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विज्ञान

तब 'अमीरों की बीमारियों' से मरेंगे गरीब

कुछ साल बाद विकासशील और गरीब देशों में भी सबसे ज्यादा लोग उन बीमारियों से मरेंगे जिन्हें कभी अमीरों की बीमारी कहते थे. ये बीमारियां बढ़ रही हैं और लड़ने वाला कोई नहीं है.

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अफ्रीका में बढ़ता डायबीटीज

डायाबीटीज यानी शूगर की बीमारी, हाई ब्लडप्रेशर या कई तरह के कैंसर, ये क्रॉनिक यानी पुरानी बीमारियां विशेषज्ञों के मुताबिक 21वीं सदी के स्वास्थ्य से जुड़ीं सबसे बड़ी चुनौतियां मानी जा सकती हैं. चिंता की बात यह है कि ये बीमारियां अब विकासशील देशों में भी तेजी से फैल रहीं हैं और पूरी दुनिया के लिए एक समस्या बन गई हैं. दुनियाभर में 60 फीसदी मौतें मलेरिया या टीबी जैसी संक्रामक बीमारियों से नहीं बल्कि ऐसी बीमारियों से होती हैं जो ज्यादातर खान पान और रहन सहन से जुड़ी हैं.

Cancer Institute Tanzania 2

पीटर पायोट लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के निर्देशक हैं. वह कहते हैं, "आज कल दुनियाभर में मोटापा, डायाबीटीज और दिल की बीमारियों से संक्रामक बीमारियों की तुलना में ज्यादा लोगों की मौत होती है. एक ही अपवाद है, अफ्रीका के दक्षिण में बसे देश, जहां आज भी एड्स लोगों के सबसे ज़्यादा मरने की वजह है. लेकिन आम तौर पर कहा जा सकता है कि बहुत ज्यादा नमक, फैट और शूगर खाने की वजह से लोगों में रोग बढ़ते जा रहे हैं. सस्ता खाना यानी पिज्जा और बर्गर जैसे फास्ट फूड स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं. और फिर लोग शरीर से मेहनत भी नहीं करते. चिंता की बात यह है कि अब विकासशील माने वाले देशों में भी यूरोप या अमेरिका जैसा हाल हो रहा है."

विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि वैश्विकरण और शहरों के बढ़ने की वजह से लोग खुद खाना नहीं बनाते हैं बल्कि औद्योगिक रूप से तैयार खाने पीने की चीजें इस्तेमाल कर रहे हैं. अब अरब के देशों को ही देखिए. वहां दुनिया में अमेरिका

Flash-Galerie Zivildienst in Deutschland Krankenhaus

के बाद सबसे ज़्यादा सॉफ्ट ड्रिंक पीया जाता है. इसके अलावा यूरोप और अमेरिका में सिगरेट पीने वालों की संख्या कड़े कानून लागू करने के बाद कम हो रही है तो एशिया में सिगरेट की खपत बढ़ रही है.

पैक्का पुस्का वर्ल्ड हार्ट फाउंडेशन के निदेशक हैं. वह कहते हैं, "यूरोप के ज्यादातर देशों में भी यह देखा गया है कि किसी क्रॉनिक बीमारी का शिकार बनने वाले लोग ज्यादातर गरीब हैं. दूसरी तरफ अगर कोई ऐसी बीमारियों का शिकार बनता है तब भी वह गरीबी का शिकार होता है. विकासशील देशों में आप देख सकते हैं कि किसी क्रॉनिक बिमारी का शिकार बने लोगों की देख भाल पर्याप्त नहीं होती है, इसलिए वह समाज में अलग थलग पड़ जाते हैं और गरीबी का शिकार हो सकते है. यानी क्रॉनिक बीमारियों का शिकार बनने का कारण भी गरीबी हो सकती है और उसका अंजाम भी."

इसके अलावा मानसिक बीमारियां भी क्रॉनिक बीमारियों में गिनी जाती हैं. दुनियाभर में इस वक्त 15 करोड़ लोग डिप्रेशन का शिकार हैं. पुरानी बीमारियों के विशेषज्ञ पीटर पायोट कहते हैं, "मुझे इस बात पर सबसे ज्यादा अफसोस है कि मानसिक

Afghanistan Drogenabhängige

बीमारियों पर दुनियाभर में बहुत कम ध्यान दिया जाता है. दूसरी तरफ कई जगहों पर लोगों को किसी मानसिक बीमारी की वजह से समाज से अलग कर दिया जाता है. मानसिक बीमारियां कई दूसरी बीमारियों को भी जन्म देती हैं. कई देशों में तो मानसिक बीमारियों के शिकार लोगों को बंद कर दिया जाता है. हम ऐसे मरीजों का आज इलाज कर सकते हैं. डिप्रेशन हो या स्किजोफ्रेनिया इलाज संभव है."

इस वक्त मानसिक बीमारियों के विकसित होने पर भी ध्यान दिया जा रहा है और उनके विकसित होने का एक कारण है तनाव. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अला आवान बताते हैं कि क्रॉनिक बिमारियों के विकसित होने के पहले से ही उनसे बचना जरूरी है. व कहते हैं, "

खासकर दिल की बीमारियों, कई तरह के कैंसर और डायाबीटीज से बचा जा सकता है. उदाहरण के लिए सिगरेट और शराब न पीकर, अपना खयाल रखने से और खेलकूद में हिस्सा लेकर ऐसी बीमारियों के विकसित होने से बचा जा सकता है. इसके अलावा यदि आप किसी ऐसी बिमारी का शिकार बनते भी हैं तब भी इन सभी चीज़ों का परहेज कर मरीज की स्थिति में सुधार हो सकता है. इतना ही नहीं उनकी मौत को लंबे समय तक टाला जा सकता है."

वर्ल्ड हार्ट फाउंडेशन के निदेशक पैक्का पुस्का के मुताबिक सरकारों को भी अपने नागरिकों को कड़े कानूनों के साथ क्रॉनिक बिमारियों का शिकार बनने से बचाना चाहिए. वह यूरोप के कई देशों में लागू किए गए कानूनों का उदाहरण देते हैं जिनके तहत सार्वजनिक जगहों जैसे कि ट्रेन स्टेशन या रेस्तरां में सिगरेट पीने की मनाही है."

पुस्का कहते हैं, "सबसे जरूरी है कि हमें समाजिक तौर पर बदलाव लाना है और इस बदलाव के लिए लोगों को जागरुक बनाना बहुत जरूरी है. लोग उतना खाते हैं और उतनी ही शारीरिक मेहनत करते हैं जितना उन्हें दूसरों से समझ में आता है या फिर जितने की उनके पास संभावनाएं हैं. यानी जब हमें बदलाव लाना है तो फिर अलग अलग स्तरों पर प्रयास करने होंगे. हमे खाने पीने की चीजें बनाने वाली उद्योगों को इस में शामिल करना है. इसके अलावा गैर सरकारी संगठन, सरकारों और नगर पालिकाओं को भी."

विशेषज्ञ पीटर पायोट इस बात से चिंतित हैं कि अपीलों के बावजूद अभी क्रॉनिक बीमारियों पर बहुत ही कम काम हो रहा है. वह कहते हैं, "मुझे ऐसा लगता है कि दुनियाभर में क्रॉनिक बिमारियों पर बहुत ही कम काम हो रहा है. ब्रिटेन में 14 साल की उम्र में तीन बच्चों में से एक मोटापे से ग्रस्त है और यह समस्या बढ़ती ही जा रही है. हमें तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत है. यह सरकारों को समझना चाहिए. लेकिन मुझे नेतृत्व कहीं नहीं दिख रहा है. केवल इस बात की चर्चा हो रही है कि लोगों के इलाज में कितना पैसा खर्च होता है. लेकिन मैं वह प्रयास नहीं देख रहा हूं कि लोगों को यह बीमारियां हों ही नहीं."

रिपोर्टः प्रिया एसेलबॉर्न

संपादनः वी कुमार

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