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दुनिया

ताकत के टकराव को टालने की कोशिश

अमेरिका और चीन ने कहा है कि उनके मजबूत सैन्य संबंधों का मकसद दुनिया के दो सबसे मजबूत देशों की तरफ से उठने वाले संभावित गलत कदमों को रोकना है. दोनों देशों के बीच एशिया में सैन्य वर्चस्व की होड़ लगी है.

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19 जनवरी से शुरू होने वाले चीनी राष्ट्रपति हू चिनताओ के अमेरिकी दौरे से एक हफ्ते पहले अमेरिका के रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स चीन की यात्रा पर गए हैं. दोनों देशों के रक्षा संबंधों में पिछले साल उस वक्त तनाव देखा गया जब अमेरिका ने चीन के विरोध के बावजूद ताइवान को 6.4 अरब डॉलर के हथियार बेचने का एलान किया. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. हालांकि वहां अलग सरकार काम करती है.

Atomstreit mit Nordkorea

जोखिम घटाना है

गेट्स ने कहा है कि दोनों देशों के बीच संबंधों न होने से जोखिम बढ़ सकता है. चीन के आसपास सागर में चीनी युद्धपोतों की हाल के सालों में भिड़ंत होती रही हैं. 2001 में अमेरिकी निगरानी विमान और चीनी वायु सेना के लड़ाकू विमान की हवा में टक्कर से भी दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ.

चीन के रक्षा मंत्री लियांग गुआंगली के साथ बातचीत के बाद गेट्स ने पत्रकारों को बताया, "हम इस बात पर पूरी तरह सहमत है कि गलतफहमियों से बचने के लिए जरूरी है कि सैन्य स्तर पर संबंध मजबूत हों और राजनीतिक झोंकों का उन पर असर न पड़े." लियांग ने कहा कि निरंतर मजबूत होते और भरोसेमंद सैन्य संबंधों से आपसी मतभेद और गलतफहमियां कम होंगी.

व्यापार असंतुलन, मुद्रा मूल्य पर मतभेद और मानवाधिकारों पर मतभेदों से जूझते अमेरिका और चीन के रिश्तों में सैन्य संबंध बेहद अहम हैं. गेट्स समेत ओबामा सरकार के आला अधिकारी चीन से बराबर आग्रह करते रहे हैं कि वह उत्तर कोरिया और ईरान की परमाणु महत्वकांक्षाओं पर नियंत्रण लगाने में मदद करे. साथ ही चीनी सेना के आधुनिकीकरण के बारे में भी अमेरिका स्पष्ट जानकारी चाहता है.

ताकत का खेल

वैसे अमेरिका और चीन के बीच रोजमर्रा के संवादों और संपर्कों में सैन्य संबंधों की चर्चा कम ही होती है लेकिन अमेरिकी अधिकारी चीन की बढ़ती सैन्य ताकत को लेकर चिंतित हैं जिससे तनावों के टकराव में बदलने का खतरा पैदा होता है. ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी में चीनी सुरक्षा नीति के प्रोफेसर चिंगतोंग युआन का कहना है, "चीनी-अमेरिकी संबंधों में उतार चढ़ाव से सबसे पहले सैन्य संबंध ही प्रभावित होते हैं."

लियांग ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री पर फिर अपना विरोध जताया. उन्होंने कहा कि चीन उम्मीद करता है कि अमेरिका उसकी चिंताओं पर ज्यादा ध्यान देगा. गेट्स के चीनी दौरे का मकसद यह जाहिर करना है कि दोनों देशों के संबंध सुधर रहे हैं. दोनों देशों के सैन्य प्रमुख 2009 में सेनाओं के दौरों पर सहमत हुए, लेकिन जब अमेरिका ने ताइवान को हथियार बेचने का एलान किया तो यह योजना खटाई में पड़ गई. चीन ने 2010 में दक्षिण कोरियाई सेना के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यास पर भी नाराजगी जताई. साथ ही उसने दक्षिणी चीनी सागर में क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने के लिए पड़ने वाले अमेरिकी दबाव को भी खारिज कर दिया.

चीन को मनाने की चुनौती

सिडनी में लॉवी इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के रोरी मैडकाफ कहते हैं कि असल में चीन को अब तक यह विश्वास नहीं हो पाया है कि क्या उसे वाकई अमेरिका के साथ अपने सैन्य संवाद को बढ़ाना चाहिए. वह मानते हैं, "गेट्स और ओबामा के लिए चीन को इस बात के लिए मनाना एक बड़ी चुनौती है कि यह दोनों ही पक्षों के हित में है कि चीन सैन्य संपर्कों को न तोड़े, जैसा कि वह ताइवान, तिब्बत या दूसरे इसी तरह के राजनीतिक मामलों में करता आया है. संयम दिखाने की जरूरत है. इसके लिए समुद्र में चीन और अमेरिका के बीच संवाद और संपर्कों को उच्च प्राथमिकता वाली सूची में रखना होगा."

2007 में चीन और अमेरिका ने एक हॉटलाइन कायम करने पर सहमति जताई ताकि इमरजेंसी की सूरत में तुरंत संपर्क किया जा सके. लेकिन इस हॉटलाइन का शायद ही इस्तेमाल हुआ हो. वैसे विवादों के दौरान चीन की सरकार बड़ी मुश्किल से विश्व नेताओं की अपीलों का जवाब देती है.

दुनिया में अब भी अमेरिकी सेना की ही दबदबा है लेकिन रक्षा क्षेत्र में चीन के बढ़ते खर्च को देखते हुए अब यह अंतर तेजी से कम हो रहा है. इसीलिए अमेरिकी कमांडरों की चिंता बढ़ गई है और उन्हें एशिया में अमेरिकी सुरक्षा हित खतरे में नजर आ रहे हैं.

लियांग का कहना है कि चीनी सेना की तकनीक दुनिया की सबसे आधुनिक अमेरिकी सेना से दशकों पीछे है. ऐसे में चीनी सेना के आधुनिकीकरण से दुनिया को कोई खतरा नहीं है.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः वी कुमार

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