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दुनिया

तुर्की पर सीरिया के शरणार्थियों का बड़ा बोझ

सीरिया में गृहयुद्ध के चलते ज्यादातर लोग सीमा पार कर पड़ोसी देश तुर्की में शरण लेते हैं. अब वे भले ही यूरोपीय देशों में आ रहे हों लेकिन पिछले पांच साल में सीरिया से भागे 40 लाख लोगों में से लगभग आधे तुर्की में हैं.

तुर्की शरणार्थियों की सबसे ज्यादा तादाद वाला देश बन गया है. गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 82 शहरों में सीरिया से आए 19,05,984 शरणार्थी पंजीकृत हैं. 10 शहरों में 25 शरणार्थी कैंप लगाए गए हैं. इनमें रहने वालों की संख्या ढ़ाई लाख से ज्यादा है. यानि बाकी के साढ़े 16 लाख सीरियाई शरणार्थी कैंपों के बाहर रहने पर मजबूर हैं. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यह संख्या अभी और बढ़ेगी और 2015 के अंत तक देश में 25 लाख से ज्यादा सीरियाई शरणार्थी होंगे.

तुर्की इन पर अब तक छह अरब डॉलर खर्च चुका है. देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को देखते हुए भविष्य में शरणार्थियों से निपटना मुश्किल हो सकता है. सबसे बड़ी चुनौती है शरणार्थियों के बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने की. तुर्की में संयुक्त राष्ट्र की प्रवक्ता सेलिन उनाल का कहना है कि शिक्षा के अभाव में शरणार्थियों का समाज में समेकन मुश्किल होगा.

इसके बाद एक बड़ी समस्या है नागरिकता की. तुर्की में शरणार्थियों पर किताब लिखने वाले प्रोफेसर मुरात एर्दोआन का कहना है कि शरणार्थी जितने ज्यादा वक्त के लिए दूसरे देश में रहते हैं, उतनी ही उनकी वहां बस जाने की संभावना बढ़ जाती है, खास कर अगर लौटने के लिए कोई "वतन" बचा ही ना हो. उनका मानना है कि तुर्की आ चुके 75 से 80 फीसदी सीरियाई शरणार्थी अपने देश नहीं लौटेंगे.

जब बड़े पैमाने पर पलायन होता है, तब शरणार्थियों के लिए दरवाजे खोलने वाले देश पर उन्हें नागरिकता देने का दबाव तो बनता है लेकिन वह देश उसे आखिरी विकल्प के रूप में ही रखता है. प्रोफेसर एर्दोआन का कहना है, "पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है. अमेरिका में भी एक करोड़ से ज्यादा गैरनागरिक आप्रवासी हैं, जो सालों से वहां रह रहे हैं." उनका कहना है कि अगर शरणार्थी तुर्की में ही रहते हैं और उन्हें नागरिकता नहीं दी जाती है, तो इससे उनके समेकन पर बुरा असर पड़ेगा.

वहीं इसके विपरीत तुर्की में लोग शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने का विरोध कर रहे हैं. इससे निपटने के लिए प्रोफेसर एर्दोआन की सलाह है कि एक समय सीमा के बाद शरणार्थियों को "ग्रीन कार्ड" जैसा कोई विकल्प दिया जाना चाहिए ताकि वे असुरक्षित ना महसूस करें और इसके बाद नागरिकता के बारे में सोचा जाना चाहिए.

इसके अलावा शरणार्थियों को अपने गुजर बसर के लिए नौकरियों की भी जरूरत है. दक्षिण पूर्वी तुर्की में शरणार्थियों के आने के बाद से अवैध बाल मजदूरी के मामले बढ़े हैं. प्रोफेसर एर्दोआन बताते हैं, "सस्ते श्रमिकों के कारण अपनी नौकरी छिन जाने का डर विदेशियों या शरणार्थियों के प्रति गुस्से, नफरत और अस्वीकृति की वजह बन जाता है. इससे बचने के लिए उन्हें कानूनी दर्जा देना जरूरी है. और नौकरियों को ले कर भी योजनाएं बनानी होंगी."

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार शरणार्थियों की मदद के लिए 5.5 अरब डॉलर की जरूरत है. जबकि जुलाई 2015 तक इसका एक चौथाई ही जमा किया जा सका है. संयुक्त राष्ट्र की सेलिन उनाल सीरिया के गृहयुद्ध को "यूएनएचसीआर के इतिहास का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट" बताती हैं. तुर्की द्वारा इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों को पनाह देने के लिए वे उसकी सराहना करती हैं और साथ ही मानती हैं कि किसी भी देश के लिए लंबे समय तक ऐसा करना एक बड़ी चुनौती है. वे कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय जितनी मदद कर रहा है, वह काफी नहीं है. हम यूरोपीय संघ और पूरी दुनिया से आग्रह करते हैं कि शरणार्थी संकट से निपटने के लिए एक मजबूत प्रणाली बनाएं और सब अपनी जिम्मेदारी उठाएं."

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