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विज्ञान

तब शायद बूढ़ा होना भी रुक पाए

कोलोन के माक्स प्लांक संस्थान के कुछ जीव वैज्ञानिक इस पर शोध कर रहे हैं कि हम बूढ़े क्यों होते हैं. वे कभी न कभी इस हालत में होंगे कि बूढ़ा होना रोक सकें.

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जर्मनी में औसत आयु में लगातार बढ़ रही है, अब वह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. इस बीच हर दूसरा मर्द 80 साल जी रहा है और हर दूसरी महिला 85 साल. बहुत प्रभावशाली आंकड़े हैं. लेकिन अश्विनी कुमार और महर्षि च्यवन की कहानी दुहराई जा सकती है. दिक्कत सिर्फ यह है कि फिलहाल जर्मन वैज्ञानिक अपना शोध इंसानों पर नहीं कर रहे हैं.

कोलोन के माक्स प्लांक संस्थान की जीव विज्ञान की प्रयोगशाला में नेमाटोड नामक कीड़ों को एक मशीन में डाला जाता है. ये कीड़े बहुत छोटे होते हैं. वे वैज्ञानिकों को इस बात के संकेत देंगे कि इंसान बूढ़ा क्यों होता है. और इसकी शुरुआत हुई थी धागे से पतले एक कीड़े नेमाटोड के साथ. 80 के दशक में शोधकर्ताओं ने इस कीड़े में जेनेटिक परिवर्तन के जरिए यह हासिल किया कि वे 10 गुना तेजी से बूढ़े होने लगे.

उस पर हुए शोध ने पहली बार इस बात के संकेत दिए कि बूढ़ा होने का जेनेटिक पहलू भी है और उसमें जेनेटिक परिवर्तन के जरिए छेड़छाड़ की जा सकती है. इस बीच शोधकर्ता कीड़े के जेनोम की खोज कर रहे हैं. इस शोध परियोजना के संयोजक राल्फ पेत्री कहते हैं, "कीड़ा शोधकर्ताओं को यह संभावना देता है कि वे खास इलाकों को चुन सकें और कहें, यहां हम देख सकते हैं, यह दिलचस्प है क्या? मसलन क्या हम इसे अल्त्सहाइमर या पार्किंसन या कैंसर जैसे रोगों में देखते हैं?"

नेमाटोड, फलों पर उड़ने वाली मक्खियों और चूहों पर अपने शोध के जरिए वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि उन्हें इंसानों के बूढ़े होने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी मिल सकेगी. और यह जानकारी मिल जाने के बाद उन्हें बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों का इलाज ढूंढने में भी मदद मिल सकती है.

पेत्री कहते हैं, "हमारा मानना है कि ये सभी बीमारियां किसी न किसी तरह बूढ़े होने की प्रक्रिया के साथ जुड़ी हुई हैं. यदि हमें ठीक ठीक समझ में आ जाए कि हम बूढ़े क्यों होते हैं, उसके पीछे क्या प्रक्रिया चलती है, तब हमारे पास इन बीमारियों को एक साथ देखने की कुंजी होगी. तब हम संभवतः कुछ ऐसा खोज पाएंगे जो बूढ़े होते लोगों की कुल शारीरिक स्थिति को बेहतर बना पाए."

प्रकृति में जानवर कम ही इतने बूढ़े होते हैं कि बुढ़ापे से जुड़ी समस्याएं दिखें. पेत्री का कहना है कि इंसानों में ऐसा नहीं है. चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे विकास तथा बेहतर साफ सफाई के कारण लोगों की औसत आयु बढ़ रही है. पेत्री के मुताबिक, "यदि हम आबादी में हो रहा विकास देखें तो हम पाते हैं कि पिछले 150 साल में हर दशक में औसत आयु लगभग ढाई साल बढ़ जाती है. इस समय ऐसा नहीं लग रहा कि यह विकास निकट भविष्य में रुकने वाला है."

और बढ़ती उम्र के साथ लोगों को अल्त्सहाइमर जैसी बुढ़ापे से संबंधित बीमारियों से भी जूझना पड़ रहा है. कैंसर भी बुढ़ापे में अक्सर हो जाता है. इसलिए खासकर औद्योगिक देशों में बुढ़ापे पर शोध का महत्व भी बढ़ता जा रहा है. वहां आबादी की संरचना में भी परिवर्तन दिखने लगा है. जन्मदर घट रही है इसलिए युवाओं की संख्या कम है जबकि काम की आयु पार कर चुके बूढ़े लोगों का अनुपात बढ़ रहा है. राल्फ पेत्री इस रुझान के बारे में कहते हैं, "कभी कभी आप इसे आर्थिक रूप से उभरते देशों में भी देखते हैं. चीन में यह समस्या कभी न कभी आएगी और आबादी की विशालता के कारण हमसे बड़े पैमाने पर. भारत को, ब्राजील को, अर्जेंटीना और दूसरे दक्षिण अमेरिकी देशों को भी इस समस्या का सामना करना होगा. अफ्रीका में भी कुछ हल्कों में यह होगा. दरअसल यह एक ऐसी समस्या है जो कालांतर में सभी देशों को प्रभावित करेगी."

जर्मनी में हो रहे आबादी जन्य परिवर्तन का असर माक्स प्लांक संस्थान के शोधकर्ता अपने ऊपर भी देख रहे हैं. देश में युवा शोधकर्ताओं की कमी है और इस कमी का सामना उन्हें भी करना पड़ रहा है.

रिपोर्टः एजेंसियां/महेश झा

संपादनः वी कुमार

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