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थाइलैंड का सीरियल प्रदर्शनकारी

वोरावुत की उम्र 50 की हो चली है. इसमें से 22 साल तो प्रदर्शन में निकल गए. वे थाइलैंड के सबसे धाकड़ प्रदर्शनकारी हैं. जहां विरोध हो रहा हो, समझिए वोरावुत वहीं होंगे.

और अगर सेना या सुरक्षाबलों ने कार्रवाई की, तो वहां से भाग निकलने में भी वही अव्वल होंगे. विज्ञापन की दुनिया से ताल्लुक रखने वाले वोरावुत को कई बार आंसू गैस झेलना पड़ा है, लेकिन वे वक्त रहते निकल गए. एक बार तो सेना की कार्रवाई में 44 प्रदर्शनकारी मारे गए. लेकिन वोरावुत बच निकले.

कौन करते हैं विरोध

पिछले 20 साल में थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक ने कई प्रदर्शन देखे हैं. ताजा प्रदर्शन भी उनका ही हिस्सा है, जहां लोगों ने नवंबर से सरकारी इमारतों पर कब्जा जमा रखा है. इतने लंबे वक्त तक सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने वाले लोग कौन होते हैं. भीड़ की मानसिकता पर छोटी किताब लिख चुके वानलोप पियामानोथम कहते हैं, "तीन तरह के लोग होते हैं. ऐसे लोग जिनके पास काम नहीं होता, अवसाद के शिकार लोग और जुनूनी लोग."

सरकारी स्वास्थ्य सेवा भी इन प्रदर्शनों से आकर्षित हुई है. उसने तीन अलग अलग सर्वे कराए हैं. वारावुत जैसे लोग तो खुश हैं लेकिन कुछ लोगों को इसकी वजह से तनाव हो गया है. वे प्रोटेस्ट स्ट्रेस सिंड्रोम (पीएसएस) से प्रभावित हो सकते हैं. मीडिया का नशा, अवसाद और अत्यधिक भावुकता इसके लक्षण होते हैं. इसकी वजह से लोग रिश्तेदारों और सहयोगियों से झगड़ा कर सकते हैं, उन्हें सिर दर्द हो सकता है या रात भर नींद नहीं आ सकती है.

प्रदर्शनकारियों को सलाह

मंत्रालय का कहना है कि ऐसे लोगों को टीवी और सोशल मीडिया पर दो घंटे से ज्यादा नहीं बिताना चाहिए, अपनी रुचियों को बांटना चाहिए, ढंग से शारीरिक अभ्यास करना चाहिए और "उन्हीं लोगों से बात करनी चाहिए, जो समान विचार वाले" हों. मानसिक स्वास्थ्य के महानिदेशक फनफिमोन वीपहुलाकॉर्न का कहना है, "यह प्रतिक्रिया की तरह होती है. एक बार सब खत्म हो जाए, तो वे सामान्य हो जाते हैं."

पिछले तीन महीने में थाइलैंड में प्रदर्शन के दौरान 10 लोगों की जान गई है. लेकिन घबराहट के बावजूद वोरावुत डटे हुए हैं, "जहां तक जुनून का सवाल है, मैं खुद को 10 में 10 नंबर देता हूं." उनके दोस्त मानते हैं कि वोरावुत रैलियों में बहुत ज्यादा समय देते हैं. कुंवारे वोरावुत दिन में बाकायदा ड्यूटी करते हैं लेकिन रात ज्यादातर विरोध करते हुए सड़कों पर बिताते हैं.

और यह कोई नया काम नहीं है. सबसे पहले 1970 के दशक में जब वे छात्र थे, तो बैंकॉक के चुलालोंगकोर्न यूनिवर्सिटी में सेना विरोधी आंदोलन किया. 1992 में सेना के सुचिंदा क्राप्रायून को प्रधानमंत्री बनाए जाने का विरोध किया. आज वे विरोधी नेता सुतेप थॉगसूबान का समर्थन कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री यिंगलक चिनावट के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. हालांकि वह मानते हैं कि चिनावट परिवार के खिलाफ उनकी सोच का असर उनके जीवन पर पड़ रहा है, "हो सकता है कि मैं चिनावट स्ट्रेस सिंड्रोम से पीड़ित हो गया हूं."

एजेए/एमजे (डीपीए)

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