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ब्लॉग

दलगत राजनीति का शिकार तेलंगाना

तेलंगाना के मुद्दे पर सभी पार्टियां राजनीति कर रही हैं॰ लेकिन इस प्रकरण में सबसे अधिक आपत्तिजनक भूमिका कांग्रेस और केंद्र सरकार की है जिनके गैर-जिम्मेदाराना रवैये ने स्थिति को लगातार उलझाया है.

राजनीतिक विश्लेषकों को भी अब यह यकीन होता जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर सोची-समझी सुनियोजित रणनीति पर अमल किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने तेलंगाना राज्य के निर्माण के निर्णय की घोषणा करके आंध्र प्रदेश में तेलंगाना-विरोधी और तेलंगाना-समर्थक आंदोलनों को भड़का दिया है. लेकिन यह स्पष्ट करने की जरूरत नहीं समझी है कि इस पृथक राज्य के निर्माण की प्रक्रिया को कब तक पूरा कर लिया जाएगा. पहले माना जा रहा था कि संसद के शरदकालीन सत्र में पृथक तेलंगाना राज्य निर्माण संबंधी विधेयक पेश किया जाएगा लेकिन अब इस बारे में भी सरकार की ओर से कोई आश्वासन नहीं दिया जा रहा है. केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए मंत्रियों के एक समूह का गठन किया है लेकिन उसे कब तक अपनी सिफारिशें पेश करनी होंगी, इस विषय में भी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है. इस समूह में आंध्र प्रदेश का एक भी मंत्री शामिल नहीं किया गया है, जिसके कारण समूह की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं.

तेलंगाना के मसले पर केवल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लगातार एक-सा रुख अपनाया है और पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण का विरोध किया है. फिल्म अभिनेता चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी भी पृथक तेलंगाना के खिलाफ है. अन्य पार्टियों के रवैये में बदलाव आता रहा है और वे तात्कालिक राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से बयान देती रही हैं. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का रवैया एक जैसा अवसरवादी रहा है.

इस समय तेलुगू देशम पार्टी के नेता और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू दिल्ली में आंध्र भवन में अनिश्चितकालीन अनशन पर पड़े हुए हैं. वह और उनकी पार्टी पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण का विरोध कर रहे हैं. एन. टी. रामाराव के समय से ही उनकी पार्टी तेलंगाना राज्य बनाए जाने की मांग के विरोध में थी, लेकिन अक्टूबर 2008 में अचानक नायडू ने अपना रुख बदल कर इस मांग का समर्थन कर डाला. अब यह समर्थन ही उनके गले की हड्डी बन गया है. इन दिनों यह पूछे जाने पर कि क्या वह आंध्र प्रदेश के विभाजन के पक्ष में हैं, नायडू कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देते. आंध्र भवन राज्य की कांग्रेस सरकार के नियंत्रण में है और दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार के. लेकिन दोनों में से किसी की भी हिम्मत नहीं कि चंद्रबाबू नायडू को वहां से हटा सकें, हालांकि दिल्ली में आंध्र प्रदेश के रेजीडेंट कमिश्नर ने अनशन को गैर-कानूनी घोषित कर दिया है.

उधर आंध्र प्रदेश का विभाजन करके अलग तेलंगाना राज्य बनाने के सवाल पर पूरे राज्य की राजनीति में उबाल आया हुआ है. आंध्र प्रदेश के सरकारी कर्मचारी बहुत बड़ी संख्या में हड़ताल पर चले गए हैं. चक्रवात आने की संभावना के कारण बिजलीकर्मियों ने हड़ताल तोड़ दी है लेकिन अन्य कर्मचारी अभी भी हड़ताल पर हैं, हालांकि उनके नेताओं ने आश्वासन दिया है कि आवश्यक सेवाओं को चालू रखा जाएगा. इस समय तेलंगाना राष्ट्र समिति के संस्थापक एवं नेता के. चन्द्रशेखर राव के अलावा कोई भी नेता ऐसा नहीं है जो पृथक राज्य बनाए जाने के पक्ष में हो. कांग्रेस पार्टी के भीतर भी गहरी दरार है और आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री किरण रेड्डी स्वयं तेलंगाना बनाए जाने का विरोध कर रहे हैं. इस बात की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है कि वह अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं. कांग्रेस से टूटकर बनी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस भी आंध्र प्रदेश के विभाजन के खिलाफ है और उसके नेता जगनमोहन रेड्डी हैदराबाद में अनशन कर रहे हैं और उनकी हालत खराब होती जा रही है.

आंध्र प्रदेश के कुल 23 जिलों में से दस तेलंगाना में आते हैं और राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 119 तेलंगाना में चली जाएंगी. राजधानी हैदराबाद वैसे तो तेलंगाना का हिस्सा है, लेकिन उसे कोई भी नहीं छोडना चाहता क्योंकि वहां सभी पार्टियों के नेताओं ने रियल एस्टेट यानि जमीन-जायदाद में निवेश कर रखा है और उससे सभी के आर्थिक हित जुड़े हैं. जिस तरह चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा के बीच लगातार विवाद और तनाव का कारण बना रहा है, उसी तरह पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण के बाद हैदराबाद बन सकता है. केंद्र सरकार का फिलहाल प्रस्ताव दस साल तक हैदराबाद को साझा राजधानी बनाए रखने का है, जिसे सभी पक्ष अस्वीकार कर रहे हैं.

केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का कहना है कि तेलंगाना राज्य के गठन के सवाल पर अब पांव पीछे हटाना संभव नहीं है. लेकिन यह स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव होने तक तेलंगाना नहीं बन पाएगा और चुनाव अभियान में प्रत्येक पार्टी इस मुद्दे को अपने-अपने ढंग से भुनाएगी. आंध्र प्रदेश विधानसभा ने पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण के बारे में अभी तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है, और इस मुद्दे पर जिस प्रकार से राय बंटी ही है, उसे देखते हुए ऐसा प्रस्ताव पारित होना संभव भी नहीं लगता. हालांकि शिंदे ने कहा है कि इसकी अनिवार्यता नहीं है. लेकिन यह सवाल तो उठता ही है क्या संघीय प्रणाली में केंद्र द्वारा किसी राज्य पर उसकी इच्छा के विरुद्ध विभाजन थोप देना उचित कहा जा सकता है?

फिलहाल तो कांग्रेस अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो' की नीति पर चलती दिख रही है. क्या उसे इसका चुनावी लाभ मिल सकेगा? कहना कठिन है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार, नई दिल्ली

संपादन: आभा मोंढे

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