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डीडब्ल्यू अड्डा

"तासीर की हत्या से पाक में अस्थिरता बढ़ेगी"

जर्मन भाषी अखबारों में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद पाकिस्तान चर्चा में बना हुआ है. साथ ही भारत में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बाद जर्मन प्रेस उसकी कड़ी निंदा कर रहा है.

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इस्लामाबाद में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की गोली मारकर हत्या कर दी गई. तासीर पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी, पीपीपी के एक वरिष्ठ सदस्य और राष्ट्रपति जरदारी के करीबी थे. तासीर ने अपने पंजाब प्रांत की एक ईसाई महिला आसिया बीबी के समर्थन में तर्क दिया था. आसिया बीबी को ईशनिन्दा के लिए मौत की सजा सुनाई गई है. इस मामले पर रोशनी डालते हुए जर्मनी के प्रमुख अखबार फ्रांकफुर्टर आलगमाइने साइटुंग ने लिखा:

जिस गवर्नर की हत्या की गई वह एक उदार नेता थे, जो पश्चिमी जीवनशैली से अपना जीवन व्यतीत करते थे और खास धार्मिक नहीं थे. उन्होंने ईशनिन्दा कानून को खत्म करने की मांग की थी, और इसी ने उन्हें कट्टरों का दुश्मन बना दिया. ... गवर्नर की हत्या से देश की राजनैतिक स्थिति और भी अस्थिर हो जाएगी. यह घटना ऐसे समय में घटी है, जब ज़रदारी के नेतृत्व वाली पीपीपी की सरकार पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रही है.

जर्मनी के बर्लिन से प्रकाशित होने वाले अखबार टागेसाइटुंग का भी मानना है कि पाकिस्तान एक राजनैतिक संकट के दौर से गुजर रहा है. पिछले सप्ताह के अंत में पीपीपी ने अपने गठबंधन के मुख्य साझीदार एमक्यूएम को खो दिया.अखबार में लिखा गया है:

राजनैतिक संकट अब और गहरा सकता है क्योंकि पाकिस्तानी संसद इस इस्लामी देश की बड़ी समस्याओं को हल करने के लिए किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहा है. दूसरी ओर सरकार के जल्द गिरने की भी कोई आशंका नहीं है. दो बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी दल पीएमएल-एन ने भी फिलहाल सरकार का भार संभालने में कोई ख़ास रूचि नहीं दिखाई है. पार्टी के भीतर सूत्रों का कहना है कि शरीफ अपनी वापसी से पहले थोडा और इंतजार करना चाहते हैं. पीएमएल-एन पंजाब प्रांत में बहुमत में है. राजनैतिक तौर पर पंजाब बेहद महत्वपूर्ण प्रांत है. जरदारी द्वारा नियुक्त किए गए गवर्नर की मौत से शरीफ की पार्टी को सत्ता में फ़ाएदा होगा.

भारत पर नजर

दुनिया के राष्ट्र प्रमुखों ने अपनी अपनी दिल्ली यात्रा में भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत की तारीफ की. जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल भी 2011 में दिल्ली जाना चाहती हैं. बर्लिन के दैनिक टागेसश्पीगेल ने लिखाः

दुनिया के ताकतवर देशों की भारत में रुचि केवल व्यावसायिक है. विकसित देश लगातार अपने उत्पादों के लिए नया बाजार ढूंढ रहे हैं ताकि अपने ढीले पड़े बाजार में वह गति ला सकें. जहां एक तरफ अमेरिका वित्त और आर्थिक संकट के बाद वाली मुश्किलों से दो चार हो रहा है और यूरोप मुद्रा संकट से गुजर रहा है. वहीं भारत आर्थिक और वित्तीय तूफान से बहुत अच्छे से बाहर निकल आया है. हालांकि चीन से भारत अभी भी बहुत पीछे है लेकिन भारत के सहयोग की सभी को जरूरत है. एक ओर भारत 1.2 अरब की आबादी के साथ चीन के बाद भविष्य में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है, वहीं दिल्ली मूलभूत संरचना को बेहतर करने के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स की योजना बना रहा है और हथियारों की खरीद की भी. ऐसे में पश्चिमी देशों की नजरें भारत पर ही गड़ी हुई हैं क्योंकि वह भी विकास में अपना हिस्सा चाहते हैं. लेकिन गरीब लोगों तक इस कारोबारी क्रांति का कोई फायदा अभी तक नहीं पहुंच सका है.

एक के बाद एक शर्मिंदा करने वाले घोटालों के कारण फिलहाल भारत के प्रधानमंत्री की नींदें उड़ी हुई हैं. इस सब के बाद मनमोहन सिंह को प्याज के बढ़ते दामों से जूझना पड़ रहा है. नौए ज्युरिषर साइटुंग लिखता है कि कुछ ही दिनों में प्याज की कीमतें 35 रुपये प्रति किलो से बढ़ कर दुगने से ज्यादा 80 रुपये तक पहुंच गई हैं.

लंबे समय से भारत बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है और प्याज की आसमान छूती कीमतों के बाद स्थिति हाथ से बाहर निकलती दिख रही है. सरकार इस समस्या को पूरी गंभीरता से ले रही है और ले भी क्यों नहीं, क्योंकि 2011 में कई राज्यों में चुनाव होने हैं. प्रधानमंत्री ने मामले से जुड़े सभी मंत्रियों से अपील की है कि प्याज के दाम सामान्य करने की वह हर संभव कोशिश करें. साथ ही उन्होंने प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है और आयात शुल्क शून्य कर दिया है. इतना ही नहीं भारत ने अपने दुश्मन पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी प्याज मंगवाने शुरू कर दिए हैं. बढ़ती कीमतें सिर्फ प्याज तक ही सीमित नहीं हैं. भारी मॉनसून के कारण दूसरी भी फसलों पर बुरा असर पड़ा है. पिछले दिनों आलू को छोड़ कर बाकी सब्जियों की कीमतों में भारी तेजी आई. प्रधानमंत्री को अभी यह मुद्दा सुलझाने में काफी समय लगेगा.

अंत में एक नजर नेपाल की ओर: नेपाल में माओवादियों की संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी (वीकेपीएन-एम) ने जोरदार मांग की है कि नेपाल में संयुक्त राष्ट्र मिशन को कम से कम मई के अंत तक बढ़ा दिया जाए. हालांकि गठबंधन सरकार ने निर्णय लिया है कि संयुक्त राष्ट्र मिशन की प्रमुख कारिन लैंडग्रेन और उनके सहयोगी 15 जनवरी को ही वापस चले जाएं. जर्मनी के समाजवादी अखबार नोयस डॉयचलांड ने लिखा है कि माओवादियों ने इस निर्णय की आलोचना की है :

माओवादियों के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने हाल ही में कहा है कि अल्पकालीन सरकार संयुक्त राष्ट्र की शांति प्रक्रिया को पूरी तरह से नाकाम करना चाहती है. इसीलिए उसने संयुक्त राष्ट्र मिशन के यहां और कुछ समय तक रहने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. इस बारे में उन्होंने शंका जाहिर की है कि देश में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया पूरी हो सकेगी और लंबे समय से चला आ रहा संवैधानिक सुधार हो सकेगा. संविधान समिति में माओवादी पार्टी का बहुमत है इसलिए उनकी प्राथमिकता है कि माओवादी लड़ाकों का समाज में फिर से समेकन हो या फिर सेना में उन्हें जगह दी जाए. उन्हें इस बात का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र मिशन के वहां न होने से यह बात लटकती रहेगी. इसलिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को एक चिट्ठी लिख कर उन्हें इस बात की विनती की है कि वह यहां संयुक्त राष्ट्र मिशन की अवधि बढ़ाएं क्योंकि उसका काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है. लेकिन सूचना मंत्री शंकर पोखरल का मानना है कि वीकेपीएन(एम) केवल यही चाहती है कि समय निकलता रहे ताकि उसे विद्रोह करने के लिए वक्त मिल जाए.

रिपोर्टः अना लेहमान/ईशा भाटिया

संपादनः आभा एम

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