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दुनिया

थाइलैंड का खूनी संघर्ष

जनमत की नजरों से दूर थाइलैंड के दक्षिणी हिस्से में दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे खूनी युद्ध चल रहा है. मुस्लिम अलगाववादी बर्बरता से हत्या कर रहे हैं और सेना जवाबी हिंसा कर रही है. सरकार लाचार है.

घटना पिछले दिसंबर में हुई. नकाबपोश लोगों ने दक्षिण थाइलैंड के एक स्कूल पर हमला किया और केंद्र सरकार के भेजे गए तीन बौद्ध शिक्षकों को सहयोगियों और बच्चों के सामने गोली मार दी. यह इलाके के शिक्षा संस्थानों पर इस्लामी कट्टरपंथियों के नियमित हमलों का ताजा मामला था. नतीजतन इलाके के 1.300 सरकारी स्कूलों को सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है.

थाइलैंड के तीन दक्षिणी प्रांत पट्टानी, याला और नराथीवाट मलेशिया की सीमा पर हैं. वहां अलगाववादी गिरोह सालों से सरकार के नियंत्रण के खिलाफ और स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वे पुलिस चौकियों पर हमला करते हैं. कार बमों का धमाका करते हैं और दुकानों पर मशीनगनों से हमला करते हैं. वे शुक्रवार के दिन दुकान खोलने वाले दुकानदारों को धमकाते हैं और केंद्र सरकार का समर्थन करने वालों का गला काट देते हैं.यह घटनाएं हर रोज हो रही हैं, फुकेट और दूसरे सैलानी शहरों से कुछ ही सौ किलोमीटर दूर.

बर्बर गृह युद्ध

दक्षिण थाइलैंड में गृह युद्ध चल रहा है. दिसंबर में जारी अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा और बर्बरता रोजाना बढ़ रही है. 2004 में हिंसा की नई लहर शुरू होने के बाद से करीब 5,300 लोग मारे गए हैं. दक्षिण के तीन प्रांतों में करीब 20 लाख लोग रहते हैं. उनमें से 80 फीसदी मलय मूल के मुसलमान हैं. उनकी भाषा भी मलय है. बौद्ध बहुल थाइलैंड की आबादी 6.6 करोड़ है. उनमें मलय मुसलमान अल्पसंख्यक हैं. दक्षिणी इलाके सैकड़ों साल तक आजाद मुस्लिम सल्तनत पट्टानी का हिस्सा थे. 1902 से उसका शासन सीधे बैंकाक से हो रहा है.

अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप के जिम डेला-गियाकोमा कहते हैं कि विद्रोहियों का लक्ष्य भी साफ नहीं है. बातचीत के लिए उनकी ठोस मांगें भी नहीं हैं. "जो हम देख रहे हैं वह मलय मुसलमानों का विद्रोही आंदोलन है जो दक्षिण में अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन हम आश्वस्त नहीं हैं कि वे थाइलैंड से आजादी के लिए लड़ रहे हैं या कदम दर कदम अधिक स्वायत्तता चाहते हैं."

अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप अपनी रिपोर्ट में इस आंदोलन को गांवों के स्तर पर छोटे कमांडो का नेटवर्क बताता है. गांव की कमेटी कार्यकर्ताओं को चुनती है, उनके अभियानों को पैसा देती है, प्रचार करते हैं और खुफिया जानकारी दूसरों को देते हैं. छापामार तकनीक उन्हें छुपने की संभावना देता है.

सैनिक दमन

सरकार समस्या के समाधान के लिए सैनिकों और इलाके के सैन्यीकरण पर भरोसा कर रही है. इस समय देश के दक्षिणी हिस्से में सेना और पुलिस के 65,000 जवान तैनात हैं. साथ ही सेना ने इलाके के 80,000 बौद्धों को हथियार दे दिया है और उन्हें गोलीबारी की ट्रेनिंग भी दी है. विद्रोहियों को कुचलने में सैनिक कोई कोताही नहीं बरत रहे हैं. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि सुरक्षा बल के जवान संदिग्ध लोगों का अपहरण कर लेते हैं, उन्हें यातना देते हैं और मार भी डालते हैं. आपात कानून उन्हें सजा से बचाए रखते हैं.

मानवाधिकार संगठनों की शिकायत है कि विशेष कानून सैनिकों को बहुत ज्यादा अधिकार देते हैं और ताकत के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच के सुनई पाठक का कहना है, "नौ साल से हमारे सामने अनसुलझे मामले हैं, जिनमें लोगों को सुरक्षा बलों द्वारा मारा गया है, यातना दी गई है और ले जाया गया है, वे लापता हैं. और किसी अपराधी को कभी सजा नहीं मिली." यह विद्रोह को और हवा देता है ताकि विद्रोही अपने हिंसक संघर्ष को उचित ठहरा सकें.

सरकार की कार्रवाई

दक्षिण थाइलैंड के ज्यादातर मुसलमान उदारवादी माने जाते हैं.लेकिन उनमें से बहुत से लोग खुद को दूसरे दर्जे का नागरिक मानते हैं. उनका कहना है कि अब तक की सरकारों का शांति के लिए प्रयास विश्वसनीय नहीं रहा है. 2011 से शासन में आई प्रधानमंत्री यिंगचुक शिनावट ने अपने पूर्वगामियों के विपरीत विद्रोहियों के खिलाफ नरम रुख अपना रखा है. लेकिन सरकार ताकतवर सेना के बिना कोई कदम नहीं उठा सकती. और वह स्वायत्तता के हर मांग के खिलाफ है.

जिम डेला गियाकोमा का कहना है कि सेना अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहती है. वह अपने को देश की एकता का रक्षक मानती है जो राजा, धर्म और भाषा पर आधारित है. अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप की रिपोर्ट का कहना है कि सरकार को दक्षिण की स्थिति को प्राथमिकता बनाना होगा और विकेन्द्रीकरण पर विचार करना होगा. "हिंसा इस तेजी से बढ़ रही है कि सरकार कदम उठाने को मजबूर हो गई है." नहीं तो सरकार के पहल खोने का खतरा है, उसके बुरे परिणाम होंगे.

रिपोर्ट: अना लेमन/एमजे

संपादन: ए जमाल

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