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दुनिया

दर बदर औरतों का दर्द

बेघर महिलाएं और बच्चे राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सबसे ज्यादा आसानी से जुल्म और हिंसा के शिकार होते हैं. हालात और सरकार की बेरुखी के शिकार इन लोगों की मदद करने वाला कोई नहीं.

श्रद्धा शर्मा को जिंदा रहने के लिए हर रोज लड़ना पड़ता है. करीब 35 साल की श्रद्धा पिछले 16 साल से दिल्ली की सड़कों पर हैं और हर पल उसकी बेरुखी झेलते हुए किसी तरह बच जाने को ही अपना सौभाग्य मानती हैं. श्रद्धा ने डीडब्ल्यू से कहा, "मुझे मारा गया, गाली दी गई, प्रताड़ित किया गया...हर तरह से अपमानित हुई लेकिन कोई मदद के लिए नहीं आया. सारे जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें फेर लीं." वो अपनी पेट पर एक इंच गहरे घाव के निशान दिखाती हैं जो कुछ साल पहले एक लुटेरे की चाकू से लगा था. वह उनके पास जो कुछ थोड़ा बहुत सामान है उसे छीनने की कोशिश कर रहा था.(हर आठ मिनट में बलात्कार)

यौन हिंसा और शोषण

श्रद्धा की तरह ही कुसुम को भी पुलिस और सड़कछाप बदमाशों का जुल्म झेलना पड़ता है. चार बच्चों की मां कुसुम का एक दिन भी शांति से नहीं गुजरता. वह उत्तर पूर्व राज्य असम से दशक भर पहले नौकरी ढूंढने आई थीं. कुसुम ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह जीता जागता नर्क है. हर रात मैं डर डर कर सोती हूं, नहीं जानती कि कौन मेरे शरीर और मेरी इज्जत को रौंद कर चला जाएगा. मुझे अपने बच्चों के लिए और चिंता होती है." श्रद्धा और कुसुम की तरह ही कई और महिलाएं हैं, जिनकी इसी तरह की डरावनी कहानियां हैं.

दिल्ली में हजारों बेघर महिलाएं हैं जो गुमनामी और अंधेरे में जीते हुए हर रोज अपमान सह रही हैं. बीते हफ्ते इन लोगों को एक मंच पर साथ आने का मौका मिला. शहरी अधिकार मंच बेघरों के साथ नाम के एक संगठन ने बेघर लोगों को एक साथ लाने की कोशिश की है. दिल्ली सरकार से मिले आंकड़ों के मुताबिक यहां करीब डेढ़ लाख बेघर लोग हैं. शहर में बेघर लोगों के लिए जो आसरा बनाया गया है उसमें ज्यादा से ज्यादा सिर्फ 9000 लोगों के लिए जगह है. इनमें से 10 हजार बेघर महिलाओं के लिए पूरे शहर में सिर्फ पांच ठिकाने हैं. इन महिलाओँ को न सिर्फ मौसम की मार बल्कि लगातार यौन हिंसा और सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है.

बेघरों का दर्द

शहर में सार्वजनिक शौचालयों और स्नानघरों की कमी हो तो यौन हिंसा का जोखिम और बढ़ जाता है. कानून और मानवाधिकार के क्षेत्र में दो दशकों से काम कर रही अमिता जोसेफ का कहना है, "शहरी गरीबी और सामाजिक असुरक्षा का सबसे खराब रूप है बेघर होना, यह शासन और लोक कल्याणकारी राज्य के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की नाकामी का बड़ा संकेत है."

अपमान और हिंसा के अलावा ज्यादातर महिलाओं और उनके परिवारों को भूख और कुपोषण से भी जूझना पड़ता है. शहर के कुछ इलाकों में तो वो बताती हैं कि पुलिस उन्हें सिर्फ रात में खाना बनाने देती है, जिससे उनका खाना बहुत सीमित हो जाता है. 60 साल की बीना ने बताया, "अगर हम दिन में खाना बनाएं तो पुलिस हमारे बर्तन और खाना फेंक देती है."

तकलीफों का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता. कुछ ऐसी बेघर महिलाएं भी हैं जो और ज्यादा संकट झेल रही हैं. इनमें मानसिक और शारीरिक बीमारियों से जूझ रही महिलाएं शामिल हैं. इनके अलावा अकेली मांएं और एड्स से पीड़ित महिलाएं भी हैं, जिनकी दिक्कत और बड़ी है. भारत में बेघर लोगों के लिए काम करने वाले संगठन इंडो ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी से जुड़े इंदु प्रकाश सिंह का कहना है, "हम लगातार उनकी दुर्दशा के बारे में बता रहे हैं लेकिन सरकार ऐसा लगता है जैसे कुछ करना ही नहीं चाहती. आखिरकार वो हमारे शहर के घर बनाने वाले हैं, वो राजधानी और उसके घरों में हर तरह के काम करते हैं."

उधर दिल्ली सरकार का कहना है कि वह बेघर लोगों को बसाने के लिए अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रही है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, "हम उनकी मदद करने की कोशिश कर हैं लेकिन समस्या है कि हर महीने दिल्ली में बाहर आने वालों की तादाद बढ़ रही है." आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी भारत में 940,000 बेघर लोग हैं. 2001 की तुलना में यह संख्या काफी ज्यादा है. अब गांव से ज्यादा शहरों में बेघर लोग हैं और राजधानी की हालत सबसे ज्यादा बुरी है.

रिपोर्टः मुरली कृष्णन/एनआर

संपादनः महेश झा

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