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ब्लॉग

दमकते समाज का मुरझाया चेहरा

आजाद भारत के 67 साल स्वप्न, आकांक्षा, संघर्ष और तकलीफ के साल हैं. साढ़े छह दशक बाद एक खुला, संपन्न और समृद्ध समाज हमारे सामने है लेकिन इस कैनवास के रंग इतने चटक नजर नहीं आते.

भारतीय समाज की कल्पना थोड़ी देर के लिए एक बहुत विशाल कैनवास के रूप में करें और इसमें अब तक के सफर के तमाम चित्र, झांकी, बिंब और कोलाज देखें. एक बहुत विशाल पेंटिंग जिसमें तमाम कलाएं अभिव्यक्त होकर जीवंत हैं. लोग आते हैं, रंग भरते हैं और एक बहुत बड़ा रंग संसार हमारे सामने खुला रहता है. अद्भुत छटाओं और दिव्य रौनकों में खिला हुआ.

एक नजरिया तो भारत का चेहरा कुछ ऐसा ही दिखाता है. महानता और जयजय में जगमगाता हुआ. लेकिन इस कैनवास के और नज़दीक जाकर खड़े हो जाएं तो रंग उड़ते और आकृतियां कांपती हुई नजर आती हैं. कुछ स्याह शेड्स लपलपाते हुए कैनवास को कवर करते बढ़े आते दिखते हैं और असंख्य वेदनाएं हमारे जेहन और आसमानों से टकराती है. ये कौन सा भारत है? कौन से समाज का कैसा चेहरा?

हमारी चिंता यही है. गर्व और सीना फुलाए कुछ प्रतीकों के सहारे ही तो हम जिंदा या खुश नहीं रह सकते. दुनिया में हम कई मायनो में पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी या पांचवीं शक्ति बन गए हैं या बन जाने वाले हैं. लेकिन क्या इसी पर गाजाबाजा कर लें या ये फिक्र भी करनी चाहिए कि देश में ही एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो इन शक्तियों से अंजान है.

एक सामाजिक संस्कार वाले देश में लगता है अब सामाजिक अहंकार फैल रहा है. सत्ता राजनीति और अब तक के प्रशासकों ने कृत्रिम गौरव और कृत्रिम महिमा-गान से जनता को झुमाए रखा लेकिन ये भी सब जान गए हैं कि कैसी ढांचागत खामियां यहां जमा थीं और विकास के मॉडल किन नाइंसाफियों पर टिके हुए थे. वे देश की आधा से ज्यादा वंचित आबादी पर भरभराते हुए गिरे. क्या उनकी कमजोर संरचना सुनियोजित थी?

आजादी की लड़ाई, कांग्रेस की सत्ताएं, उसका अघोषित सर्वसत्तावाद, नेहरू, इंदिरा, राजीव और मनमोहन युगों के बाद अब बीजेपी काल और मोदी का दौर शुरू हुआ है. इस बीच विकास के कई पैमाने गढ़े गए, क्रांतियां जैसी हुईं, अफसरशाही सघन हुई और भ्रष्टाचार भी, आर्थिक उदारवाद और सांप्रदायिकता का नया दौर एक साथ नब्बे के दशक में शुरू हुआ, एक नयी लकीर भारतीय समाज के चेहरे पर उभर आई. विलासिताएं नये रूप और नये अर्थ धारण करते हुए आईं. खूब क्रिकेट हुआ, मध्यवर्ग फला फूला और फैला. इंटरनेट बिरादरी आ गई. अतिशय उत्सव, अतिशय शहरीकरण, अतिशय निर्माण के नजारे दिखे. मंगल पर यान गया और कमरों और स्कूलों में औरतें बलात्कार से मारी गईं.

इस तरह अपने समाज का चेहरा आज पांच भागों में विभक्त दिखता हैः विकास से दीप्त और गर्वित एक चेहरा, गरीबी और पिछड़ेपन से कुम्हलाया हुआ एक चेहरा, एक अतिशय हिंसा और बर्बरता से विकृत चेहरा और सत्ता कुटिलताओं के संजाल में घिरा एक चेहरा.

हर समाज के बदलाव का उस समाज की सत्ता राजनीति से घनिष्ठ संबंध रहता है. देश के राजनैतिक बदलावों और वैचारिक टकराहटों ने समाज को अपने ढंग से प्रभावित किया है. ऐसे में सवाल उभरता है कि कांग्रेस के इतने सारे वर्षों की सत्ता, कुछेक साल की गैर कांग्रेसी सत्ताओं के बाद अब जबकि बीजेपी पहली बार प्रचंड बहुमत के साथ और संसद में लगभग गायब विपक्ष के साथ सरकार चला रही है तो क्या समाज भी उस हिसाब, या विचार या उस गति के साथ बदल जाएगा. क्या बदल रहा है?

हम हाल की घटनाओं और बयानों में कुछ स्पष्ट कुछ अस्पष्ट झलकियां पा चुके हैं. लेकिन विचारों की और संस्कृति की विविधता के अनेक चेहरे हैं हमारे समाज के. हम इन चेहरों को कृत्रिमताओं से नहीं ढक सकते. मुझे अपने देश से बहुत प्यार है, ये जताने के लिए परम संतोष और प्रसन्नता से फूला हुआ चेहरा ही दिखाते रहना उचित नहीं होगा. हम सब को मिलकर अपने अपने चेहरों से विकृतियों को पोंछना चाहिए. एक साफ और पारदर्शी समाज ऐसे ही बनेगा.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादन: महेश झा

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