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दुनिया

तलाशी का नस्लभेदी रंग

जर्मन पुलिस गोरे लोगों की भीड़ से काली चमड़ी वालों को जब चाहे सुरक्षा के नाम पर जांच के लिए बाहर खींच लेती है. मानवाधिकार की वकालत करने वालों के इस आरोप से पुलिस इनकार कर रही है.

बर्लिन के क्रायत्सबुर्ग में बेरंग सीढ़ियों की कतार एक गुमनाम सी इमारत की दूसरी मंजिल पर ले जाती है. मटमैली दीवारों से रंगीन पोस्टर धीरे धीरे उखड़ रहे हैं. इनमें एक पर शरण मांगने वालों के देश निकाले पर विरोध की पुकार है, तो दूसरे पोस्टर पर लिखा है, "आवरी जालोह की हत्या की गई." यह शरण मांगने वाले एक अफ्रीकी के बारे में है, जिसकी पुलिस हिरासत में मौत हुई. रीच आउट नाम की संस्था दक्षिणपंथी अतिवाद और रंगभेद के पीड़ितों की मदद की कोशिश कर रही है. इस इमारत में इसी संस्था का दफ्तर है.

संस्था से जुड़े बिप्लब बासु खुद कई बार रंगभेद का शिकार हुए हैं. कुछ महीने पहले की बात है वह अपनी बेटी के साथ ट्रेन में जा रहे थे. चेक गणराज्य और जर्मनी की सीमा के पास पुलिस ने सिर्फ उनकी और उनके बेटी की तलाशी ली. बासु बिना संदेह यह मानते हैं कि पुलिस ने तलाशी के लिए बेटी सहित उनको सिर्फ चमड़ी के रंग के आधार पर चुना क्योंकि बाकी यात्री उनके रंग के नहीं थे.

बासु 30 साल पहले जर्मनी आए, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. बासु ने शिकायत दर्ज कराई है और वो इस मामले को अदालत में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. कई सालों से वह "रंगभेदी पुलिस तलाशी" के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. 1990 के दशक में उन्होंने लोगों के साथ मिल कर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए और लोगों को पर्चियां बांटीं. उनका कहना है कि केवल गहरी चमड़ी वालों की तलाशी लेकर पुलिस यात्रा कर रहे दूसरे लोगों के मन में बिठा रही है कि त्वचा के गहरे रंग और अपराध का नाता है.

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तलाशी का नस्ली रंग

बासु को डर है कि उनकी तरह रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग बहुत कम हैं, "त्वचा के रंग के कारण तलाशी देने वाले ज्यादातर लोग इसके बारे में कुछ नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनमें से कइयों को ऐसा करना अपमानजनक महसूस होता है." बासु ने कहा, "नस्ली पहचान बनाने की साफ तौर पर मनाही है लेकिन कथित नस्ली तलाशी अकसर ट्रेनों और एयरपोर्ट पर की जाती है, जहां जर्मनी की संघीय पुलिस रहती है. संघीय पुलिस कानून के आर्टिकल 22 के मुताबिक पुलिस को गैरकानूनी प्रवेश रोकने के लिए तलाशी का अधिकार है." (नस्ली पुलिस अफसरों से जर्मनी हैरान)

जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन राइट्स के हेन्ड्रिक केमर बताते हैं, "पुलिस को शुरुआत में सिर्फ नजर आने के आधार पर कदम उठाना होता है, तो हो यह रहा है कि वो बालों, त्वचा और आंखों के रंगों के आधार पर फैसले कर रही है." जाहिर है कि सुरक्षा का जो तंत्र बनाया गया है, उसी में भेदभाव है. यही वजह है कि कानून के इस आर्टिकल को हटाने की मांग की जा रही है.

आरोप खारिज करती पुलिस

डॉयचे वेले ने जब पुलिस से इस बारे में बात की तो उन्होंने इन आरोपों से साफ इनकार कर दिया. उनका कहना है कि नस्ली या जातीय पहचान नहीं बनाई जाती. पुलिस ने दो पन्ने का बयान जारी कर कहा, "हमारे उपायों का कोई भी निशाना बन सकता है." आकस्मिक तलाशी और पूछताछ "सीमा पुलिस की जानकारी" के आधार पर किए जाते हैं. इसमें प्रमुख रूप से किसी शख्स की जातीयता से ज्यादा चीजें होती हैं. किसी की तलाशी लेनी है या नहीं यह तय करने के लिए, "यात्रा मार्ग के बारे में जानकारी, संभावित ठिकाने, समय, उम्र, लिंग और संदिग्ध व्यवहार" जैसी जानकारियों का सहारा लिया जाता है. इसके साथ ही कपड़े और सामान या इसी तरह की दूसरी चीजें भी फैसले में मदद करती हैं. पुलिस का कहना है कि सुरक्षा जांच के दौरान रंगभेद और भेदभाव जैसे मुद्दों पर खास तौर से अंदरूनी ट्रेनिंग दी जाती है. इसके अलावा संघीय पुलिस ने 800 अलग अलग जाति के लोगों की भर्ती कर रखी है.

बिप्लब बासु इन दलीलों को महज पीछा छुड़ाने की कोशिश मानते हैं. उनका कहना है कि त्वचा का रंग इन तलाशियों में सबसे पहले देखा जाता है बाकी सारी चीजें उसके बाद आती हैं. उनके मुताबिक त्वचा का रंग जितना गहरा होगा जांच की आशंका उतनी ज्यादा होगी.

रिपोर्टः नोआमी कोनराज/एनआर

संपादनः ए जमाल

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