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दुनिया

तुर्की की लड़ाई और जर्मनी में विवाद

तुर्की को सीरियाई हमलों के खिलाफ सुरक्षित करने के लिए नाटो सदस्य देश तुर्की को आधुनिक पेट्रियट मिसाइल देंगे. जर्मनी यह मिसाइल तैनात कर सकता है, लेकिन क्या जर्मन सेना और संसद इस मामले में एकमत हो पाएंगे.

तुर्की और सीरिया के बीच सीमा की लंबाई करीब 900 किलोमीटर है. हाल ही में सीरिया से मोर्टार तुर्की की सीमा में आ गए जिससे इस बात की आशंका बढ़ गई कि सीरिया का गृहयुद्ध देश के बाहर भी फैल सकता है. तुर्की के विदेश मंत्री अहमत दावुतोग्लू ने कहा, "जो देश नाटो को पेट्रियट मिसाइल मुहैया कराते हैं, उनके बारे में पता है. इस सिलसिले में औपचारिक बातचीत अंतिम स्तर पर हैं." नाटो प्रमुख आंदर्स फो रासमुसेन ने पत्रकारों को बताया कि मिसाइल तैनात करने का मतलब नहीं कि सीरिया पर उड़ान रोकने का फैसला लिया जाएगा और यह केवल इसलिए है ताकि सीरिया के मॉर्टर हमलों से बचा जा सके.

सीरियाई विद्रोही राष्ट्रपति बशर अल असद की सेना से लड़ रहे हैं और रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने देश के कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया है. विद्रोही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीरिया में उड़ानों पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं. पेट्रियट मिसाइल केवल अमेरिका, नीतरलैंड्स और जर्मनी के पास हैं. जर्मनी ने कहा है कि वह इस बारे में एकीकृत विचार करेगा क्योंकि विदेश में लड़ाई के लिए हथियार तय करना जर्मनी के लिए आसान काम नहीं है. इसके पीछे दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हालत एक अहम भूमिका निभाती है.

इतिहास

हिटलर की जर्मनी पर जीत हासिल करने के बाद मित्र देश अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस ने जर्मनी का पूरा शस्त्रीकरण शुरू किया. 1949 में बने जर्मन संविधान ग्रुंड गेजेट्स में सेना के लिए कोई नियम नहीं शामिल किए गए. 1950 के दशक में भारी विवाद के बाद और शीत युद्ध से बढ़ते तनाव को देखते हुए जर्मन सेना के दोबारा गठन के बारे में सोचा गया. जर्मन सेना का मकसद साफ था- नाटो देशों के संघ के तहत क्षेत्रीय सुरक्षा. जहां तक विदेशों में जर्मन सेना को तैनात करने की बात थी, उसे विदेशों में केवल आपातकालीन मदद और राहत के लिए जाने की इजाजत थी.

शीत युद्ध के खत्म होने के बाद जर्मनी पर सुरक्षा की भी जिम्मेदारी आई. लेकिन इसे किस कानूनी आधार पर किया जा सकता था? सारलांड में यूरोप इंस्टीट्यूट के थोमास गीगेरिश कहते हैं, "समस्या जर्मन एकीकरण के बाद अहम हो गई. और इस बारे में विवाद बना रहा क्योंकि ग्रुंड गेजेट्स भी इस बारे में साफ नहीं है." जर्मन संसद की अनुमति के बगैर विदेश में सेना को तैनात नहीं किया जा सकता. 1994 में जर्मन संवैधानिक अदालत ने फैसला लिया जिसमें कहा गया कि जर्मन सेना को किसी भी देश में सशस्त्र तैनात होने के लिए जर्मन संसद से मंजूरी लेनी होगी. लेकिन इस कानून में भी तब बदलाव लाए जा सकते हैं जब संकट बहुत ज्यादा हो और खतरा बढ़ जाए. उस स्थिति में जर्मन सरकार बिना संसद की मंजूरी के अपने सैनिकों को कहीं भी तैनात करने की इजाजत दे सकती है. लेकिन इसके बाद फिर संसद से अनुमित लेनी होगा. अगर सांसद मानते हैं कि सेना को वापस जर्मनी लाना चाहिए तो ऐसा ही किया जाएगा. जर्मन संसद के प्रभाव की वजह से जर्मन सेना को 'संसद की सेना' का नाम भी दिया गया है. 2005 में इस सिलसिले में संसद की हिस्सेदारी पर कानून पारित किया गया.

कानून पर मतभेद

इसके बावजूद कानून को लेकर आए दिन सवाल उठते रहते हैं. जैसा कि गिगेरिश कहते हैं, "सवाल मिसाल के तौर पर यह है, कि हथियारों के साथ तैनात होने को आप क्या समझते हैं." अगर जर्मन सेना को केवल किसी देश में भेजा जाए और वहां पर दुश्मन को केवल दिखावे से भगाने की कोशिश की जाए तो शायद संसद से मंजूरी लेना उतना जरूरी नहीं. लेकिन संसद और सेना के बीच ऐसे कई विवाद होते रहते हैं. यूरोपीय शांति और सुरक्षा शोध केंद्र के हांस गेयोर्ग एयरहार्ट का कहना है कि ऐसे विवाद होते रहते हैं क्योंकि कार्यकारिणी कोशिश करती है कि उसका प्रभाव बढ़े और इसके खिलाफ बोलने वाले कहते हैं कि उसे अपनी सीमा में रहना चाहिए.

मिसाल के तौर पर सोमालिया में यूरोपीय संघ की सेना में जर्मन सैनिक भी हैं और संसद की स्वीकृति के बगैर सोमालिया में समुद्री डाकुओं के खिलाफ काम कर रहे हैं और वहां के सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. इस सिलसिले में संसद से मंजूरी नहीं मांगी गई. एयरहार्ट का कहना है कि यह असैनिक काम है भले ही सोमालिया में सैनिक तैनात हों. लेकिन जहां तक तुर्की का सवाल है, एयरहार्ट मानते हैं कि इसमें संसद को लाना जरूरी होगा क्योंकि सीरिया और तुर्की में जवाबी कार्रवाई हो सकती है और संसद को पहले तो मंजूरी देनी ही होगी.

रिपोर्टः रेचल गेसाट/एमजी

संपादनः आभा मोंढे

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