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ब्लॉग

तेजपाल कांड की सनसनी

तरुण तेजपाल अपने ही एक नॉवल, "मेरे कातिलों की कहानी" के एक किरदार जैसे दिखते हैं. उन पर लगे यौन दुराचार के आरोप ने सत्ता और ताकत, फिर चाहे वो मीडिया, पत्रकार और प्रतिष्ठा की ही क्यों न हो, उसे बेनकाब कर दिया है.

अपने पत्रकारीय और प्रबंधकीय तेज से देश-विदेश में अपार ख्याति, प्रताप और ऐश्वर्य बटोर चुके तरुण तेजपाल के इर्दगिर्द अब स्तब्धता, अपमान, शर्म, सजा और फजीहत का एक बड़ा घेरा खिंच गया है. तेजपाल कुख्यात यौन हमलावर, दुर्दांत भ्रष्टाचारी और निकृष्ट पेशेवर की तरह पेश किए जा रहे हैं. अचानक खबरों की और मुद्दों की सारी सुईयां तेजी से घूमती हुई तेजपाल पर अटक गई हैं. तेजपाल की कथित यौन जघन्यता की मीडिया कवरेज भी कम भयानक नहीं, ये देखकर भय ही लगता है. इस बहाने हम कॉरपोरेट पूंजीवादी मीडिया के कई विद्रूपों को भी पढ़ सकते हैं. मीडिया संस्थानों में पसरा हुआ उच्छृंखल मर्दवाद, एजेंडा सेटिंग का मीडिया उन्माद, ट्रायलवाद, श्रेष्ठता ग्रंथि, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, भाषा और कंटेंट का लिजलिजापन. इन गिरावटों की फेहरिस्त लंबी है.

याद करें कि टूजी घोटाले के राडिया टेप कांड में इसी मीडिया के एक बड़े हिस्से में कैसा सन्नाटा हो गया था जिसमें नामचीन पत्रकारों का भी जिक्र था. तेजपाल कांड की कवरेज में क्या वाकई एक वास्तविक नैतिक बेचैनी है. फिर ऐसा भूचाल तब क्यों नहीं दिखता जब कर्ज में डूबा घबराया एक किसान विधानसभा के सामने कीटनाशक की दो शीशियां गटककर अपनी जान ले लेता है, ठीक इन्हीं दिनों. क्या सिर्फ इसलिए कि उसमें कथित "सेलिब्रिटी" तत्व का अभाव है. कॉरपोरेट मीडिया इधर अपनी ऐसी हर कवरेज में क्यों संदिग्ध नजर आता है, इस पर सोचे जाने की जरूरत है.

तेजपाल की ओर लौटें, जिन्होंने आधी-अधूरी नैतिकता तो दिखाई लेकिन अपनी पत्रिका के दावे और यकीनन कुछ आला दर्जे की रिपोर्टिंग के बेमिसाल नमूनों में प्रदर्शित साहस को अपने भीतर नहीं उतार पाए. वही बेहतर तय करते कि साहस की वो कौनसी लाइन होनी थी जिसे उन्हें पार कर जाने का दुस्साहस करना था. गोवा निकले तो थे वो विचार के उत्सव के लिए जिसे थिंक फेस्ट कहा गया, लेकिन क्या कोई और नशा था जिसने उनकी विचार और विवेक प्रक्रिया को धुंधला किया था.

स्त्री या मनोरंजन की सामग्री

असल में जिस तरह की प्रवृत्तियां सामने आ रही हैं उनमें समाज और उसमें भी सबसे वंचित तबकों को घेरने, उसे अपमानित करने, उन पर हमला करने और उन्हें खदेड़ने के लिए नवउदारवादी दबंगई की भरमार है. तेजपाल की झपटमारी हो या बीजेपी के ‘वीर' नेता विजय जॉली का तहलका की पूर्व प्रबंध संपादक शोमा चौधरी के घर के बाहर नारेबाजी और नेमप्लेट पर कालिख पोतने की हरकत या गुजरात का स्नूपिंग कांड या इससे पहले दिल्ली मुंबई, यूपी, असम और देश के कई हिस्सों में हुई-होती आ रहीं बलात्कार की जघन्य वारदातें. और पीछे चले जाएं- एक अंग्रेजी टीवी चैनल के स्वनामधन्यों की सोशल एक्टिविस्ट शबनम हाशमी और लेखिका अरुंधति रॉय के साथ बदसलूकी. एक चैनल का दिल्ली की शिक्षिका उमा खुराना का फर्जी स्टिंग. और पीछे भी जाएं तो 2002 के दंगों में महिलाओं पर हुई अकल्पनीय बर्बरता, 1992-93, 1984, 1947. आजाद भारत की तारीखों से भी पीछे जाएंगें तो आप स्त्री शोषण की भयावह दास्तानें पाते रहेंगे.

अलग अलग दौरों में ये समाज में वास्तविक घटनाएं हैं और इसी के समानांतर आप सिनेमा, टीवी, विज्ञापन यानी सभी किस्म के मास मीडिया में देखेंगे- वहां महिलाओं को ज्यादातर किस रूप में पेश किया जा रहा है. पुरुषों के पीछे भागती हुईं, वासना और कामुकता में सराबोर दिखतीं, कृत्रिम दमक में भीगी हुई, खाना बनाती, लाती और ले जाती हुई, कार और साबुन और मशीन के साथ खड़ी की जाती हुईं. हर हाल में औरत का कमॉडिफिकेशन हो रहा है- उत्पाद के रूप में प्रस्तुति. स्त्री के विरुद्ध हिंसा की एक गली यहां से भी निकलती है. और ये सिर्फ भारत की बात नहीं है.

Indien Autor Tarun Tejpal

तेजपाल फिलहाल गोवा पुलिस की गिरफ्त में

तथाकथित संभ्रातवाद का जहर

फिर वो इठलाया इतराया ग्लैमर और नाना खुश्बुओं में नहाया समाज. पेज थ्री कल्चर की वे लेडीज और वे जेंटलमन. वो इलीट, संभ्रांत और नवबुर्जुआ तबका. जहां अपार इच्छाएं और अपार वासनाएं लगातार चक्कर काटती रहती हैं. सवाल पूछा जा सकता है कि तेजपाल क्या ऐसी ही संस्कृतियों में आवाजाही करते थे और अपने शानदार काम की हिस्ट्री के बाद उसे कुछ ज्यादा ही बेरहमी से एन्जवाय कर रहे थे. वे सफल थे. सफलता का नशा भी उन्हें भरपूर था. गोवा में थिंक फेस्ट इलीट बौद्धिकता में चूर आयोजन था. उसके स्पॉंन्सर वही कैसे हो गए जो यूं तहलका के मौलिक विचार से मेल नहीं खाते थे. क्या तहलका भी इस पूंजीवादी झंझावात में ढह रहा था.

तेजपाल को सर्वोत्तम साधन और सर्वोत्तम सुविधाएं हासिल थीं और जिन मूल्यों को लेकर उन्होंने नाम कमाया था, थिंक फेस्ट से निकलकर लिफ्ट की ओर जाते हुए वे उनके बारे में कैसे भूल गए. क्या वे इतने मदांध थे. जैसा कि बताया जा रहा है, एक स्त्री को दबोचने वाले कामांध और निर्मम शिकारी वो कैसे बन गए. अरुंधति रॉय ने ठीक कहा है कि ये वाकई दिल तोड़ देने वाली बात थी. एक बहुत भारी पत्थर हम सब पर गिरा है. लेकिन इसमें चटखारे लेना, सनसनी या उत्तेजना पैदा करना शर्मनाक है. आप अक्सर देखेंगे कि हर बार ऐसे मौकों पर मर्दवाद ही जीतता है. वही एजेंडा तय करता है, वही नैतिकता और न्याय के छींटे बिखेर कर एक नई मौज की तलाश में निकल पड़ता है.

तेजपाल प्रकरण के निहितार्थ समझने होंगे, बात कामातुर संपादक और यौन हमले से उबर कर निकली युवा पत्रकार की ही नहीं है, बात उस सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक आक्रमण और कब्जे की भी है जो बुर्जुआ ताकतों ने ऐतिहासिक रूप से सर्वहारा पर किया हुआ है. यहां बुर्जुआ की जगह पुरुष और सर्वहारा के बदले स्त्री रखकर भी देख सकते हैं.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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