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ब्लॉग

दाल में कुछ काला तो है

भारत की पहली सरकार द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस के परिवार की जासूसी का खुलासा देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व के नए पहलू को दिखाता है. पत्रकार प्रभाकर का कहना है कि कोई कुछ छुपा जरूर रहा है.

तो क्या भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सचमुच सुभाषचंद्र बोस के परिजनों की कोई दो दशकों तक जासूस कराई थी? खुफिया फाइलों के हवाले एक टीवी चैनल की खबर में अगर जरा भी सच्चाई है तो यह मामला भारत के इतिहास में दो जानी-मानी हस्तियों के आपसी संबंधों में एक नया और कड़वा अध्याय साबित हो सकता है. अब इस मामले के खुलासे के बाद देश के राजनीतिक हलकों में एक नया तूफान पैदा हो गया है. खुफिया एजेंसियों ने जहां फाइलों के सार्वजनिक होने का खंडन किया है, वहीं कांग्रेस ने जासूसी के आरोपों को सिरे से ही खारिज कर दिया है. जहां तक दूसरे दलों का सवाल है, वह सब कांग्रेस के दागदार अतीत के हवाले उस पर हमले करने में जुट गई हैं. दूसरी ओर, नेताजी के परिजनों ने इस पर हैरानी जताते हुए इस मामले से संबधित तमाम फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है.

वैसे, यह तथ्य तो जगजाहिर है कि नेहरू और बोस के आपसी संबंध उतने अच्छे नहीं थे. उन दोनों में वैसे तो कई मुद्दों पर मतभेद था, लेकिन सबसे बड़ा मतभेद आजादी के तरीके को लेकर था. ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अगर बोस की चली होती तो भारत दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वर्ष 1939 में ही ब्रिटिश शासन से आजाद हो गया होता. लेकिन नेहरू के आगे उनकी नहीं चली. जानकारों का कहना है कि नेहरू को बोस की विमान हादसे में मौत की खबर पर पूरी तरह भरोसा नहीं था. इसके साथ ही उनको डर था कि देश की आजादी के बाद भी अगर नेताजी सामने आ गए तो कई राज बेनकाब हो सकते हैं. इसलिए तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति में उन्होंने वही किया जो उनकी जगह कोई भी नेता करता. इसी वजह से यह खबर आश्चर्यजनक तो है, लेकिन उतनी नहीं चौंकाती. हां, इससे नेहरू के व्यक्तित्व के एक नए और अनजाने पहलू का खुलासा जरूर हुआ है.

नेताजी की मौत का यकीन तो उनके परिजनों और उनके द्वारा स्थापित फॉरवर्ड ब्लॉक को भी नहीं है. इसलिए उनकी मौत से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग लगातार उठती रही है. लेकिन 'चोर-चोर मौसेरे भाई' की तर्ज पर पहले कांग्रेस और उसके बाद भाजपा सरकारें ऐसा करने से बचती रही हैं. अब इस मामले के खुलासे के बाद लगने लगा है कि इस तरह की विस्फोटक सूचनाओं को दबाने के लिए तमाम सरकारें पड़ोसियों के साथ संबंध बिगड़ने का हवाला देकर इन फाइलों को सार्वजनिक करने से बचती रही हैं. विपक्ष में इन फाइलों को सार्वजनिक करने की जोरदार मांग उठाने वाली भाजपा ने भी सत्ता में आते ही अपना सुर बदल लिया.

नेहरू को शायद डर था कि नेताजी अगर कहीं जीवित हुए तो अपने परिजनों से कभी न कभी संपर्क जरूर करेंगे. इसी वजह से उन्होंने कोलकाता में उनके दो आवासों की लगभग दो दशक तक जासूसी कराई. खुफिया विभाग इस मुद्दे पर सीधे नेहरू को ही रिपोर्ट देता था. नेहरू की मौत के चार साल बाद आखिर यह सिलसिला बंद हुआ. अब इस मामले के सामने आने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर जोरदार हमला करने के बावजूद नेताजी से संबंधी फाइलों को सार्वजनिक करने के मसले पर उसने चुप्पी साध रखी है. आखिर ऐसा क्यों न हो? हमाम में तो सब लोग नंगे ही हैं. इससे साफ है कि उन फाइलों में इससे भी ज्यादा विस्फोटक सूचनाएं कैद हैं.

शायद इसी वजह से नेताजी के परिजनों ने अब इस मांग को जोरदार तरीके से उठाने का फैसला किया है. बोस के एक परिजन चंद्र कुमार बोस कहते हैं कि यह खुलासा हमारे लिए किसी सदमे से कम नहीं है. हमने नेहरू से ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं की थी. कांग्रेस ने इसे मीडिया की मनगढ़ंत कहानी बताते हुए इस पूरे मामले को खारिज करने की लचर कोशिश जरूर की है. लेकिन उसके नेताओं के रुख से साफ है कि दाल में कुछ काला जरूरी है. ऐसे में आने वाले दिनों में नेहरू के इस कारनामे से एक नया राजनीतिक बवंडर खड़ा होने का अंदेशा है.

ब्लॉग: प्रभाकर

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