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OLD - जर्मन चुनाव

तीसरी बार मैर्केल की जीत

कुछ लोग मानते है कि चांसलर मैर्केल जर्मनी पर रानी ती तरह राज करती हैं. लोकतंत्र में इसे तारीफ नहीं माना जा सकता, लेकिन मैर्केल की ताकत, उनकी छवि और उनका चुनाव प्रचार यही छाप छोड़ता है.

जब अंगेला मैर्केल 2005 में पहली बार जर्मनी की चांसलर बनीं तो उस समय ऐसे लोगों की कमी नहीं थीं जिन्हें शक था कि उनके पास इस पद के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी. लेकिन आलोचकों में से कम ही लोगों ने सोचा होगा कि यही महिला तीसरी बार भी चांसलर बनेंगी. आज तक ऐसा केवल कॉनराड आडेनावर और हेल्मुट कोल ने किया है जो 1949 से लेकर 1963 और 1982 से लेकर 1998 तक चांसलर रहे.

यह कहना सही नहीं होगा कि मैर्केल की किस्मत अच्छी थी. उन्होंने सत्ता की अपनी इच्छा चांसलर के दफ्तर में आने से पहले ही दिखानी शुरू कर दी. सीडीयू में चंदा कांड के कुछ ही समय बाद मैर्केल ने एक अखबार लेख के जरिए अपने राजनीतिक गुरू कोल के प्रति वफादारी छोड़ दी. उसके कुछ ही बाद वह सीडीयू की अध्यक्ष बनीं. सरकार का अनुभव उन्होंने कोल मंत्रिमंडल के सदस्य के रूप में ही हासिल कर लिया था.

यूरोप में अहमियत

मैर्केल की कूटनीति ने उन्हें यूरोप और जर्मनी में एक अहम राजनीतिज्ञ बनाया है. उन्होंने जनता से वादा किया था कि जर्मनी आर्थिक संकट से और ताकतवर बनकर निकलेगा. और ऐसा लग रहा है कि अर्थव्यवस्था और बेरोजगारों की संख्या कम हो रही है. विदेशों में उन्होंने स्पष्ट तौर पर जर्मनी को आगे बढ़ाया. जी8 और यूरोपीय संघ के सम्मेलनों में उन्होंने आश्वासन दिया कि जर्मनी के पैसों की वह भली भांति देखभाल कर सकती हैं. अमेरिका और ब्रिटेन में वह दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिला मानी जाती हैं. यूरोप में यूरो को बचाए रखने में उनकी बड़ी भूमिका रही. उन्होंने जर्मनी को ही नहीं बल्कि यूरोप को आर्थिक परेशानियों से बाहर निकालने का वादा किया. हालांकि वह कहती हैं कि यूरोपीय देशों को मदद केवल कुछ शर्तों पर ही मिलेगी, लेकिन यही मैर्केल का तरीका है जिससे कि यूरोप दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा में रहे.

सीडीयू में बदलाव

अपनी पार्टी को भी मैर्केल ने बदला है. पहले तो सीडीयू में ही उनके कई प्रतिद्वंद्वी थे. लेकिन मैर्केल ने या तो इन्हें अपने रास्ते से हटाया या फिर वे खुद धांधली के मामलों में फंस गए. मैर्केल के लिए राजनीतिक कमजोरी और बेवफाई किसी सदस्य को पार्टी से निकालने के लिए काफी है. राजनीति में ताकत चाहिए और वह इसका बखूबी इ्स्तेमाल करती हैं, सब कुछ बदलने के लिए. परमाणु ऊर्जा, सेना में अनिवार्य सेवा और परिवार, मैर्केल के आने के बाद यह सब कुछ बदला है. 2011 में उन्होंने जर्मनी में परमाणु बिजली घरों को बंद करने का फैसला लिया था.

तो क्या मैर्केल अवसरवादी हैं? आलोचक यही मानते हैं और यह भी कहते हैं कि मैर्केल ने क्रिस्टियन डेमोक्रैट्स को समाजवादी बना दिया है. इसलिए कई सदस्य अल्टरनाटीवे फ्युअर डॉयचलांड (यानी जर्मनी के लिए विकल्प) नाम की पार्टी में सदस्यता ले रहे हैं. लेकिन जर्मन युवा पीढ़ी मैर्केल को पसंद करती है और मैर्केल को दोबारा चांसलर बनाने में इनका बड़ा हाथ है.

संकट की चांसलर

कई सालों से मैर्केल को जनता का समर्थन मिल रहा है. इसके लिए भी मैर्केल ने मेहनत की है. वित्तीय संकट के दौरान उन्होंने जर्मनी को स्थिर बनाने और अर्थव्यवस्था को एक दिशा देने में बड़ी भूमिका निभाई. राजनीतिक विश्लेषक कार्ल रूडॉल्फ कोर्टे कहते हैं, "वैसे तो वह बिना किसी जज्बे के और बिलकुल संजीदा लगती हैं लेकिन वह ईमानदार और सच्ची हैं, वह मतदाताओं की सेवा कर रही हैं, ऐसा नहीं लगता कि वह खुद अपने स्वार्थ के लिए कुछ कर रही हैं."

मैर्केल के दिखावे पर जाएं, तो वह भी स्थिर ही है. उनका हेयरस्टाइल इतने सालों में ज्यादा बदला नहीं. उनके जैकेट और स्कर्ट का स्टाइल भी एक सा रहता है, उनके रंग ज्यादा नहीं बदलते. बाहर की दुनिया में भले ही उथल पुथल हो, लेकिन मैर्केल शांत रहती हैं. और उनके हाथों की मुद्रा को देखकर लगता है कि जर्मनी का भविष्य इन हाथों में सुरक्षित है.

लेकिन मैर्केल के निजी जीवन के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं. वह बर्लिन में अपने पति के साथ रहती हैं और छुट्टियां बर्लिन के पास उकरमार्क में बिताती हैं. वहां उनकी मां रहती हैं.

रिपोर्टः काई अलेक्सांडर शॉल्त्स/एमजी

संपादनः महेश झा

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