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मनोरंजन

तमाशे में तब्दील होते लोकगीत

हिन्दी फिल्मों का अभिन्न अंग उसके लोकगीत और लोकधुनें. चाहे "चढ़ गयो पापी बिछुआ" हो या फिर "पिंजरे वाली मुनिया". उत्तर प्रदेश से राजस्थानी, गढ़वाली, बंगाली लोकगीतों के आधार पर कई गाने बने. ये सफलता की चाबी साबित हुए.

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लोकगीतों के बारे में सामान्य तौर पर सोचा जाता है कि यह उस इलाके की बोली, परंपराओं और त्योहारों की बानगी हैं. वो वहां की संस्कृति दिखाते हैं. ग्रामीण अंचल पर बनने वाली फिल्मों में इस्तेमाल गीतों में लोकसंगीत का खूब इस्तेमाल हुआ. चाहे वह मदर इंडिया हो या गंगा जमुना लोक संस्कृति को बड़े पर्दे पर दिखाया गया. लेकिन शब्द बदल गए.

हालांकि कई बार शहर में रहने वाले हीरो हीरोइन गाड़ी खराब होने पर किसी शाम एक गांव में भी पाए जाते रहे जहां किसी गीत, संगीत, नाच का आयोजन होता रहा. शहरी बाबू उसे इंटरटेनमेंट की तरह लेते और गाड़ी ठीक होने पर फिर शहर लौट जाते.

बॉलीवुड के 100 साल होने पर एक खास गाना लिखने वाले गीतकार प्रसून जोशी कहते हैं, "लोकसंगीत, लोगों का संगीत एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है. वह किसी की मिल्कियत नहीं होती. वह नदी के पत्थर की तरह लुढ़कता रहा है. बहता, लुढकता, खूबसूरत आकार में आपको मिलता है. यही लोकगीतों की खासियत है."

लेकिन आज की हालत ऐसी नहीं है.. एक कांच का शोकेस है जहां लोकगीत, लोक संस्कृति सजा कर रखी हुई है... जहां "कहे तोसे सजना तोरी सजनिया, या चार दिना दा प्यार ओ रब्बा, या फिर काहे को ब्याही बिदेस" जैसे लोकगीत रखे होते हैं... ये कभी तो कहानी के साथ चलते हैं लेकिन कभी बस पैसे कमाने का माध्यम..

लोक गीत को भी फायदा

इसमें भी कोई शक नहीं कि फिल्मों में इस्तेमाल लोकगीतों ने कुछ लोकगायकों को मुख्यधारा में भी लाया. इनमें शारदा शर्मा या रेशमा, सुखविंदर सिंह जैसे कुछ नाम शामिल हैं. मशहूर शायर जावेद अख्तर डॉयचे वेले से कहते हैं, "लोकगीत अच्छे होते हैं इसलिए इतने बरसों और सदियों से चले आ रहे हैं. न ये मालूम कि किसने धुन बनाई है और ये भी नहीं पता कि किसने लिखे. और वो पीढ़ी दर पीढ़ी बनते आते हैं. उनको पॉलिश किया जाता है, इम्प्रोवाइज किया जाता है."

प्रसून जोशी मानते हैं कि ये फिल्मों के सुपर हिट होने का कारण रहे हैं,"चाहे नैन लड़ जइहें जैसे पुराने गाने हों या नींबूड़ा नींबूडा हो, बहुत सारे लोकगीत हैं जो हमारे यहां सुपर हिट हैं. और वो हमेशा ही सुपर हिट होंगे क्योंकि वो लोगों द्वारा पाले गए हैं."

लेकिन फिल्मों में अगर लोकगीत ना हों तो ए बी सी डी पढ़ कर बड़े होने वाले बच्चों को इनका कभी पता ही नहीं चलेगा. तो क्या फिल्मी लोकगीत नई पीढ़ी को संस्कृति की पहचान कराते हैं? जोशी कहते हैं, "लोकसंगीत को थोड़ा और समझने की जरूरत है. लोकगीत का प्रासंगिक होना बहुत जरूरी है. वो लोगों की वर्तमान परेशानियां, उनके उल्लास, मनोभावों को व्यक्त करता है. और इसीलिए प्रासंगिक होता है. एक पुराने गीत में कोई महिला गाड़ीवान से गाड़ी तेज चलाने को कह रही है. लेकिन अगर बैलगाड़ी और उस पर ही बैठना खत्म हो जाए तो वह पुराना गीत है. तो देखने वाली बात यह है कि रेलगाड़ी या हवाई जहाज पर लोकगीत रचे जा रहे हैं या नहीं."

बदलता स्वरूप

नए दौर में में लोकगीत आइटम नंबर की तरह इस्तेमाल होने लगे. जिनमें चिकनी चमेली, चोली के पीछे क्या है, मुन्नी बदनाम हुई.. जैसे गीत हैं. क्या ये लोकगीत या लोकसंस्कृति का आईना हैं? क्या फिल्मी गीत एक दिन लोकगीतों को भी पीछे धकेल देंगे? जोशी मानते है, "बॉलीवुड के कोई भी गीत लोकगीतों की जगह नहीं ले सकते. कई फिल्मों में लोकसंगीत की खिल्ली उड़ाई जा रही है. वो असल में लोकसंगीत है ही नहीं. अगर वह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को नहीं दिखा रहा तो वह सिर्फ मनोरंजन के लिए बना गीत है, लोकगीत नहीं. लोक संगीत अम्यूजमेंट नहीं है, वह उससे कहीं गहरा है. जइबे, अइबे, खइबे, लगइबे लगाने से कोई गीत लोकगीत नहीं बन जाता. हालांकि कुछ फिल्मी गीत लोकसंगीत की श्रेणी में आते हैं."

आधुनिक समय में पीपली लाइव जैसी फिल्में, जो सीधे सीधे ग्रामीण अंचल की मुश्किलें दिखाती हैं वहां उस भाषा में लोकगीत का इस्तेमाल प्रासंगिक और सच्चा लगता है. लेकिन चकाचक सड़कों पर फरारी चलाने वाला हीरो जब शहर की किसी गली में लोकधुन और लोकगीत से उठाए शब्दों के हेर फेर वाले गाने पर ठुमका लगाता है तो हलवे में नमक का स्वाद लगता है.

जावेद अख्तर साफ शब्दों में कहते हैं, "अगर कोई लोकगीत के नाम पर वल्गर गाना ले आए और कहे कि साहब ये तो लोकगीत है तो वो बात ठीक नहीं है. लोकगीत के नाम पर अच्छे काम करिए अच्छे गीत रखिए तो अच्छी बात है."

रिपोर्टः आभा मोंढे

संपादनः अनवर जे अशरफ

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