्षक की हैसियत से वह एशिया कप को 35 साल बाद फिर से ईरान में ले कर आएं.

अच्छा फैसला

घोतबी को खुशी है कि फीफा ने 2022 का फुटबॉल विश्व कप बदलाव के लिए कतर के नाम किया है. "मुझे लगता है कि 2002 में फुटबॉल वर्ल्ड कप कोरिया और जापान में ला कर फीफा ने बहुत अच्छा काम किया था. क्योंकि इस कारण फुटबॉल का चलन इन दोनों देशों में बढ़ा."

Afshin Ghotbi

2022 में फुटबॉल कतर में लाने से दुनिया की मध्य पूर्व के बारे में समझ बढ़ेगी. "पश्चिमी दुनिया को समझ में आएगा कि वह हमसे अलग नहीं हैं. उनके भी बच्चे हैं, उम्मीदे हैं सपने हैं. उन्हें भी लोगों से मिलना अच्छा लगता है और खाना भी बहुत पसंद है. मेरे अनुभव के मुताबिक दुनिया में दो ही चीजे हैं जो दुनिया को जोडती हैं और वह हैं प्रेम और फुटबॉल."

जुनून

घोतबी कोई रूमानी ख्वाब देखने वालों में से नहीं नहीं हैं और न ही वह आदर्शवादी हैं. वह एक जुनूनी इंसान हैं जो तीन साल की उम्र में ही फुटबॉल के प्रेम में पड़ गए और खराब मोजो, प्लास्टिक की थैलियों, कपड़े की चिंदियों से बनी फुटबॉल को किक करना शुरू किया. 1977 में 13 साल की उम्र में घोतबी अपने परिवार के साथ ईरान से बाहर चले आए और कैलिफोर्निया में रहने लगे. बस यहीं से उनकी फुटबॉल में भागीदारी शुरू हुई. घोतबी कहते हैं, "मैं बहुत किस्मतवाला था जिसे अपना जुनून तीन साल की उम्र में ही मिल गया, जब मैंने पहली बार बॉल को किक किया. तब ही से मैं फुटबॉलर बनना चाहता था. मैं हमेशा फुटबॉल का छात्र बना रहा. मुझे लगता है कि जब आप सीखना छोड़ देते हैं तो आप शिक्षक भी नहीं बन सकते."

लौट आने की सलाह

घोतबी ने हिडिंक, बोरा मिलुतिनोविक, पिम वरबेक, डिक एड्वोकाट जैसे ओल्ड मास्टर्स से फुटबॉल सीखा है. यही ज्ञान उन्हें ईरान में काम आया जब पर्सोपोलिस के प्रशिक्षक के तौर पर टीम ने अपना पहला टाइटल जीता.

घोतबी मानते हैं कि जब वह लौटे तो खुद को एक पूरा व्यक्ति पाया. वह कहते हैं, "मैं उन लोगों को देश लौटने को कहूंगा जो कई साल से अपना देश छोड़ कहीं और जा बसे हैं. उन्हें अपनी जड़ें मिलेंगी. यह किसी भी व्यक्ति के बहुत सुकून भरा अनुभव होता है." फिलहाल घोतबी की एक ही इच्छा है 1976 के बाद अब ईरान में एशिया कप को फिर से लाना.

रिपोर्टः एजेंसियां/आभा एम

संपादनः ओ सिंह

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