थमने का नाम नहीं ले रही किसानों की आत्महत्याएं | दुनिया | DW | 22.06.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

थमने का नाम नहीं ले रही किसानों की आत्महत्याएं

हाल में कुछ राज्यों ने हजारों करोड़ के कर्ज माफ जरूर कर दिए हैं. लेकिन इससे हालात में ज्यादा अंतर नहीं नजर आ रहा है. भारत में हर साल दस हजार से ज्यादा किसान आत्महत्य़ा कर लेते हैं.

तमाम वादों और उपायों के बावजूद भारत के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. कर्जमाफी की मांग में तमिलनाडु के सैकड़ों किसानों ने बीते अप्रैल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिना कपड़ों के धरना-प्रदर्शन किया था. केंद्र सरकार ने इस मामले में साफ पल्ला झाड़ लिया है. उसका कहना है कि राज्य सरकारें अपने खजाने से किसानों की कर्ज माफी का फैसला कर सकती हैं. केंद्र इस मामले में कोई सहायता नहीं करेगा. दूसरी ओर बहुत से विशेषज्ञ आत्महत्याओं के मौजूदा दौर के लिए नोटबंदी को प्रमुख वजह मानते हैं.

बदहालकिसान

केंद्र सरकार के तमाम वादों के बावजूद देश में किसानों की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही है. आए दिन किसी न किसी राज्य से किसनों के मरने की खबरें आ रही हैं. बीते दिनों महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में किसानों के हिंसक प्रदर्शन में कम से कम आधा दर्जन लोगों की मौत हो गई थी. हालात संभालने के लिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब के बाद अब कर्नाटक सरकार ने भी किसानों के कर्ज माफ करने का एलान किया है. इस साल देश के विभिन्न हिस्सों में बंपर फसल होने की वजह से किसानों को फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है. इससे उनकी लागत कर वसूल नहीं हो पा रही है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दिनों किसानों के कर्ज माफ करने का एलान किया. इससे सरकारी खजाने पर 36 हजार करोड़ से ज्यादा का बोझ पड़ेगा. इसी तरह पंजाब सरकार ने दो लाख छोटे व मझौले किसानों के 24 हजार करोड़ के कर्ज माफ करने का एलान किया. उनसे पहले महाराष्ट्र सरकार ने भी किसानों की हड़ताल के बाद हजारों करोड़ की कर्ज माफी का फैसला किया था. उसके बाद अब इस सप्ताह कर्नाटक सरकार ने 22 लाख छोटे किसानों के 8,165 करोड़ के कर्ज माफ करने का फैसला किया है. यह कर्ज सहकारिता बैंकों से लिए गए हैं. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कहते हैं कि किसानों को असली फायदा तब होगा जब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ओर से ऐसी पहल की जाए. उन्होंने प्रदेश बीजेपी से कहा है कि वह केंद्र को इसके लिए राजी करवाये. फिलहाल राज्य के किसानों पर सरकारी बैंकों का 42 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है.

अब इसके बाद हरियाणा व गुजरात के किसानों ने भी कर्जमाफी की मांग तेज कर दी है. एक निजी संस्था इंडिया स्पेंड ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि मार्च, 2017 तक बीते नौ वर्षों के दौरान केंद्र व राज्य सरकारों ने 4.80 करोड़ किसानों के लगभग 89 हजार करोड़ (13.9 अरब अमेरिकी डालर) का कर्ज माफ कर दिया. सरकारें किसानों की आत्महत्या रोकने की दलील देकर कर्ज माफी का एलान कर रही हैं. देश में किसानों का कर्ज माफ करने का सिलसिला वर्ष 1990 में वी.पी.सिंह की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने किया था. तब एकमुश्त 10 हजार करोड़ के कर्ज माफ किए गए थे.

प्रतिकूलअसर

कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि कर्ज माफी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि कर्जमाफी के इस तेज होते सिलसिले का सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. कृषि क्षेत्र को सबसे ज्यादा कर्ज इन बैकों से ही मिला है. अब बड़े पैमाने पर होने वाली कर्जमाफी से इनका एनपीए (नान-परफार्मिंग एसेट) तेजी से बढ़ेगा. सरकारी खर्चों पर निगाह रखने वाली संस्था इंडिया स्पेंड का कहना है कि देश के आठ राज्यों के किसान कुल 3.1 लाख करोड़ का कर्ज माफ करने की मांग कर रहे हैं. यह देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.6 फीसदी है. अमूमन सरकारें किसानों की आत्महत्याओं पर अंकुश लगाने की दलील देकर कर्ज माफ करने का फैसला करती हैं. कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हवाले बताते हैं कि बीते 21 वर्षों में 3.18 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. यानी हर 41 मिनट पर एक किसान ने आत्महत्या की.

कर्जमाफी से समस्या स्थायी रूप से न सुधरने की एक वजह यह भी है कि ज्यादातर किसान ग्रामीण स्तर पर स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेते हैं. इसलिए कर्जमाफी का असली फायदा उनको नहीं मिल पाता. आंकड़ों के मुताबिक, देश के 32.5 फीसदी यानी लगभग आठ करोड़ छोटे व मझौले किसान स्थानीय साहूकारों से ही कर्ज लेते हैं. इससे साफ है कि कर्ज माफ होने की स्थिति में ऐसे महज दस करोड़ किसानों को ही लाभ होगा. मोरगन स्टेनले ने हाल में अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि कर्ज माफ करने के बाद सरकारें संबंधित बैकों को उस रकम का भुगतान करती हैं. लेकिन इससे धीरे-धीरे कर्ज की संस्कृति खत्म होने लगती है और दूसरे किसान भी जानबूझ कर कर्जों का भुगतान नहीं करते. इससे राज्य सरकार के संसाधनों पर भी भारी असर पड़ता है. मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र के मामले में उसका राजस्व घाटा बढ़ कर सकल घरेलू उत्पाद के 2.71 फीसदी तक पहुंच जाएगा.

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कर्जमाफी की राह को फिसलनभरी करार देते हुए राज्य सरकारों से बहुत सोच-समझ कर यह राह चुनने की सलाह दी है. पटेल कहते हैं, "कर्जमाफी एक अस्थायी समाधान है. इससे देश की अर्थव्यवस्था और बैकों के एनपीए पर गहरा असर पड़ेगा. साथ ही राज्यों की ओर से बीते कुछ वर्षों के दौरान की गई प्रगति पर पानी फिर सकता है."

उपाय

ग्रामीण मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ कहते हैं, "कृषि क्षेत्र पर गहराते गंभीर संकट की अनदेखी कर किसानों की आत्महत्या पर अंकुश लगाने का प्रयास तमाम नलों को खुले छोड़ कर फर्श को सुखाने के लिए पोंछा लगाने की तरह है." वह कहते हैं कि इससे तात्कालिक राहत तो मिल सकती है, लेकिन समस्या हल नहीं हो सकती. सरकार को समस्या की जड़ तक पहुंच कर नीतियों में संशोधन के जरिए इस पर काबू पाने की पहल करनी चाहिए.

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा परिस्थिति नीतिगत खामियों और बरसों से कृषि क्षेत्र की अनदेखी का नतीजा है. देश में हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले एम.एस.स्वामीनाथन ने हाल में अपने एक लेख में कहा था कि खराब मानसून और खरीद मूल्यों में कमी की वजह से ही किसान कर्ज के ऐसे जाल में फंसते जाते हैं जिससे वह चाह कर भी बाहर नहीं निकल सकते. वह कहते हैं, "कर्जमाफी जैसी आसान राह चुनने की बजाय सरकार को कृषि क्षेत्र के लिए एक दीर्घकालीन सुरक्षित कर्ज प्रणाली स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए."

कृषि विशेषज्ञों ने बीते साल नवंबर में हुई नोटबंदी को भी इस समस्या की गंभीरता के लिए जिम्मेदार ठहराया है. ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि नवंबर, 2004 में स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों को लागू कर कृषि क्षेत्र की समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है. लेकिन वर्ष 2006 में सौंपी गई आयोग की सिफारिशें अब तक फाइलों में ही धूल फांक रही हैं. ऐसे में मौजूदा समस्या के समाधान के आसार कम ही हैं.

संबंधित सामग्री