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दुनिया

तालिबान की पिच पर इमरान

पाकिस्तान सरकार से बातचीत में तालिबान पूर्व क्रिकेटर इमरान खान सहित पांच लोगों को मध्यस्थ बनाना चाहता है. लेकिन उनकी पार्टी अभी जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं दिख रही है. तालिबान से बातचीत कभी कामयाब नहीं हो पाई है.

तालिबान ने अपनी तरफ से बयान जारी कर कहा है कि वह इमरान को इस बातचीत में अगुवा बनाना चाहते हैं. तालिबान के ईमेल में कहा गया, "तालिबान सरकार के साथ बातचीत करना चाहता है. और वह यह काम पूरी ईमानदारी और गंभीरता से चाहता है." इसमें कहा गया है कि वह "ऐसी टीम बनाना चाहता है, जो आसानी से सरकार से बातचीत कर सके." पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पहले ही कह चुके हैं कि वह तालिबान से बातचीत के लिए तैयार हैं.

इस प्रस्ताव के बाद इमरान की तहरीके इंसाफ पार्टी ने कहा कि बातचीत के लिए तालिबान को अपनी टीम बनानी चाहिए लेकिन "वह देखेगी कि इस काम में तालिबान को कैसे मदद की जा सकती है." इमरान खान कई बार बातचीत की वकालत कर चुके हैं. उन्होंने पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमलों के खिलाफ अभियान छेड़ा हुआ है. हाल के सालों में तालिबान का चेहरा पाकिस्तान के अंदर भी उग्र हुआ है. पहले जहां वह विदेशी ताकतों पर हमले की बात करता था, वहीं हाल के दिनों में पाकिस्तान के अंदर सरकारी दफ्तरों और दूसरे इदारों पर भी उसने लगातार हमला किया है.

अलग अलग राय

बातचीत के इस प्रस्ताव को लेकर पाकिस्तान में अलग अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के इमाम मौलाना अब्दुल अजीज का कहना है, "यह अच्छी पहल है." हालांकि उन्होंने यह भी कह दिया कि वे पाकिस्तान में शरीया कानून लागू करना चाहते हैं. लाल मस्जिद में 2007 में सरकार ने बड़ी सैनिक कार्रवाई की थी.

मौलाना समीउल हक को भी तालिबान की टीम में रखे जाने का प्रस्ताव है, जिसे वे स्वीकार करना चाहते हैं. उन्होंने इमरान खान से अपील की है कि उन्हें यह प्रस्ताव ठुकराना नहीं चाहिए, "उन्हें अब अपने पैर नहीं खींचने चाहिए." समीउल हक उत्तर पश्चिम के उस इलाके से आते हैं, जो तालिबान का गढ़ है और समझा जाता है कि मुल्ला उमर जैसे नेताओं ने यहीं पढ़ाई की है. हक का कहना है कि तालिबान आठ या नौ लोगों की नई टीम बना सकता है.

सरकार की कोशिश

Afghanistan Übersetzer US Army

तालिबान से बातचीत की कई कोशिशें पहले नाकाम हो चुकी हैं

हाल ही में नवाज शरीफ ने संसद में कहा था कि वह तालिबान के साथ बातचीत के अपने प्रस्ताव पर टिके हैं, जिसके बाद तालिबान ने यह जवाब दिया है. शरीफ ने अपनी तरफ से चार लोगों की टीम बना दी है, जो बातचीत कर सकती है. हालांकि सिर्फ जनवरी में तालिबान के हमले में 114 लोगों की मौत हो चुकी है.

पाकिस्तान का एक धड़ा कहता है कि इस तरह की कई कोशिशें पहले नाकाम हो चुकी हैं और उग्रवादियों से बातचीत का कोई फायदा नहीं है. सुरक्षा जानकार हसन असकरी का कहना है, "तहरीके तालिबान की रणनीति है कि वह 2014 के आखिर तक सैनिक कार्रवाई की संभावनाओं को टाल दे, जब अंतरराष्ट्रीय सेना को अफगानिस्तान छोड़ना है."

असकरी की चिंता है, "इसके बाद उन्हें अफगान तालिबान के साथ हाथ मिला कर कबायली हिस्सों पर कब्जा करने का पूरा मौका मिलेगा."

एजेए/एएम (एपी, रॉयटर्स, एएफपी)

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