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ब्लॉग

दागी नेताओं का साथ देती सरकार

जनतंत्र में कानून और अदालत सर्वोपरि है. भारत में अब ये बात गुजरे जमाने की बात होगी. यहां कानून को उन लोगों के आगे झुकना पड़ा है जो संसद की शुचिता पर दागी होने के तमगे को लेकर सवालिया निशान लगा रहे थे.

दोषी ठहराए गए सांसदों और विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाने के भारतीय सर्वोच्च अदालत के आदेश को पलटने के लिए संसद ने अपने ही कानून को बदलने की ठान ली. मजे की बात यह है कि संसद में कभी एकमत न होने वाले सत्ता पक्ष और विपक्ष ने इस मुद्दे पर साथ आने में पल भर की भी देर नहीं की. सरकार ने कानून में बदलाव के फैसले को मंजूरी दे दी अब इसे सिर्फ संसद से पारित होना बाकी है, राष्ट्रपति की मुहर में ज्यादा संदेह नहीं. नतीजा, विधायिकाओं के दागी सदस्यगण दोषी ठहराए जाने के बाद भी माननीय बने रहेंगे.

माजरा है क्या

भारत में बीते एक दशक से राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की अंतहीन बहस चल रही थी. पानी तब सिर से गुजरने लगा, जब गंभीर आपराधिक मामलों में दागी माने गए 169 लोग 14वीं लोकसभा में जगह पा गए. राज्यों की विधानसभाओं की तस्वीर तो इससे भी खराब है. दो साल से देश भर में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान इस समस्या के निदान के लिए चुनाव सुधार की प्रक्रिया को तेज करने की पहल के तहत तमाम जनहित याचिकाएं हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में डाली गईं.

न्यायपालिका ने कम से कम मौजूदा कानून की सटीक व्याख्या कर इसका पालन सुनिश्चित कराने जैसे आदेश पारित कर सिस्टम सुधारने की प्रक्रिया में अपना योगदान देने की पहल की. इसी के तहत 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में विधायिकाओं को साफ सुथरा रखने के लिए बने जन प्रतिनिधित्व कानून की उस धारा को असंवैधानिक करार दिया, जिसके तहत दो साल से अधिक सजा के प्रावधान वाले किसी अपराध के लिए किसी को दोषी ठहरा दिया गया हो. इसके बाद से सियासी जमात में ऐसा हंगामा बरपा कि एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वाले सत्ता पक्ष और विपक्ष तुरंत एकजुट हो गए.

दाग अच्छे हैं

एक तरफ जनता और चुनाव सुधार की मुहिम चला रही सिविल सोसाइटी में अदालत का यह फैसला उम्मीद की किरण जगा गया वहीं दूसरी ओर नेताओं के लिए चिंता का सबब बन गया. लगभग एक महीने तक जनता और नेता दोनों का मूड भांपने के बाद आखिरकार सरकार ने नेताओं के हित को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च अदालत के फैसले को असरहीन करने के लिए कानून में बदलाव का फैसला कर लिया. यह जानते हुए भी कि नैतिकता की कसौटी पर इसे खरा नहीं उतारा जा सकता. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में 22 अगस्त को हुई कैबिनेट की बैठक में संशोधन प्रस्ताव के मसौदे को संसद में पेश करने की मंजूरी मिल गई.

फैसले के पीछे वही दलील दी गई जिसे अदालत खारिज कर चुकी है कि 169 सांसदों की सदस्यता खत्म करने से संवैधानिक संकट हो जाएगा. न सिर्फ सरकार अल्पमत में आ जाएगी बल्कि सदन का कोरम भी पूरा नहीं होगा और तत्काल चुनाव कराना होगा. सरकार ने अदालत में माना कि विधानसभाओं की हालत तो और भी बदतर है. नतीजतन राज्यों में भी विधानसभा चुनाव कराने होंगे इससे सरकारी खजाना खाली होने की नौबत आ जाएगी. मतलब साफ है कि मौजूदा हालात में संसद और विधानसभाओं पर लगे अपराध के दाग धब्बे अच्छे हैं. दागियों का बोझ तो विधायिकाएं झेल सकती हैं लेकिन विधायिका की सफाई का आर्थिक बोझ देश नहीं झेल सकता है.

अब क्या होगा

हकीकत यह भी है कि सियासतदां अदालत के फैसले को सैद्धांतिक तौर पर सही मान रहे हैं. लेकिन सत्ता के गलियारों में यह दलील भी दी जा रही है कि अदालतें सिर्फ कानून के चश्मे से दुनिया देखती हैं जबकि सरकार साम दाम दंड भेद के सहारे ही चलती है. शायद व्यावहारिकता का ही तकाजा है कि सरकार को वक्त की नजाकत भांपते हुए संसद के चालू मॉनसून सत्र में ही जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन को पारित कराने का फैसला करना पड़ा. सरकार ने संसद के दोनों सदनों में कानून में संशोधन का जो मसौदा पेश किया है उसके मुताबिक दोषी ठहराए गए सांसद या विधायक की सदस्यता नहीं जाएगी. उच्च अदालत में लंबित अपील पर अंतिम फैसला होने तक उसे सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने का तो अधिकार होगा लेकिन इस दौरान वह मतदान में हिस्सा नहीं ले सकेगा और इस अवधि के लिए उसे वेतन भत्ते भी नहीं मिलेंगे.

व्यावहारिकता एक पहलू यह भी है कि इन दोनों ही अधिकारों की आज के सांसद विधायकों को कोई जरूरत नहीं है. इतना ही नहीं अदालत के फैसले को पूरी तरह बेअसर करने के लिए कानून में प्रस्तावित ये संशोधन 10 जुलाई से ही प्रभावी माने जाएंगे.

और क्या विकल्प

सवाल यह है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले को न मानना ही क्या सरकार के पास एकमात्र विकल्प था. सरकार अगर चाहती तो अदालत से इस फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध कर सकती थी. लेकिन इस विकल्प को अपनाने का सबसे बड़ा जोखिम अगले साल होने वाला लोकसभा चुनाव है. पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर अगर अदालत चुनाव के ठीक पहले खारिज कर देती तब तो न जाने कितने कद्दावर नेताओं का भविष्य दांव पर लग जाता. साथ ही हजार से अधिक का आंकड़ा पार कर चुके दागी नेता चुनाव लड़ने से महरूम हो जाते. हां अगर यही फैसला दो साल पहले आता तो शायद सरकार यह जोखिम उठा सकती थी. नतीजतन सरकार ने वक्त गंवाए बिना कोर्ट के संसद का रुख कर सीधे संशोधन का फैसला किया.

इतिहास दोहराया

इस माहौल में एक बार फिर आपातकाल का वह दौर याद आ गया जब देश में संसदीय अधिनायकवाद लाने के लिए न्यायपालिका को नीचा दिखाने की कोशिश की गई थी. उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध बताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी सदस्यता खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला दिया. मशहूर वकील ननी पालकीवाला ने प्रधानमंत्री को अंतरिम राहत दिलाने के लिए 23 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट में शरण ली. अगले दिन अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए अंतिम फैसला आने तक इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता बहाल रखने और संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी लेकिन सदन में मताधिकार से वंचित कर दिया.

पालकीवाला अपने संस्मरण में लिखते हैं कि उन्होंने "मैडम गांधी" को अदालत से मिली राहत का महत्व बताया कि संसद अभी सत्र में नहीं है और जब सत्र शुरू होगा तब कोर्ट ने उन्हें मताधिकार के लिए नई अर्जी दायर करने की छूट भी दे दी है. इतना सुनने के बाद भी प्रधानमंत्री के चेहरे पर खुशी के बजाए चिंता और डर की लकीरें दिख रही थीं. पालकीवाला यह कह कर बैंगलोर रवाना हो गए. उन्हें अहसास भी न था कि अगले 36 घंटे में क्या होने वाला है. अगले ही दिन भारत में आपातकाल लगा दिया गया.

ब्लॉगः निर्मल यादव, नई दिल्ली

संपादनः अनवर जे अशरफ