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खेल

थम गया अफरीदी नाम का तूफान

कोई 14-15 साल पहले पाकिस्तान का एक भोला भाला लड़का श्रीलंका के खिलाफ खेलने उतरा. हाथ में भारी बल्ला और सामने मजबूत आक्रमण. इस लड़के का यह सिर्फ दूसरा वनडे मैच था. लेकिन उसके हौसले सातवें आसमान पर थे.

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टेस्ट नहीं खेलेंगे अफरीदी

अगली 37 गेंदों ने उसकी तकदीर बदल कर रख दी. इस लड़के ने रनों का ऐसा बवंडर खड़ा किया, जिसने सामने वाली टीम को तहस नहस करके रख दिया.

इसके बाद शाहिद अफरीदी की यह आदत बन गई. तीन चार विकेट गिरने के बाद अफरीदी ग्राउंड पर आते और ऐसा बल्ला भांजते कि उधर वाली टीम कुछ समझ ही नहीं पाती. अफरीदी रनों का तूफान खड़ा कर निकल जाते. दो साल बाद अफरीदी को टेस्ट मैचों में आजमाया गया. अफरीदी फेल हो गए. ओपनिंग करने गए और सिर्फ 10 रन पर आउट. दूसरी पारी में छह रन पर आउट. इसके बाद से बार बार वनडे में शानदार प्रदर्शन और बार बार टेस्ट मैचों में नाकाम. इस विरोधाभास को आज तक कोई नहीं समझ पाया. खुद अफरीदी भी नहीं.

Shahid Afridi

पहले टेस्ट में टॉस

शायद यही वजह रही कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने जब संकट के वक्त अफरीदी की तरफ उम्मीद भरी नजर से देखा, तो वह न नहीं कह पाए. चार साल से टेस्ट नहीं खेला था. लेकिन पीसीबी उनसे दुनिया की सबसे मुश्किल टीम का नेतृत्व करने की मांग कर रही थी. वह भी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ. अफरीदी ने हामी भर दी. लेकिन साढ़े तीन दिन के बाद ही उन्हें अहसास हो गया कि यह उनकी गली नहीं. वह कप्तानी तो क्या, टेस्ट ही छोड़ देना चाहते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में पिछले 25 साल में सिर्फ चार नियमित टेस्ट कप्तान हुए हैं, एलन बॉर्डर, मार्क टेलर, स्टीव वॉ और रिकी पोंटिंग. लेकिन पाकिस्तान में सिर्फ तीन साल में चार कप्तानों को आजमा लिया गया और हर कोई नाकाम हो गया. इंजमाम उल हक के रिटायर होने के बाद यूनुस खान, मोहम्मद यूसुफ, शोएब मलिक और शाहिद अफरीदी को मौके मिले. लेकिन सारे के सारे कप्तानों ने टेस्ट मैचों में सिर्फ हार का ही मुंह देखा.

टेस्ट क्रिकेट शाहिद अफरीदी को कभी रास नहीं आया. 13 साल में उन्होंने सिर्फ 27 टेस्ट खेले हैं. दरअसल अफरीदी एक ऐसा बांध हैं, जिन्हें पांच दिनों तक बांधना बहुत मुश्किल है. वीरेंद्र सहवाग और सनत जयसूर्या जैसे खिलाड़ियों को उनके आस पास रखा जा सकता है. लेकिन अफरीदी फिर भी उनसे अलग हैं. सहवाग लंबे वक्त तक तेजी से रन जुटा सकते हैं. अफरीदी की गति कुछ और है. उनका बल्ला जब चल पड़ता है, तो तभी रुकता है, जब वह आउट होते हैं. बीच में आराम जैसी कोई बात अफरीदी के लिए नहीं बनी.

शायद अंतरराष्ट्रीय दबाव और पाकिस्तान के अंदर क्रिकेट के खस्ताहाल होते हुए भी अफरीदी अपनी लचक नहीं हासिल कर पाए. वह उस तेजी से वनडे और टेस्ट के लिए एडजेस्ट नहीं हो पाए, जैसा सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग कर लेते हैं. अब जरा अंदाज लगाइए कि जो खिलाड़ी टेस्ट मैचों में 87 रन के स्ट्राइक रेट से खेलेगा, वह कितनी देर तक क्रीज पर रह सकता है.

Pakistanische Spieler im Freudentaumel

संकट में पाकिस्तान टीम

अफरीदी प्रतिभा के धनी हैं. उनके अंदर गजब का क्रिकेट भरा है. लेकिन कप्तानी के लिए उन्हें लंबे समय तक अटकाया गया. अभी हाल ही में उन्होंने खुद इस बात का खुलासा किया कि उन्हें तो चार पांच साल पहले ही कप्तान बनाने का वादा किया गया था, लेकिन पीसीबी ने अपना वादा नहीं निभाया. इन बातों का भी प्रदर्शन पर असर पड़ता है. लेकिन वह अपनी बल्लेबाजी की ही तरह अपने फैसलों में भी बिंदास हैं. पाकिस्तान क्रिकेट के बेहद अहम हिस्सा बन चुके अफरीदी खुद कहते हैं कि वह टीम में एक जगह को खराब नहीं करना चाहते, इसलिए उसे खाली कर रहे हैं. आज के दौर में कितने खिलाड़ियों के अंदर इस तरह की बात कहने का साहस होगा.

जुलाई का महीना टेस्ट क्रिकेट के लिए दो बड़े सितारों के अस्त होने का महीना होगा. एक तरफ जहां श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन भारत के खिलाफ आखिरी टेस्ट खेल रहे हैं, वहीं अफरीदी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह देंगे. न मुरली की जगह कोई ले सकता है, न अफरीदी की जगह भर सकता है.

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