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ब्लॉग

दक्षिण कोरिया में बदलाव के लिए हिम्मत चाहिए

लेफ्ट लिबरल मून जे इन दक्षिण कोरिया के नये राष्ट्रपति बने हैं. डॉयचे वेले के अलेक्जांडर फ्रॉएंड का कहना है कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के साथ रिश्ते पूरी तरह बदल जायेंगे, पर घरेलू मोर्चे पर सुधारों की शुरुआत करनी होगी.

सब कुछ बेहतर होना चाहिए, लेकिन कुछ बदलना चाहिए, सालों से दक्षिण कोरिया आर्थिक, राजनीतिक और सबसे बढ़ कर सामाजिक मोर्चे पर इसी दुविधा में घिरा हुआ है. आर्थिक रूप से पूरे देश की खुशहाली बड़ी कंपनियों पर निर्भर है, जिन्होंने दक्षिण कोरिया के निर्यात उद्योग को बड़ा बनाया है और समाज के हर कोने तक पहुंचा दिया है. लेकिन कहीं भी यदि चायबोल में कमजोरी आती है, जैसे कि सैमसंग एक जलने वाला मोबाइल फोन बनाता है, तो सिर्फ कंपनी ही नहीं सारा देश मंझधार में फंस जाता है. इसीलिए अर्थव्यवस्था और राजनीति के बहुत करीबी रिश्ते भी घातक हैं. यह बात कुर्सी से हटाये गये राष्ट्रपति पार्क के मामले से भी साफ होती है.

युवाओंकेलिएअवसरोंकीकमी

अब आर्थिक चमत्कार के दिनों के नुस्खे काम नहीं आ रहे. परिवारों द्वारा चलाई जा रही कंपनियां अब आम लोगों के लिए काम और खुशहाली पैदा नहीं कर रहीं. इतना ही नहीं युवा लोग बेरोजगारी या असुरक्षित रोजगार का सामना कर रहे हैं. और वह भी एक ऐसे देश में जहां रोजगार सामाजिक रुतबे के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, जहां मेहनत और उत्साह लोगों की घुट्टी में है और जहां हर दिन दुनिया के किसी और देश के मुकाबले ज्यादा काम किया जाता है. नये राष्ट्रपति ताकतवर उद्योगपतियों और नेताओं के बीच सांठ गांठ को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें भारी विरोध और खासकर बुजुर्ग आबादी में आधारभूत परिवर्तन से डर का सामना करना पड़ेगा.

चूंकि कोरिया का संकट दरअसल पीढ़ियों का संकट है. क्योंकि पुरानी पीढ़ी ने अपना वादा पूरा नहीं किया है. देश में कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा. खासकर उच्च प्रशिक्षित और काम करने के लिए तैयार युवा लोगों को पुरानी संरचना कोई संभावना नहीं दे रही, न कोई सुरक्षित रोजगार, न सुरक्षा, न अपना मकान, न शादी, न बच्चे और न ही कोई भविष्य. लेकिन इसका पुरानी पीढ़ी की जहालत से कुछ लेना देना नहीं है जो खुद अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं. उन्होंने बेहतर भविष्य की चाह में खुद और अपने बच्चों पर बहुत बोझ डाल लिया है, बच्चों की अच्छी शिक्षा देने के लिए कर्ज के बोझ में डूब गये हैं. शिक्षा तो मिल गयी लेकिन 30 लाख ग्रैजुएट नौजवान कम वेतन वाली नौकरियों में किसी तरह दिन गुजार रहे हैं.

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एशिया विभाग के प्रमुख अलेक्जांडर फ्रॉएंड

ये अज्ञानता नहीं, यह साहस का अभाव है. संकट के समय में दक्षिण कोरिया कई संकटों का गवाह रहा है, सुधार करने की, समाज में आधारभूत बदलाव लाने और जर्जर संरचना को तोड़ने की हिम्मत नहीं होती. 1990 के दशक में एशिया संकट के बावजूद दक्षिण कोरिया ने नई शुरुआत का रास्ता नहीं अपनाया बल्कि डर कर कभी सफल रही पुराने विचारों में बंधा रहा.

उत्तरकोरियापरदोफांक

आक्रामक भाई उत्तर कोरिया के साथ रिश्तों पर भी पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बड़ी खाई है. जबकि युद्ध के समय की पीढ़ी प्योंगयांग के खिलाफ सख्त रवैये पर कायम रहना चाहती है, युद्ध के बाद पैदा हुई नई पीढ़ी संवाद चाहती है. वाम उदारवादी मून जे इन भी उत्तर के साथ बातचीत के समर्थक हैं. बस इस सबक से प्रभावित होकर कि पिछले सालों की प्रतिबंध की नीति उत्तर कोरिया को झुकाने में नाकाम रही है और प्योंगयांग भविष्य में भी वार्ता में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उकसाता रहेगा. वाशिंगटन की घुड़की भी हालात को शांत करने में योगदान नहीं देती. अमेरिका की सुरक्षा गारंटी और रॉकेटरोधी प्रणालियों की तैनाती के बावजूद लड़ाई होने पर बर्बादी दक्षिण कोरिया की होगी और पीढ़ियों की मेहनत को नष्ट कर देगी. मून जे इन की उत्तर कोरिया के साथ बातचीत की तैयारी और अमेरिका से अधिक स्वतंत्रता की नीति को प्योंगयांग और बीजिंग में संतोष लेकिन वाशिंगटन और टोक्यो में गंभीर चिंता के साथ लिया जायेगा.

मुश्किल समय में दक्षिण कोरिया के अपेक्षाकृत युवा लोकतंत्र ने आश्चर्यजनक रूप से दृढ़ता दिखायी है. तीस साल पहले एक जन आंदोलन ने तानाशाही खत्म कर दी थी और देश को लोकतांत्रिक शुरुआत का मौका दिया. लोगों की रैलियों ने हाल में भी कंजरवेटिव राष्ट्रपति पार्क को सत्ता से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. बड़े बहुमत से दक्षिण कोरिया के लोगों ने एक ऐसा राष्ट्रपति चुना है जो उत्तर कोरियाई शरणार्थी के बेटे के रूप में दक्षिण कोरिया आया और जो मानवाधिकार वकील के रूप में पार्क के पिता तानाशाह पार्क चुंग ली के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए जेल में रहा. वे नये रास्ते पर जाना और जर्जर ढांचे को तोड़ना चाहेंगे. लेकिन समय बतायेगा कि क्या उनकी आशंकित जनता इसके लिए तैयार है.दक्षिण कोरिया की संभावनाएं विशाल हैं, सिर्फ बदलाव के लिए हिम्मत चाहिए.

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