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दुनिया

दावुतोग्लू के लिए चुनौती और मौका

तुर्की के प्रधानमंत्री अहमत दावुतोग्लू के लिए ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ शरणार्थी संकट पर बातचीत रूटीन नहीं है. यह उनके लिए क्षमता दिखाने का मौका है, सिर्फ यूरोप को नहीं बल्कि अपने नेता एरदोवान को भी.

राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रहे 57 वर्षीय दावुतोग्लू पेशेवर राजनीतिज्ञ नहीं हैं. उन्होंने एक दशक पहले अपने करियर की शुरुआत एरदोवान के सलाहकार के रूप में की और उसके बाद लगातार सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते गए हैं. छह साल तक एरदोवान के विदेश नीति सलाहकार रहने के बाद उन्होंने स्वयं विदेश मंत्रालय संभाला और देश की नई विदेश नीति की नींव रखी. उसके बाद से तुर्की अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिक आत्मविश्वास के साथ पेश आ रहा है.

भरोसेमंद लेकिन निष्क्रिय राष्ट्र वाली तुर्की की छवि पुरानी हो चुकी है. कुछ साल पहले दावुतोग्लू ने कहा था, "मध्यपूर्व में तुर्की को पता चले बिना एक पत्ता तक नहीं हिल सकता." उनके नेतृत्व में तुर्की की इस्लामी सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड और सीरियाई विपक्ष जैसे सुन्नी संगठनों को मदद दी है. आलोचकों का उनपर आरोप है कि सीरिया विवाद में पक्ष लेकर और अक्सर हठी व्यवहार के साथ उन्होंने तुर्की को अलग थलग कर दिया है. मध्यपूर्व में अब तुर्की के साथी से ज्यादा दुश्मन और प्रतिद्वंद्वी हैं.

दो साल पहले दावुतोग्लू के करियर का चरमोत्कर्ष तब दिखा जब इस्लामी पार्टी एकेपी के नेता रेचेप तय्यप एरदोवान ने राष्ट्रपति बनने का फैसला किया. प्रधानमंत्री की कुर्सी और पार्टी की अध्यक्षता अपने विश्वासपात्र दावुतोग्लू को सौंप दी. लेकिन सत्ता के सूत्र अभी भी एरदोवान के हाथों में हैं और उनके सलाहकारों की मंडली सुपर सरकार का काम करती है. लेकिन पिछले दिनों में दावुतोग्लू एरदोवान से स्वतंत्र होने के संकेत दे रहे हैं. देश में राष्ट्रपति व्यवस्था लागू करने के मुद्दे पर वे एरदोवान के साथ पूरी तरह नहीं हैं.

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल और यूरोपीय संघ के दूसरे नेताओं के साथ शरणार्थी मुद्दे पर बातचीत के दौरान अंग्रेजी और अरबी के अलावा जर्मन बोलने वाले दावुतोग्लू ज्यादा समझौतावादी रुख दिखा रहे हैं. यदि वे यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ बातचीत में तुर्की के लिए ईयू में वीजा की जरूरत खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर पाते हैं तो यह उनके लिए घरेलू मोर्चे पर महत्वपूर्ण जीत होगी. दूसरी ओर उन्हें इस बात का पूरा अहसास है कि यूरोपीय संघ को इस समय तुर्की की जरूरत है. और ये आत्मविश्वास यूरोपीय नेताओं के साथ ब्रसेल्स में उनकी बातचीत में झलक रहा था. शरणार्थी संकट दावुतोग्लू के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा मौका भी है.

एमजे/एसएफ (एएफपी)

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