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विज्ञान

तो घुल जाएगा मूंगा

इंसान के अनुमान से कहीं ज्यादा महासागरों को खतरा है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वॉर्मिंग, ऑक्सीजन के गिरता स्तर और अम्लीकरण का एक साथ असर बहुत भारी पड़ सकता है.

महासागरों की दशा पर अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम इप्सो में काम करने वाले वैज्ञानिकों के गैर सरकारी समूह का कहना है कि महासागरों में बढ़ रहे तापमान के कारण समुद्री प्रजातियां ध्रुवों की तरफ विस्थापित हो रही हैं. इसके अलावा कई समुद्री प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं. इप्सो के वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सब के कारण महासागरों और परितंत्र को होने वाले नुकसान को हम वास्तविकता से कम आंक रहे हैं. कार्बन की मात्रा में होने वाली उथल पुथल और महासागरों में हो रहा अम्लीकरण, जितना इस समय हो रहा है उतना पृथ्वी के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ.

वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के कारण बढ़ रहे तापमान से महासागरों में भी गर्मी बढ़ रही है. समुद्र में बह कर आ रहे उर्वरक और नालों के पानी से शैवाल की मात्रा बढ़ रही है जिससे समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर घट रहा है. वायु में मौजूद कार्बनडायोक्साइड जब समुद्र के पानी में मिलता है तो कमजोर अम्ल बनाता है.

इप्सो के निदेशक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एलेक्स रॉजर्स ने बताया कि कार्बन की बढ़ती मात्रा और अत्यधिक मछलियां पकड़ना दोनों ही समुद्र को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह प्रभाव पूरी दुनिया में देखा जा रहा है.

विलुप्ति की राह पर

इस समय समुद्रों की मौजूदा हालत साढ़े पांच सौ करोड़ साल पहले जैसी है जिसे पेलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम के नाम से जाना जाता है, जब भारी संख्या में प्रजातियां विलुप्त हुई. रॉजर मानते हैं कि बदलाव की वर्तमान रफ्तार उससे ज्यादा है और इस कारण उसे भारी नुकसान पहुंच सकता है.

मूंगे, केंकड़े और घोंघे जैसे समुद्री जीव, जो अपने कंकाल की संरचना में कैल्शियम कार्बोनेट का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अम्लीकरण से बड़ा खतरा है. अगर अम्लीकरण की यही रफ्तार रही तो यह प्रजातियां विलुप्त भी हो सकती हैं.

दो डिग्री सेल्सियस से तापमान बढ़ने पर मूंगे की बढ़त रुक सकती है और तीन डिग्री पर वह घुल सकता है. 2015 तक दुनिया भर के करीब 200 देशों की सरकारों को जरूरत है कि वे एक साथ आकर कोई ऐसा रास्ता निकालें जिससे तापमान में होने वाली औसत वृद्धि को 2 डिग्री से ऊपर ना जाने दिया जाए. तापमान में अब तक 0.8 डिग्री की वृद्धि हो ही चुकी है. वैज्ञानिक मछली भंडारण के बेहतर प्रबंधन तंत्र की जरूरत पर भी जोर दे रहे हैं. उनके अनुसार मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले बड़े जालों पर रोक लगनी चाहिए और विकासशील देशों के क्षेत्रीय मछुआरों के हाथ में ज्यादा अधिकार होने चाहिए.

पिछले हफ्ते पर्यावरण परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरसरकारी दल (आईपीसीसी) ने इस संभावना की तरफ इशारा किया था कि 95 फीसदी ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए खुद मनुष्य जिम्मेदार है. जबकि 2007 में यही जिम्मेदारी 90 फीसदी थी.

रिपोर्ट: एसएफ/एएम (रॉयटर्स)

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