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ब्लॉग

ताकि बलात्कारियों का देश ना कहलाए भारत!

फेसबुक पर भेजी आपकी टिप्पणियों से साफ है कि देश के कोने कोने से आ रही बलात्कार और हिंसा की खबरों से सभ्य समाज शर्मिंदा है. महामारी का रूप ले चुकी समस्या से निपटने के उपाय भी आप डीडब्ल्यू हिंदी के पाठकों ने ही सुझाए हैं.

'रेप कैपिटल' कहा जाना भारतीय राजधानी के लिए एक बदनुमा दाग की तरह है. जब देश की ख्याति को दुनिया भर में बढ़ते हुए देखने की इच्छा हर नागरिक के मन में होती है, तो फिर बलात्कार, महिलाओं से हिंसा और भेदभाव, बच्चों तक के साथ घृणित अपराधों की सूची लंबी क्यों होती जा रही है. हाल ही में लोक सभा में जानकारी दी गई कि देश में यूजीसी के तहत आने वाले सभी शिक्षा संस्थानों में से सबसे अधिक यौन उत्पीड़न की शिकायतें भी दिल्ली में दर्ज हुई हैं. इसमें देश में सबसे घनी आबादी वाली दिल्ली के बाद सबसे अधिक आबादी वाले यूपी का नंबर आता है.

महिलाओं के साथ हो रही हिंसक यौन वारदातों के बढ़ने का आप क्या कारण मानते हैं, इस सवाल पर पाठकों में से ही कई लोगों ने लिख भेजा है कि टीवी और फिल्मों में दिखाई जाने वाली अश्लीलता बलात्कार के बढ़ते मामलों की वजह है. डीडब्ल्यू हिंदी के पाठक हरीश कुमार लड़कियों के छोटे कपड़ों को जिम्मेवार मानते हैं, "ये एक कैंसर की तरह ही है जो नारी के व्यक्तित्व को खा जाता है और समाज में यौन अपराध को आकर्षित करता है. फैशन सिर्फ सिनेमा में ही लाजमी होता है उसे व्यक्तित्व से दूर रखना चाहिये वरना यह स्वस्थ समाज के लिए घातक होता है." अबु हुरैरा खान कहते हैं कि कपड़े का नंगापन बहुत बड़ी वजह है बलात्कार के लिए. जीके सैनी ने मीडिया पर सारा दोष मढ़ते हुए लिखा है कि जितने भी रेप होते हैं, ये सब मीडिया वालों की देन हैं.

विनोद माहेश्वरी ने महिलाओं के असुरक्षित होने के मुख्य कारण गिनाते हुए स्त्री-पुरुष अनुपात में कमी की ओर ध्यान दिलाया है. इसके अलावा उन्होंने त्वरित दंड की व्यवस्था नहीं होना और अपराधियों को पकड़े जाने का भय न होना भी इसकी वजह बताई है.

कमरू खान ने बदलाव की शुरुआत घर से करने को जरूरी बताया है, "घर का अच्छा माहौल हो, बच्चे को शुरु से ही अच्छे संस्कार, अच्छी तालिम, तरबियत मिले, वो भी हर घर में तो धीरे धीरे सब कुछ बदल जाएगा. साथ ही नग्नता परोसी जाती है फिल्मों में, वो बन्द हो. नेट द्वारा अश्लीलता खत्म हो."

अंकिता सर्राफ ने अपनी लंबी टिप्पणियों में कई जरूरी बातों की ओर ध्यान दिलाया है. अंकिता ने लिखा, "दुनिया जो भी कहे सच्चाई तो यही है कि जिन चीजों को बच्चों से छुपाया जाता है, वो कहीं ना कहीं से उनको मालूम हो जाती हैं. बच्चों में कौतुहलवश पाने की इच्छा होती है और वे बिना सोचे समझे ऐसे गलत कदम उठा लेते हैं. किन किन चीजों को छुपा सकता है कोई? जो बातें घर से पता नहीं चलती वो बाहर से आखिर चल ही जाती हैं. बच्चों को प्यार से सही वक्त में सही ज्ञान की जरूरत है."

अंकिता ने इस बात पर भी जोर दिया है कि परिवारजन ही बचपन से बच्चों के मित्र और मार्गदर्शक बन कर उनमें प्रेम, करुणा और दया का भावना जगा सकते हैं. इसके अलावा खुद औरतों को किसी दूसरी महिला के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की भी जरूरत है. अंकिता ने लिखा है कि कई बार जब किसी महिला के साथ गलत होते हुए कोई औरत देखती है तो उसको रोकने की बजाए अत्याचार को चुपचाप बर्दाश्त करने को कहती है.

अजय पांडे इस टिप्पणी के उत्तर में लिखते हैं, "जहां तक मेरा मानना है, यह मां बाप के बच्चों को संस्कार देने पर निर्भर करता है. जो बच्चे संस्कारी होते हैं, वे किसी भी लड़की का बलात्कार नहीं कर सकते. रही बात छोटे कपड़ों की तो अगर कहीं कोई लड़की निर्वस्त्र भी कहीं मिल जाती है, तो संस्कारी व्यक्ति अपने कपड़ों से उसे ढक देगा लेकिन उसका बलात्कार नहीं करेगा. अगर बलात्कार को रोकना है तो अपने बच्चे को संस्कारी बनाओ."