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दुनिया

दिलचस्प है पुडुचेरी की राजनीति

असम और पश्चिम बंगाल में मतदान हो चुका है. अब केरल के अलावा तमिलनाडु और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में चुनाव होने हैं. लेकिन इनमें से पुडुचेरी ही अकेला ऐसा राज्य है जिसका चुनावी एजेंडा पड़ोसी राज्यों से तय होता है.

पुडुचेरी विधानसभा की 30 सीटें हैं जिनके लिए 16 मई को मतदान होगा. इस केंद्रशासित प्रदेश के चार क्षेत्र अलग-अलग राज्यों में पड़ते हैं और वे एक-दूसरे से भौगोलिक रूप से जुड़े नहीं हैं. यह चारों जिले एक-दूसरे से काफी दूरी पर हैं. यही वजह है कि उन इलाकों में चुनावी हवा संबंधित राज्यों के राजनीतिक समीकरणों से तय होती है. राजधानी पुडुचेरी और उससे सटे कराईकल के वोटर तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित होते हैं तो केरल के चुनावी मुद्दे माहे को प्रभावित करते हैं. इसी तरह यनम को आंध्रप्रदेश का उपनगर कहा जा सकता है. यहां एन. रंगास्वामी की अगुवाई में आल इंडिया एन.आर. कांग्रेस (एआईएनआरसी) की सरकार है. यह कहा जा सकता है कि इस केंद्रशासित प्रदेश में अपना कोई खास निजी मुद्दा नहीं है. बावजूद इसके दूसरे राज्यों की तरह यहां की राजनीति भी गुटबाजी, भाई-भतीजावाद और अक्सर बदलते गठजोड़ से अछूती नहीं है.

कांग्रेस का वर्चस्व

पुडुचेरी व कराईकल में डीएमके और अन्ना डीएमके कांग्रेस के बाद सबसे प्रभावी दल हैं. यहां कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसकी सरकारों ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है. अब उससे टूट कर बनी एआईएनआरसी ऐसी दूसरी पार्टी बन गई है. यनम में स्थानीय विधायक मलाडी कृष्णा राव ही राजनीति का पर्याय हैं. वे दो बार कांग्रेस के टिकट पर जीत चुके हैं और दो बार निर्दलीय के तौर पर. लगभग 36 हजार वोटरों वाले इस विधानसभा क्षेत्र में किसी भी राजनीतिक दल का कोई आधार नहीं है. मुख्यालय पुडुचेरी में कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी है. लेकिन इसके नेता अक्सर दल बदलने की वजह से सुर्खियों में रहते हैं.

Sri Aurobindo

ऑरोबिंदो आश्रम की वजह से मशहूर

केरल के कन्नूर व कालीकट जिले के बीच स्थित माहे इलाका विकास के मामले में पुडुचेरी व यनम के मुकाबले पिछड़ा है. यह इलाका आसपास होने वाली राजनीतिक हिंसा से भी प्रभावित है. महज नौ वर्गकिलोमीटर में फैले इस इलाके में 29 हजार वोटर हैं. पहले यहां विधानसभा की दो सीटें थीं. लेकिन परिसीमन के बाद उनका आपस में विलय हो गया. यहां मुकाबला सीपीएम और कांग्रेस के बीच है. कांग्रेस के ई वलसाराज छह बार यहां विधायक रहे हैं. उनके मुकाबले सीपीएम रामचंद्रन नामक एक निर्दलीय का समर्थन कर रही है.

विकास का मुद्दा

लंबे अरसे तक फ्रेंच कालोनी रहे इस छोटे-से केंद्रशासित प्रदेश में विकास ही मुद्दा है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि फ्रांस की विरासत का हवाला देते हुए कोई भी राजनीतिक पार्टी यहां शराबबंदी का जिक्र नहीं कर रही है. यह इलाका वर्ष 1674 में फ्रेंच कालोनी बना था. आजादी के कोई 15 साल बाद 16 अगस्त, 1962 को इसे भारत के हाथों सौंपा गया था. इस राज्य की आबादी में 87 फीसदी हिंदू हैं. राज्य में साक्षरता दर 86.6 फीसदी है.

मौजूदा मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी वर्ष 2006 से 2011 तक कांग्रेस में थे. लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने एआईएनआरसी का गठन कर एआईडीएमके से हाथ मिला लिया था. तब एआईएनआरसी को 30 में 15 सीटें मिली थीं. एआईडीएमके ने पांच, कांग्रेस ने सात और डीएमके ने दो सीटें जीती थीं जबकि एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी. लेकिन रंगास्वामी ने एआईडीएमके को छोड़ कर निर्दलीय विधायक के समर्थन से सरकार का गठन किया था. तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले रंगास्वामी को अबकी एक ओर कांग्रेस-डीएमके गठबंधन से जूझना पड़ रहा है तो दूसरी ओर अपनी पूर्व सहयोगी एआईडीएमके से.

दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री रंगास्वामी अपने तमाम राजनीतिक फैसले अपने दो स्वर्गीय गुरुओं के आदेश पर ही करते हैं. वे राजनीति में अपनी कामयाबी का श्रेय भी अपने इन गुरुओं को ही देते हैं. वर्ष 2011 में नई पार्टी का गठन भी उन्होंने इन गुरुओं की ओर से मिले कथित आदेश के बाद ही किया था. मुख्यमंत्री रंगास्वामी कहते हैं, "हमारी पार्टी दूसरी बार विधानसभा चुनाव लड़ रही है. राज्य के लोगों को हम पर पूरा भरोसा है."

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