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दुनिया

दिन में दफ्तर, रात को डिस्को

दिल्ली के महंगे इलाके में एक तीन मंजिला इमारत है. कुछ लोग कहते हैं कि वह डिस्को है. कुछ कहते हैं रेस्तरां है और कुछ कहते हैं कि वह एक दफ्तर है. असल में सब ठीक कह रहे हैं. इमारत है ही ऐसी.

दक्षिण दिल्ली के हौज खास विलेज में खड़ी इस तिमंजिला बिल्डिंग का नाम है सोशल. शनिवार आते ही इमारत थिरकने लगती है. वीकेंड पर वह एक बार और डिस्को में तब्दील हो जाती है. रात एक बजे तक डांस होता है. रविवार रात पार्टी खत्म होने के बाद पूरे फर्श की सफाई की जाती है. सारी टेबलें चमकायी जाती हैं. पार्टी का नामोनिशान मिटा दिया जाता है. और फिर सोमवार आते आते इमारत फिर से ऑफिस में बदल जाती है.

ऑफिस भी अलग अंदाज वाला है. वहां एक साथ फोटोग्राफर, डिजायनर, पत्रकार और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर काम करते हैं. काम के दौरान वे एक दूसरे के आइडियाज पर लगातार बातचीत भी करते हैं. वहां काम करने वाला हर शख्स या तो फ्रीलांसर है या फिर स्टार्ट अप वाला युवा उद्यमी.

भारत इस वक्त टेक स्टार्ट अप के मामले में सबसे तेजी से उभरने वाले देशों में है. युवा पीढ़ी के कारोबारी सपनों का असर ऐसे दफ्तरों में दिख रहा है. यहां कोई पद या जूनियर और सीनियर जैसी बात नहीं है. दफ्तर और बार का मिलाजुला माहौल काफी रिलेक्स करने वाले दिखता है.

29 साल की दिनशा सचान पेशे से फ्रीलांस पत्रकार हैं. वह सोशल में काम करती हैं, "लोग अपने दफ्तरों में रेंडम बॉस के सामने नहीं झुकना चाहते हैं. वे अर्थपूर्ण काम करना चाहते हैं. इसीलिए, मुझे लगता है कि को-वर्किंग स्पेसेज ऐसे लोगों के लिए सुनहरा अवसर हैं."

भारत में पहला कोवर्किंग दफ्तर करीब तीन साल पहले शुरू हुआ. लेकिन अब दिल्ली, मुंबई, हैदारबाद और बेंगलुरु में ऐसे कई दफ्तर हैं. देश में 2015 के अंत तक फोन ऐप्स या वेब सर्विसेज देने वाली 4,200 टेक कंपनियां थीं. नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज के मुताबिक टेक स्टार्ट अप के मामले में भारत से आगे सिर्फ अमेरिका और यूके हैं. नैसकॉम के मुताबिक अब विदेशी निवेशक भी भारतीय स्टार्ट अप्स में पैसा लगा रहे हैं. साल भर के भीतर फंडिंग में 125 फीसदी का उछाल आया है. फरवरी 2017 तक 70 करो़ड़ डॉलर के नए निवेश की उम्मीद है.

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सोशल के मालिक रियाज अलमानी के मुताबिक दिल्ली के अहम इलाके में सस्ते ऑफिस की जरूरत कई लोग महसूस कर रहे थे. उन्होंने इसे अपने रेस्तरां के कॉन्सेप्ट से जोड़ा और को-वर्किंग स्पेस बना दिया. अब भारत में सोशल के 14 ऐसे दफ्तर हैं, जहां कई क्षेत्रों के लोग साथ बैठकर अपना अपना काम करते हैं. 41 साल के अलमानी कहते हैं, "दफ्तर तेजी से कैफे जैसे बनते जा रहे हैं, मैं सही कह रहा हूं ना? गूगल, याहू, फेसबुक, ट्विटर को देखिये. अगर आप पारंपरिक दफ्तर के माहौल में हैं तो वह काफी बेजान सा होता है. वहां बहुत ज्यादा वरीयताक्रम होता है. आपकी अहमियत वर्गफुट के हिसाब से नापी जाती है."

दूसरी तरफ को-वर्किंग स्पेस युवाओं को आकर्षित करने वाला है. भारत के ज्यादातर स्टार्ट अप ऐसे युवाओं ने शुरू किये हैं जो 28 साल से छोटे हैं. इनमें से ज्यादातर बड़े शहर के कामकाजी इलाकों में महंगा ऑफिस नहीं ले सकते हैं. वहीं सोशल जैसे को-वर्किंग दफ्तरों में मेम्बरशिप फीस 100 डॉलर प्रतिमाह से भी कम है. इंटरनेट मुफ्त है. साथ में नेटवर्किंग इवेंट्स, निवेशकों की कॉन्फ्रेंस और पार्टियों का न्योता मुफ्त मिलता है. सोशल के सदस्यों को लॉकर भी मिलते हैं साथ ही खाने पीने की चीजों पर प्वाइंट भी मिलते हैं.

25 साल के ऋषि जालान ने दो साल पहले स्टूडेंट एथलीट्स के लिए एक स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी बनाई. वह भी हौज खास की सोशल इमारत में अपना दफ्तर जमाए बैठे हैं. माहौल के बारे में ऋषि कहते हैं, विचारों का उन्मुक्त प्रवाह प्रेरणा देता है, "मैं अपने कई दोस्तों को जानता हूं जो को-वर्किंग स्पेस में गए और वहां उन्हें अपने कारोबार के लिए उप संस्थापक मिले."

जलान की ही तरह कई युवा भारतीय पारंपरिक नौकरी से तौबा कर रहे हैं. कम तनख्वाह या एंट्री लेवल जॉब के बजाए अपना बिजनेस शुरू करना चाहते हैं.

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ओएसजे/एमजे (एपी)

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