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दुनिया

दिल्ली में इंसान और बंदरों का टकराव

आए दिन ऐसे मामले सामने आते हैं जब बंदर लोगों का फोन तोड़ देते हैं, खाना चुरा लेते हैं या फिर हमला कर देते हैं. 2007 में शहर के बाहर बंदरों के लिए एक अभ्यारण बनाया गया लेकिन इससे समस्या सुलझी नहीं, बल्कि उलझ गई है.

दिल्ली के दक्षिण पश्चिमी इलाके के गांव भट्टीकलां में इन दिनों बंदरों का आतंक है. इस गांव के निकट ही एक वन्यजीव अभयारण्य है लेकिन ये बंदर अभयारण्य में रहने की बजाय पूरे शहर में घूमते रहते हैं. बंदरों से परेशान गांव की एक महिला काली देवी अपने दो टूटे मोबाइल हैंडसेट दिखा कर बंदरों के आतंक की कहानी बयां कर रही है. काली के पति इंद्रपाल ने बताया, "ये बंदर खाने की तलाश में रहते हैं और जो कुछ भी इनके हाथ में आता है उसे झपट लेते हैं. बच्चों को अकसर निशाना बनाते हैं और महिलाएं भी इनसे नहीं बच पातीं. लेकिन ये बंदर पुरूषों से कम उलझते हैं." बंदर घरों में भी घुस जाते हैं. इसलिए इंद्रपाल के परिवार ने अपनी छत पर कांटेदार तार को लगा दिया है. बंदरों से सिर्फ गांव का यही परिवार त्रस्त नहीं है. हाल में इनके पड़ोसी की बेटी को बंदर ने काट लिया था, जिसके बाद उसे मुफ्त इलाज के लिए गांव से 20 किलोमीटर दूर ले जाया गया. वहां उसे रेबीज, टिटनेस और अन्य बीमारियों से बचाने के लिए नौ इंजेक्शन लगाए गए. गांववालों ने बताया कि यहां के स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में बंदर के काटने पर इलाज का कोई इंतजाम नहीं है.

इंसानों और बंदरों के बीच हो रहे इस संघर्ष का बड़ा कारण देश में तेजी से हो रहा शहरीकरण है. इंसानी बस्तियां जंगलों तक पहुंच गई हैं. पहले तो बहुत से हिंदू लोग इन बंदरों को हनुमान का रूप मानकर केले जैसे फल देते थे लेकिन जल्द ही इन्हें अहसास हुआ कि हनुमान के इस अवतार का बार-बार आना भी अच्छा नहीं है.  

कभी आम लोगों को बंदरों के साथ रहने की वकालत करने वाली प्राइमेटोलोजिस्ट इकबाल मलिक भी मानती हैं कि अब इंसानों का बंदरों के साथ रहना संभव नहीं है. वहीं दिल्ली सरकार ने बंदरों को पकड़ने के लिए साल 2001 से पेशेवर लोगों की नियुक्ति शुरू की. पहले बंदरों को पकड़कर पिंजरों में रखा जाता था लेकिन बाद भी इन्हें बेतरतीब ढंग से छोड़ दिया जाता था.

साल 2005 में दो ट्रक भरकर बंदरों को मध्यप्रदेश भी भेज दिया गया था. दिल्ली के वन्यजीव विभाग में काम कर रहे वन्यजीव इंस्पेक्टर वेराकन्नू भार्तयदर्शन इसे एक अच्छा उपाय बताते हैं. उन्होंने बताया कि बंदर परेशानी खड़ी करते हैं इसलिए अब कोई भी राज्य दिल्ली के बंदरों को नहीं चाहता.  

वर्ष 2007 में 4800 एकड़ जगह पर असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य तैयार किया गया था. लेकिन 10 साल बाद भी दक्षिण दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के मुताबिक यह पूरी तरह तैयार नहीं है. नतीजन आज भी असोला भट्टी के आसपास दिल्ली के ये बंदर आज भी आतंक मचा रहे हैं.

वातावरण नाम का एनजीओ चलाने वाली इकबाल मलिक के मुताबिक, इस समस्या का मूल कारण अभयारण्य का अधूरा होना नहीं है. वर्ष 2007 से 2015 के बीच अभयारण्य करीब 8 करोड़ रुपये बंदरों के खाने पर खर्च किए गए और रोजाना फलों और सब्जियों के ट्रक भेजे गए. मलिक बताती हैं कि पौधों के लिए नर्सरी तैयार की गई लेकिन इन्हें बंदरों के स्थान से दूर नहीं रखा गया और आज बंदर इन्हें उजाड़ रहे हैं. 

1980 के दशक में लोगों को बंदरों के साथ रहने का सुझाव देने वाली मलिक आज स्वयं इसे असंभव मानती हैं. इंस्पेक्टर भार्तयदर्शन के मुताबिक जो विभाग इस अभयारण्य की जिम्मेदारी संभाल रहा है उसमें लोगों की कमी है और आज यहां कम से कम 60 से 75 अधिकारियों की आवश्यकता है. फिलहाल इस अभयारण्य में भार्तयदर्शन समेत दो ही इंस्पेक्टर काम कर रहे हैं. बंदरों को पकड़कर इधर-उधर भेजने की बजाय भर्तयदर्शन का मानना है कि बंदरों की आबादी पर लगाम कसने जैसे उपायों को अपनाया जाना चाहिए.

दिल्ली में बंदरों की कुल आबादी तकरीबन 7 हजार है. पिछले साल जुलाई में संसद की लाइब्रेरी को भी बंदरों ने नहीं बख्शा था. हालांकि भट्टी कलां के लोगों के लिए अब बंदरों की यह समस्या रोजाना होने वाली घटना बन चुका है. वहीं बंदरों के पास भी कहीं और जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.

एलिटा आंद्रे, अभिमन्यु कुमार

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