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खेल

दम तोड़ती पाकिस्तानी कुश्ती

किसी जमाने में अखाड़े में जबदस्त पहलवान नजर आते थे. अब ये वीरान पड़ा है. भोलू भाइयों की कब्र उनके अखाड़े के पास ही बनी है लेकिन साफ सफाई करने वालों के अलावा और कोई नजर नहीं आता.

सरकार ने आंखें फेर ली हैं और गुरबत ने कमर तोड़ दी है. अब सिर्फ यादें बची हैं और एकाध जोड़ी हाथ हैं, जो किसी तरह मशाल को जलाए रखना चाहते हैं. 1954 से 1970 के बीच पाकिस्तान ने 18 बार कुश्ती का कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक जीता. पांच बार एशियाई खेलों में खिताब जीता और एक कांस्य 1960 ओलंपिक में.

2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भी स्वर्ण पदक हाथ लगा, लेकिन ये खुशियां कुश्ती के यादगार दिनों को याद करने भर की हैं. भोलू परिवार में आखिरी पहलवान झारा भोलू के भाई आबिद असलम भोलू कहते हैं, "मैं कुश्ती के बारे में बात नहीं करना चाहता. मेरा दिल दुखता है." झारा की मौत के बाद आबिद ने कुश्ती की बजाय बिजनेस करने का फैसला किया. उनका कहना है, "हमने अपने स्वर्णिम दिन गंवा दिए हैं और उन दिनों को याद करने से बहुत दुख होता है."

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इस परिवार ने 1850 से ही पहलवान दिए हैं. सबसे बड़ा दौर वह था जब आजम, असलम, अकरम, गोगा और भोलू भाई लाहौर में कुश्ती की प्रैक्टिस करते और उनका जलवा पूरी दुनिया में था. बड़े बड़े मुकाबलों में उन्होंने खिताब जीते. भोलू ने 1953 में अमेरिकी पहलवान लाऊ थेज और भारत के दारा सिंह को चुनौती दी लेकिन दोनों ने ही चुनौती स्वीकार नहीं की.

अजेय भोलू

करीब 14 साल बाद 1967 में उन्होंने पूरी दुनिया के पहलवानों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगर कोई उन्हें हरा देगा तो वह उसे 5000 पाउंड का इनाम देंगे. ऐसा नहीं हो पाया. उसी साल लंदन में हेनरी पेरी नाम के फ्रांसीसी पहलवान को चित्त करके भोलू ने विश्व हेवीवेट चैंपियनशिप जीत ली.

असलम और अकरम ने दुनिया भर के चैंपियन अखाड़ेबाजों को हराया और उनका नाम डबल टाइगर पड़ गया. यूगांडा के बड़े पहलवान और बाद में तानाशाह बनने वाले इदी अमीन को 1953 में इन्होंने ही हराया था.

परिवार का आखिरी बड़ा नाम झारा था, जिसकी 1991 में सिर्फ 31 साल की उम्र में मौत हो गई.

अब आबिद कंस्ट्रक्शन का बिजनेस करते हैं. उनके पास मनी एक्सचेंज का ऑफिस भी है और वे एक आधुनिक घर में रहते हैं. उनका इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का भी काम चल रहा है और उनका कहना है कि वह अब इतना कमा रहे हैं, जितना कुश्ती में सोच भी नहीं सकते थे, "देश में पहलवानों के लिए कोई सम्मान नहीं है. इस खेल में कोई पैसा नहीं है. तो कोई क्यों पहलवानी करेगा."

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कुश्ती नहीं आसान

उनका कहना है कि पहले नंबर पर बने रहना मुश्किल है. अगर आप वहां पहुंचते भी हैं और सरकार आपके बारे में चिंता तक नहीं करती, तो बेहतर है कि कोई और धंधा किया जाए.

हिन्दुस्तान में कई सदियों तक राजा महाराजाओं के पास लड़ाके पहलवान होते थे, जो दिलजोई के लिए कुश्ती लड़ा करते थे. उन्हें अच्छी तरह रखा जाता था और काफी पैसा दिया जाता था क्योंकि उनकी जीत से रियासत की प्रतिष्ठा बढ़ती थी.

लेकिन बंटवारे के बाद पाकिस्तान में पहलवानों को नजरअंदाज कर दिया गया. उस वक्त कोई 300 अखाड़े हुआ करते थे, जिनमें से अब सिर्फ 30 बचे हैं. उस वक्त 7000 पहलवान थे, अब मुश्किल से 300 हैं. पंजाब और सिंध में कुछ युवा जरूर प्रैक्टिस करते हैं लेकिन उनकी गिनती मामूली है.

हालांकि 19 साल का शहवार ताहिर अपवाद है, "मेरे कुछ दोस्त हैं जो पहलवान नहीं बनना चाहते हैं. उनका कहना है कि जब इसमें इज्जत भी नहीं, पैसा भी नहीं तो फिर इसे क्यों खेलना." लेकिन ताहिर रोज सुबह चार बजे उठता है. इसके बाद ढेर सारे पुश अप करता है, फजिर की नमाज पढ़ता है और फिर सोने चला जाता है. दोपहर को वह फिर उठता है और फिर से दंड पेलता है.

महंगी है खुराक

वह 30 वर्ग फीट के अखाड़े को अपने हाथों से कुदाल से खोदता है. उसकी मिट्टी को कुश्ती के लायक बनाता है. उसका कहना है कि इस सारे काम में उसे बहुत मेहनत लगती है और इसलिए उसे रोज चिकेन, रोटी, दाल, फल और बादाम खाना पड़ता है. तब उसका 90 किलो का वजन कुश्ती के लिए तैयार होता है. हालांकि मुकाबले के वक्त उसे वजन घटा कर 84 किलो करना पड़ता है.

ताहिर के कोच आमिर बट का कहना है, "इन दिनों पहलवान बनना बहुत महंगा काम हो गया है. हर रोज की खुराक के लिए 1500 रुपये लगते हैं. और हर कोई इतने पैसे नहीं जुटा सकता है."

पाकिस्तान कुश्ती संघ का कहना है कि पाकिस्तान स्पोर्ट्स बोर्ड के पास उनके लिए पैसे नहीं हैं. संघ के सचिव चौधरी मुहम्मद असगर का कहना है कि निजी अखाड़ों को स्पांसर दिलाने की मांग तेज हो रही है. देखना है कि अखाड़े फिर गुलजार होते हैं कि नहीं.

एजेए/एमजे (एएफपी)