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दुनिया

तबाही के बाद का केदारनाथ

उत्तराखंड में केदारनाथ परिसर में बिखरे मलबे की सफाई और लाशों को निकालने के लिए लगातार टीमें भेजी जा रही हैं. लाशें सड़ रही हैं और उनसे दुर्गंध उठ रही है. जहां लाशें मिल रही हैं, वहीं दाह संस्कार किया जा रहा है.

राज्य के मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने बताया, "एक दल और केदारनाथ जा रहा है जो सफाई के काम को पूरी तरह अंजाम देकर आएगा." उत्तराखंड पुलिस के डीआईजी संजय गुंज्याल के मुताबिक, "जिन लाशों का दाह संस्कार किया गया है उनका विधिवत पोस्टमार्टम किया गया और डीनए सैंपलिग भी ली गई." इससे शिनाख्त में आसानी होगी. केदारनाथ में मंदिर से लेकर आसपास के इलाके तक फैले मलबे में कितनी लाशें होंगी, इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन हो रहा है.

वायु सेना के हेलिकॉप्टर की मदद से एक जेसीबी मशीन वहां भिजवाई गई है जो मलबे की सफाई में मदद करेगी. केदारनाथ से लौटे पुलिस अधिकारी जी एस मार्तोलिया के मुताबिक, "हालत बहुत बुरे हैं. बहुत नुकसान हुआ है. लाशों का पता नहीं चल रहा है. मलबे में कहीं कोई हाथ दबा दिखता है. लाश निकालने के लिए हाथ खींचते हैं तो वही उखड़ कर निकल आता है. बाकी लाश नहीं निकल पाती. इतना सड़ गई हैं लाशें."

लाशों की सड़ांध के बीच महामारी और संक्रमण का खतरा बढ़ गया है. यूं तो सरकार का दावा है कि ऐसी कोई घटना अभी सामने नहीं आई है. लेकिन एहतियातन डॉक्टरों की टोलियां केदारनाथ से लेकर ऊखीमठ, गुप्तकाशी, गौरीकुंड, रुद्रप्रयाग तक और उधर उत्तरकाशी के प्रभावित इलाकों में रवाना कर दी गई हैं, जो ऐसी किसी आशंका पर नजर रखेगी. उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में डायरिया के कुछ रिपोर्टें सामने आ रही हैं. सरकार का दावा है कि पानी के संक्रमण से बचाव के लिए बड़ी मात्रा में क्लोरीन भेजी गई है.

पूजा का विवाद

उधर, केदारनाथ में संत बिरादरी के बीच पूजा को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है. धाम के मुख्य रावल कर्नाटक के लिंगायत समुदाय के पुजारी होते हैं. केदार और बद्रीनाथ धाम उत्तर भारत में होने के बावजूद आदि शंकराचार्य की बनाई व्यवस्था के तहत मुख्य पुजारी दक्षिण के ब्राह्मण ही हैं. तबसे ये परंपरा चली आ रही है और इधर पिछले कई वर्षों से ये परंपरा विवादों में आ गई है. माना जाता है कि पूजा और प्रतिष्ठा को लेकर वर्चस्व का टकराव भी इससे जुड़ा है. इस समय केदारनाथ के मुख्य रावल का पद भीमलिंगम शिवाचार्य संभाल रहे हैं. उन्होंने ऊखीमठ में मूर्तियों की पूजा शुरू कर दी तो इसे लेकर विवाद हो गया कि आखिर वो ऐसा कैसे कर सकते हैं जबकि केदार धाम के कपाट बंद नहीं हुए हैं.

रावल का तर्क है कि पूजा के लायक मंदिर में स्थितियां नहीं है इसलिए ऊखीमठ में पूजा की जा रही है. लेकिन द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस पर कड़ा एतराज जताया है, "शिव की पूजा शिव के धाम में ही हो सकती है, अन्यत्र नहीं. मूर्तियां नहीं निकालनी चाहिए थी." शंकराचार्य ने साधुओं का एक दल केदारनाथ के लिए रवाना कर ही दिया था कि वहां पूजा शुरू कर देंगे. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने किसी तरह उन्हें आश्वस्त किया कि अभी ऐसा न करें, राहत के काम में बाधा आएगी और एक सप्ताह का समय दें.

इस बीच केदारनाथ के पुनर्निर्माण, जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का सवाल भी सुर्खियों में है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की एक टीम केदारधाम रवाना हो चुकी है, जो मंदिर की इमारत, वास्तुकला और स्थापत्य को हुए नुकसान का जायजा लेगी और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी. केदार धाम को फिर से संवारने को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर जाने माने उद्योगपति अनिल अंबानी तक पेशकश कर चुके हैं. लेकिन राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि वो अपने बलबूते और विशेषज्ञों और संत समाज के मशविरे से मंदिर का पुननिर्माण कराएगी.

केदार को लेकर चल रही कोशिशों, विवादों और कई किस्म की पेचीदगियों के बीच सबसे बड़ा नुकसान स्थानीय कारोबारियों का हुआ है. घोड़ा और खच्चर मालिकों और यात्रा सीजन में राज्य के दूसरे हिस्सों से वहां जाकर जीविका कमाने वाले गरीब किसानों और मजदूरों पर बहुत बुरी मार पड़ी है. स्थानीय आर्थिकी छिन्न भिन्न हो गई है और राज्य सरकार के राजस्व पर भी बड़ी चोट पहुंची है. स्थितियां और रास्तों के हाल को देखते हुए लगता नहीं कि केदारनाथ धाम की तीर्थ यात्रा एक दो साल से पहले पटरी पर आ पाएगी. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पहले ही मान चुके हैं, "कम से कम एक साल हालात को सामान्य करने में लग सकता है."

रिपोर्टः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादनः अनवर जे अशरफ

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