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जर्मन चुनाव

दंगों से बड़ा बना मोदी का मुद्दा

उत्तर प्रदेश में दंगों के जख्म सूखे नहीं कि मोदी का मुद्दा आ खड़ा हुआ. मारकाट, लूट और बलात्कार के दर्द में मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में रह रहे पीड़ित कह रहे हैं कि वे बीजेपी को हराने वाले को वोट देंगे.

मतदान में एक हफ्ता बचा है. फिजां मोदी के खिलाफ है. ज्यादातर दंगा पीडि़त बुझे मन से मानते हैं कि दंगा बीजेपी के कुछ लोगों ने कराया. मुजफ्फरनगर से सटी कैराना संसदीय सीट से बीजेपी के प्रत्याशी हुकुम सिंह राहत शिविरों के वोटों पर ही सवाल उठाते हैं. दंगों के आरोपी हुकुम सिंह कहते हैं कि ये सब बाहरी लोग हैं, इनके वोट कैसे पड़ सकते हैं. लेकिन चुनाव आयोग ने मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में चल रहे राहत शिविरों के लोगों के वोट डालने की पक्की व्यवस्था की है.

बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले पलड़ा, शाहपुर, जौला और लोई. शामली जिले के मलकपुरा शिविर के अलावा खुरजान, मोहम्मदपुर राय और बरनावी में अघोषित रूप से चल रहे कैंपों में अधिकांश लोगों के नए मतदाता पहचान पत्र बन गए हैं. इनके वोट जहां वे रह रहे हैं वहीं डलवाने के लिए चुनाव आयोग ने तैयारी की है. बिना डर खौफ के ये वोट डाल सकें इसके लिए इन सभी को 'विश्वास पर्ची' भी दी गई है.

यूपी के मुख्य चुनाव अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि 'विश्वास पर्ची' पर एसएचओ समेत जिले के पुलिस अफसरों के नंबर दिए हैं. उनके अनुसार जिला प्रशासन को भी मुस्तैद किया गया है. मुजफ्फरनगर के जिला अधिकारी कौशल राज शर्मा रोजाना दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा कर रहे हैं. वे कहते हैं कि अब तक करीब 10 हजार परिवारों को 'विश्वास पर्ची' वितरित की जा चुकी है. इन नंबरों पर फोन कॉल आने पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी.

मुजफ्फरनगर में पिछले साल के आखिर में हुए सांप्रदायिक दंगों में 62 लोग मारे गए, 19 लापता हुए, दो दर्जन महिलाओं से बलात्कार हुआ. पश्चिमी यूपी के इस वीभत्स दंगे के बाद करीब 54 हजार लोगों ने अपना घर बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण ली. इनमें से करीब 6000 लोग अभी भी इन राहत शिविरों में रह रहे हैं. दंगों में करीब 8000 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया जिनमें डेढ़ दर्जन नेता हैं, इनमें से अधिकांश चुनाव मैदान में हैं. दंगों का दंश अभी भी यह इलाका झेल रहा है. आरोपियों को पकड़ने की कोशिश में पुलिस और ग्रामीणों की भिड़ंत आम बात है. जरा जरा सी बात पर एक पक्ष दूसरे पक्ष के खिलाफ शिकायत दर्ज करा रहा है. पलड़ा के शिविर में रहने वाले मोहम्मद उजैर को सरकार ने मुआवजा दिया है, वे अपना घर बनवा रहे हैं. कहते हैं कि चुनाव में बीजेपी को हराना है, क्यों के जवाब में कहते हैं कि नरेंद्र मोदी का पीएम बनना ठीक नहीं रहेगा.

दंगे के सिलसिले में यूपी की सपा सरकार के खिलाफ भी आरोप लगे हैं, लेकिन इस बीत लोगों का गुस्सा काफी कम हो चुका है. दंगा पीड़ित सरमद कहते हैं कि इस सरकार ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए अभूतपूर्व काम किए. इतनी राहत राशि कोई दूसरी सरकार नहीं देती. अबरार अहमद भी सरकार के भरोसे हैं कि मुआवजे से घर बन जाएगा. शाहपुर कैम्प के गुड्डू और अनीस एक जुबान से कहते हैं कि जो मदद देगा उसे वोट देंगे, लेकिन साथ में यह कहने से नहीं चूकते कि जो मोदी को हराएगा उसे ही वोट देंगे. इसी कैम्प के हाजी नफासत बताते हैं कि माहौल अभी भी ठीक नहीं है. मोदी को हराने के लिए वह भी वोट देंगे. मुजफ्फरनगर की एक मुस्लिम एनजीओ के कर्ताधर्ता राशिद खान के मुताबिक यह सब स्थानीय मामले हैं, बीजेपी के पीएम प्रत्याशी नरेंद्र मोदी इन सबसे बड़ा मुद्दा है. मोदी के कारण ही यह चुनाव इन लोगों के लिए इतना अहम हो गया है.

दंगों का काला साया मुजफ्फरनगर, शामली के अधिकांश स्थानों पर अभी भी दिखता है. बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक मारकाट हुई. यहां कैम्प भी चल रहे हैं. इसी क्षेत्र में भारतीय किसान यूनियन का मुख्यालय सिसौली भी पड़ता है. छोटी छोटी पंचायतें हो रही हैं. किसी बहाने दंगों का जिक्र आ ही जाता है. पलड़ी के ग्राम प्रधान मंगेराम का कहना है कि इस बार वह भविष्य सुरक्षित करने के लिए मतदान करेंगे. पश्चिमी यूपी जाट प्रधान इलाका भी है. करीब 25 फीसदी आबादी दलित है, इसी समाज के अवधेश कुमार कहते हैं कि दंगों का असर चुनाव पर न पड़े यह कैसे संभव है.

रिपोर्ट: एस. वहीद, लखनऊ

संपादन: महेश झा

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