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मंथन

थकावट पहचानेगी, दुर्घटना से बचाएगी कार

कंपनियां कारों को लगातार बेहतर और आरामदेह बनाने में लगी हैं. आने वाले दिनों में कारें इतनी स्मार्ट हो जाएंगी कि यह भी पता कर लेंगी कि ड्राइवर कहीं थक तो नहीं गया. ऐसी कारें भी होंगी जो खुद ही चलेंगी.

कारों की दुनिया लगातार बदल रही हैं. अब कारें कैमरा, सेंसर और रडार के साथ आने लगी हैं. यहां तक कि कारों ने देखना और सुनना भी सीख लिया है. ड्राइवरों के लिए अब कार चलाना कोई काम नहीं, बल्कि आराम बनता जा रहा है. कार चलाने के अनुभव को और आसान बनाने के लिए कार कंपनियां नए नए आइडिया के साथ बाजार में आ रही हैं.

थकावट की पहचान

जर्मन कार निर्माता मर्सिडीज बेंज कारों में ऐसे डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल कर रही है जो कारों को इतना इंटेलीजेंट बना देगा कि कार खुद समझ जाएगी कि ड्राइवर कब उसे चलाने की हालत में है और कब उसे आराम की जरूरत है. मर्सिडीज बेंज के योखेन हेरमन बताते हैं, "थकान को समझने वाला मुख्य सेंसर स्टीयरिंग ऐंगल सेंसर है. हम ड्राइवरों को उनके बैठने के हिसाब से अलग अलग कैटेगरी में बांटते हैं, क्योंकि हर ड्राइवर अलग तरीके से बैठ कर गाड़ी चलाता है." तो अगर आप हाइवे पर गाड़ी चला रहे हैं और सिस्टम समझ रहा है कि आप थक गए हैं, तो ना केवल वह फौरन आपको चेतावनी देगा, बल्कि जीपीएस नेविगेशन के जरिए यह भी पता लगा लेगा कि आसपास आराम करने की जगह कहां है.

सुरक्षित तरीके से ड्राइविंग

दुर्घटना से बचने के लिए जरूरी है कि ड्राइवर थका ना हो और सड़क पर इतना सतर्क रहे कि आसपास की गाड़ियों पर भी नजर रख पा रहा हो. लेकिन अगर साथ वाली कार नजर नहीं भी आ रही हो, तो भी डरने की कोई बात नहीं क्योंकि कार खुद ही चेतावनी दे देगी. कार में ऐसे सेंसर लगे हैं जो इस बात को समझते हैं कि आसपास की कार से कितनी दूरी बनी रहना जरूरी है. सेंसर जैसे ही खतरे को भांपेंगे, वे आगाह करने लगेंगे.

इतना ही नहीं, अगर कार लेन से बाहर जाने लगे तो उस हाल में स्टीयरिंग कांपने लगता है और आपको यह संदेश देता है कि आप कार को वापस अपनी लेन में ले आएं. इस तरह के सिस्टम को और बेहतर और ज्यादा भरोसेमंद बनाने पर काम किया जा रहा है.

IAA Frankfurt 2013 Vorstellung Smart Four

मर्सिडीज की स्मार्ट कार

खुद ही लग जाएगा ब्रेक

कल पुर्जे बनाने वाली कंपनी कॉन्टिनेंटल शहरी ट्रैफिक के लिए एक इमरजेंसी ब्रेक पर रिसर्च कर रही है. कार खतरे को भांप लेती है और भले ही 50 किलोमीटर की स्पीड से चल रही हो, टकराने से पहले कड़ा ब्रेक लगाती है. लेजर और कैमरे से यह तकनीक और बेहतर हुई है.

साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि मदद करने के लिए बनाया गया सिस्टम कहीं ड्राइवर के लिए और खतरनाक ही साबित न हो जाए. कॉन्टिनेंटल के मार्कुस श्नाइडर बताते हैं, "अगर सिस्टम बहुत पहले ही एक्टिव हो जाए, तो हो सकता है ड्राइवर झुंझला जाए. हो सकता है कि उसके पास भी बचने का और खुद ही ब्रेक लगाने का मौका हो. इसलिए सिस्टम को कुछ इस तरह फाइन ट्यून करने की जरूरत है कि यह तभी ब्रेक लगाए, जब ड्राइवर के पास किसी हादसे को रोकने का कोई चारा न बचे."

स्मार्टफोन से खतरा

जो सुविधाएं अब तक महंगी कारों में थीं, उन्हें अब कम दाम वाली कारों में भी लगाया जा रहा है. कार ड्राइवरों के संघ एडीएसी का मानना है कि तकनीकी मदद के बाद कार हादसों में कमी आई है. लेकिन उसकी चेतावनी है कि बहुत ज्यादा तकनीक से ड्राइवर पर जरूरत से ज्यादा बोझ पड़ता है. ध्यान भटकाने वाली सबसे खतरनाक चीज है स्मार्टफोन. इससे बचने के कंपनियां अब कारों को ही सीधे इंटरनेट से जोड़ रही हैं. मिसाल के तौर पर कारों में ऐप्स इंस्टॉल किए जा सकते हैं जो केवल ड्राइवर के एंटरटेनमेंट ही नहीं बल्कि सुरक्षा का भी ध्यान रखेंगे.

इस सब के अलावा बिना ड्राइवर वाली कार पर भी लंबे समय से रिसर्च चल रही है. कार को सेंसर और रडार से चलाने की कोशिश की जा रही है. इसके लिए भारी भरकम डाटा के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत है. हालांकि इंसान अब भी कार से बेहतर है और ड्राइविंग का अपना ही मजा है.

रिपोर्टः एल्के श्वाब/अनवर अशरफ

संपादनः ओंकार सिंह जनौटी

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