1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

ताकि बचे रहें खेत और किसान

जिस देश की 80 फीसदी आबादी गांवों में रहती हो और जहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर हो, वहां आम सहमति और किसानों के हितों का ध्यान रखे बिना कोई भी कानून कैसे बनाया जा सकता है.

केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए जो विधेयक तैयार किया, उसका देशव्यापी विरोध हो रहा है. देश के तमाम किसान संगठनों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और विपक्षी राजनीतिक दल भी इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं. चाहे मोदी सरकार और उसके मंत्री लाख सफाई दें, विरोधियों के पास तमाम अकाट्य दलीलें हैं. इस विधेयक के पारित हो जाने पर देश की अर्थव्यवस्था का आधार रही खेती-किसानी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा.

विधेयक की विसंगतियां

एनडीए सरकार की ओर से संसद में पेश विधेयक के कानून में बदल जाने के बाद पांच क्षेत्रों में लगने वाली परियोजनाओं के लिए जमीन के अधिग्रहण की खातिर 80 फीसदी जमीन मालिकों की सहमति जरूरी नहीं रह जाएगी. खेत का मालिक चाहे या ना चाहे, इन परियोजनाओं के नाम पर सरकार अब खेती की बहुफसली जमीन का भी अधिग्रहण कर सकती है. जमीन के मालिक ने अगर मुआवजा लेने से इंकार कर दिया तो वह रकम सरकारी खजाने में जमा हो जाएगी. इस मुद्दे पर उभरे किसी विवाद पर अदालत का सहारा लेने से पहले भी सरकार से इजाजत लेनी होगी.

पुराने विधेयक के तहत जमीन के अधिग्रहण के पांच वर्षों के भीतर उस पर परियोजनाओं का काम शुरू करना जरूरी था. लेकिन मोदी सरकार ने अब यह पाबंदी हटा ली है. यही नहीं, मुआवजे की परिभाषा को भी बदल दिया गया है. अधिग्रहण को लेकर कानून के उल्लंघन के मामले में किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले अब सरकार से मंजूरी लेनी होगी. साफ है कि अब सरकारी अधिकारी लापरवाही और कानूनों के उल्लंघन के बावजूद बच निकलेंगे. पिछले विधेयक में जमीन मालिकों की सहमति का अहम प्रावधान रखा गया था. इसके मुताबिक, सरकार और निजी कंपनियों की भागीदारी वाली परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण की खातिर 80 फीसदी जमीन मालिकों की सहमति जरूरी थी. सरकारी परियोजनाओं के मामले में यह 70 प्रतिशत था. लेकिन प्रस्तावित कानून में इस प्रावधान को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है.

विपक्ष का सवाल

कानून का विरोध कर रहे संगठनों और राजनीतिक दलों का सवाल है कि आखिर अधिग्रहण में किसानों की सहमति का प्रावधान किसके हित में हटाया गया है? उनका कहना है कि तय समय पर परियोजना नहीं शुरू होने पर किसानों को उनकी जमीन क्यों नहीं लौटाई जाएगी? विरोधियों की दलील है कि सरकार के नए कानून से किसानों की जमीन हड़पने का रास्ता साफ हो जाएगा.

विरोधी बहुफसली जमीन के अधिग्रहण का भी विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार जमीन भी ले लेगी और समुचित मुआवजा भी नहीं देगी तो जमीन मालिक अपनी फरियाद लेकर कहां जाएंगे. सरकार ने तो उनके अदालत की शरण में जाने का रास्ता भी बंद कर दिया है. उनका कहना है कि नया कानून पूरी तरह उद्योगपतियों के हक में है.

साख का सवाल

जमीन अधिग्रहण विधेयक पर उभरा विवाद मोदी सरकार के लिए साख का सवाल बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक यही संकेत दिया है कि वह विपक्ष की मांग के आगे घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने भाजपा सांसदों से किसानों के बीच जाकर उनको यह समझाने के लिए कहा है कि नया कानून उनके हितों के खिलाफ नहीं है.

नए कानून से साफ है कि भले जमीन मालिक तैयार ना हों, सरकार चाहेगी तो जमीन का अधिग्रहण नहीं रोका जा सकेगा. उसके मुआवजा लेने से मना करने पर भी, उस रकम को सरकारी खजाने में जमा कर जमीन पर जबरन कब्जा किया जा सकेगा. लेकिन जिस देश की 80 फीसदी आबादी गांवों में रहती हो और जहां की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर हो, वहां आम सहमति और किसानों के हितों का ध्यान रखे बिना बनने वाला कोई भी कानून खेती-किसानी के लिए ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकता है. मोदी सरकार को संसद में अपने बहुमत का ताल ठोंकने की बजाय इस संवेदनशील मुद्दे पर आम सहमति से ही आगे बढ़ना चाहिए. उसी स्थिति में खेत और किसानों की रक्षा संभव है.

प्रभाकर, कोलकाता

DW.COM

संबंधित सामग्री