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दुनिया

तुर्की की सीरिया नीति में बदलाव

तुर्की की सरकार और कट्टरपंथी इस्लामिक स्टेट के बीच सहयोग पर अफवाहें रही हैं. तुर्की विशेषज्ञ गुंटर जोयफर्ट बता रहे हैं कि यदि तुर्की में हाल में हुए हमलों में आईएस का हाथ है तो तुर्की के रवैये में क्या बदलाव आएगा.

डॉयचे वेले: मिस्टर जोयफर्ट कुर्द गुटों का कहना है कि सुरुच पर हुए हमले के लिए तुर्की की सरकार भी जिम्मेदार है क्योंकि वह कुर्दों के खिलाफ लड़ाई में आईएस का समर्थन कर रही है. क्या यह आरोप उचित है?

जोयफर्ट: अब तक इस्लामिक स्टेट को तुर्की की मदद का कोई ठोस सबूत नहीं है. लेकिन हमें पता है कि तुर्की औपचारिक रूप से जिहादी गुटों का भी समर्थन करता है. मसलन अल नुसरा फ्रंट जिसे वह सऊदी अरब के साथ मिलकर प्रशिक्षण और हथियार दे रहा है. इस्लामिक स्टेट और अल नुसरा फ्रंट का एक ही वैचारिक रुख है. इसके अलावा जब जून में कुर्दों ने आईएस को अबयाद शहर से खदेड़ दिया था तो तुर्की ने इस पर चिंता व्यक्त की थी कि सीरिया में कुर्द अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ा सकते हैं और इसे तुर्की के लिए खतरा बताया था.

सीरिया में गृहयुद्ध की शुरुआत के बाद से तुर्की की नीति डर से प्रभावित है कि कुर्द सीरिया में स्वशासी इलाका कायम कर सकते हैं. इसके विपरीत आईएस के खतरे को हमेशा कमतर आंका गया है क्योंकि तुर्की की सरकार का मुख्य लक्ष्य सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद को सत्ता से हटाना है.

Deutschland Türkei- und Islam-Experte Günter Seufert in Berlin

गुंटर जोयफर्ट

इलाके में सीरिया, इराक और कुर्दों के प्रति तुर्की की दीर्घकालीन नीति की व्याख्या कैसे की जा सकती है?

तुर्की का दीर्घकालीन लक्ष्य पूरे इलाके में साफ तौर पर तुर्की के अंदर और तुर्की से बाहर कुर्दों के स्वायत्त प्रशासन को रोकना था. लेकिन इस रणनीति को जारी नहीं रखा जा सकता. हम देख रहे हैं कि तुर्की की सरकार को जो देश में तीस साल से कुर्द संगठन पीकेके के खिलाफ लड़ रही है, उसके साथ वार्ता करनी पड़ रही है. यह नीति विफल हो जाएगी क्योंकि कुर्दों के राष्ट्रीय आंदोलन की गति को रोकना संभव नहीं है.

यदि अब पता चले कि तुर्की में हमले में आईएस का हाथ है, फिर क्या यह रणनीति बदलेगी? क्या यह बोतल से निकले जिन्न की मिसाल है?

हां, निश्चित तौर पर. लेकिन यह भी समझना होगा कि यह तुर्की में इस्लामिक स्टेट का पहला हमला नहीं है. पिछले महीनों में तीन हमले हुए हैं, लेकिन यूरोपीय जनमत को इसका पता नहीं है. अब हम देख रहे हैं कि तुर्की इन हमलों के कारण और अमेरिकी दबाव में अपनी रणनीति बदल रहा है. पिछले हफ्तों में आईएस के सिलसिले में पहली बार गिरफ्तारियां हुई हैं. किए गए हमलों के लिए नहीं बल्कि आईएस के समर्थकों की गिरफ्तारियां. ये एकदम नया है कि पुलिस आईएस के खिलाफ कारर्वाई कर रही है और सेना भी रिपोर्ट दे रही है कि सीमा पर कितने लोगों को पकड़ा गया है.

अमेरिका और यूरोप डेढ़ साल से तुर्की से यूरोप और दूसरे इलाकों के लड़ाकों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं. अब तुर्की ने यह करना शुरू किया है. और कुछ लोगों का मानना है कि ताजा हमला आईएस की बदले की कार्रवाई थी.

क्या इसके पीछे तुर्की की अपनी समझ भी है कि आईएस के विचार वाला कट्टरपंथी इस्लाम तुर्की को अस्थिर कर सकता है क्योंकि तुर्की की जनता के बीच आईएस के लिए सहानुभूति मौजूद है?

तुर्की समरूपी देश नहीं है. रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी जैसा धर्मनिरपेक्ष विपक्ष दो साल से सीरिया नीति में बदलाव की मांग कर रहा है. संसद में एक कानूनी कुर्द पार्टी है जो सरकार और खुफिया एजेंसियों पर आईएस के समर्थकों की गतिविधियों को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रही है. इस समय बहुत से कट्टरपंथी तुर्क नौजवान और कट्टरपंथी कुर्द भी आईएस की कतारों में लड़ रहे हैं. इसी तरह तुर्की के बहुत से वामपंथी धर्मनिरपेक्ष कुर्द सीरियाई कुर्दों के साथ लड़ रहे हैं.

इसका मतलब है कि पिछले दो सालों में तुर्की ने इसे मान लिया है कि उसके नौजवान नागरिक सीरिया के गृहयुद्ध में अलग अलग मोर्चों पर लड़ रहे हैं और उसने इसके खिलाफ कुछ भी नहीं किया है. उसे अब दिख रहा है कि सीरिया के गृहयुद्ध में उसके हस्तक्षेप का ठीकरा उसके सिर पर फूट रहा है. इसलिए यह नीति बदलनी चाहिए और बदलेगी. तुर्की की समस्या यह है कि वह अब तक अपनी कुर्दों की समस्या हल नहीं कर पाया है. वह इस मुश्किल से तभी बच पाएगा जब वह अपनी कुर्द नीति बदले.

डा. गुंटर जोयफर्ट बर्लिन के अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा शोध संस्थान एसडब्ल्यूपी में तुर्की के विशेषज्ञ हैं.

इंटरव्यू: क्रिस्टॉफ हाजेलबाख/एमजे

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