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ताना बाना

तगड़ी सैलरी छोड़ समाजसेवा करते युवा

भारत में युवाओं का एक ऐसा तबका भी है जो तगड़ी तनख्वाह वाली मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरी और ठाठ वाट वाली सिविल सर्विस तक के मोह को छोड़कर समाज सेवा से जुड़ रहा हैं. ये आरटीआई को हथियार बना कर लोगों को लड़ना सिखा रहे हैं.

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ये नौजवान भारत में सूचना के अधिकार (आरटीआई) को हर आम और खास तक पंहुचाने में लगे हैं. भारत के सरकारी तंत्र में गहरी जड़ें जमा चुकी लालफीताशाही आजादी के 60 साल बाद भी ब्रिटिश हुकूमत की यादें ताजा कर देती है. इससे लड़ने में आरटीआई एक कारगर हथियार साबित हो रहा है.

कानूनी हथियार

महज पांच साल पहले लागू हुआ सूचना का अधिकार कानून समाज के सभी तबकों को अपनी ओर खींच रहा है. आम आदमी राशन कार्ड से लेकर नौकरी पाने तक इसका इस्तेमाल कर रहा हैं, वही दूसरी ओर खबरनबीस भी गड़बड़ घोटालों की परतें उधेड़ने में आरटीआई की तलवार चला रहे हैं. कुल मिलाकर भारत में आरटीआई एक सफल आंदोलन का रूप ले चुका है और इसे आगे बढ़ाने के लिए युवा प्रशासनिक नौकरी, पत्रकारिता और यहां तक कि अपना व्यवसाय तक एक किनारे रख कर इस मुहिम से जुड़ रहे हैं.

भारत के नामी गिरामी अखबार और न्यूज चैनल में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ कर आरटीआई से जुड़ने वाले विभव कुमार इसके पीछे पूरे सिस्टम में घुन की तरह लग चुके नाकारेपन के प्रति पैदा हुई नफरत को प्रमुख कारण बताते हैं. इस आंदोलन से जुड़ने के पीछे की वजह के बारे में वह बताते हैं, "मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था, उस समय वहां एक कैंटीन थी और उसकी हालत इतनी बुरी थी कि उसे देखकर हमें शर्म आती थी. इसमें सुधार के लिए मैंने सबसे पहला आरटीआई आवेदन डाला था. उसका ऐसा असर हुआ कि नई कैंटीन बन गई. तब मुझे आरटीआई की ताकत का अहसास हुआ और लगा कि इसे आगे बढ़ाना चाहिए."

कितना कारगर है कानून

विभव के लिए डीयू की कैंटीन में व्यवस्था को दुरुस्त करने में आरटीआई की मदद प्रेरणा का श्रोत बनी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया से मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाली सुचि पांडे ने तो 2005 में ही आरटीआई एक्ट के लागू होते ही इसे आगे बढ़ाने का पक्का इरादा कर लिया. अच्छे खासे पैकेज वाली नौकरियों के तमाम मौके छोड़कर आरटीआई मूवमेंट से जुड़ने के पीछे क्या वजह रही, इस पर सुचि का कहना है, "उन दिनों मैं पूर्वी दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में सुधार के लिए सरकारी प्रयासों और इस दिशा में उसकी जवाबदेही के बारे में काम कर रही थी. उस शोध कार्य के दौरान ही मुझे आरटीआई के बारे में पता चला और तभी से मैं सामाजिक संगठन परिवर्तन के साथ जुड़ी. उसके बाद सब कुछ छोड़कर पिछले कई सालों से मैं इसी क्षेत्र में काम कर रही हूं."

पढ़ाई किसी और स्ट्रीम में करने के बाद करियर किसी अन्य क्षेत्र में बनाने का चलन आज के यूथ में खूब देखने को मिल रहा है. लेकिन जमे जमाए व्यापार को दरकिनार कर सोशल मूवमेंट से जुड़ना अपने आप में अनोखी बात है. बिजनेसमैन सुभाष चंद्र अग्रवाल के सिर पर आरटीआई का जुनून ऐसा चढ़ा कि वह इस क्षेत्र में अपना नाम गिनीज बुक में भी दर्ज करा चुके हैं. आरटीआई से जुड़ने के बारे में अग्रवाल बताते हैं, "मैंने और मेरे परिवार ने 16 साल तक कुछ जजों के अन्याय का सामना किया. सुप्रीम कोर्ट के एक जज के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत करने के साथ ही मेरा आरटीआई का सफर शुरू हुआ."

पर जिंदगी कैसे चलेगी

वैसे आज के भौतिक युग में सोशल वर्क का जुनून सिर पर लेकर जीवन की गाड़ी चलाना कैसे मुमकिन हो पाता है, इस बारे में विभव का कहना है, "मुझे मीडिया में बहुत ही अच्छी सैलरी पर काम करने का मौका मिल रहा था, लेकिन सुकून मुझे इसी फील्ड में काम करके मिलता है. अगर आरटीआई के जरिए जवाबदेही तय होने लगती है तो फिर आने वाली पीढ़ी के लिए जीवन आसान हो जाएगा. ऐसा होने पर मन को जो संतुष्टि मिलती है, तो वेतन और सुख सुविधाओं जैसी सारी चीजें पीछे चली जाती हैं."

इसके बारे में सुचि थोड़ा हट कर सोचती हैं. वह कहती हैं, "अगर आप अपनी जरूरतों को नियंत्रण में रख कर उतने ही पैसों में जीने की कोशिश करें, जितना आपको मिलता है. तो फिर भारत जैसे देश में, जहां इतने बड़े पैमाने पर असमानताएं हैं, हालात को सुधारने की दिशा में यह कारगर हो सकता है."

लाल फीताशाही

संतुष्टि और सामंजस्य से अलग हट कर देखें तो बुरी तरह नौकरशाली में जकड़े भारत जैसे देश में सबको हक दिलाने में आरटीआई कितना कारगर साबित हो रहा है, यह भी एक अहम सवाल है. खासकर तब जब आरटीआई को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकार के उन्हीं अधिकारियों पर है जो लाल फीताशाही के वटवृक्ष को दशकों से सींच रहे है. दोधारी तलवार पर चलने जैसा यह काम कैसे मुमकिन होगा, इस पर अग्रवाल का कहना है, "इसके लिए सरकार को स्कूली स्तर पर पाठ्यक्रम में आरटीआई को शामिल करना चाहिए. कॉलेजों में इस पर अलग से क्लास और सेमिनार होने चाहिए. इसके अलावा जनता के लिए जागरूकता अभियान होने चाहिए. साथ ही इस तरह के टीवी सीरियल्स भी होने चाहिए."

आजाद भारत में शायद यह पहला क्षेत्र है, जिसे आगे बढ़ाने में सरकार के प्रयासों पर सामाजिक भागीदारी बहुत भारी पड़ रही है. गांव देहात से लेकर मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले तक आरटीआई का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं. इसलिए सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी लाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे आरटीआई का भविष्य सुनहरा ही होगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है.

रिपोर्टः निर्मल यादव

संपादनः ए कुमार

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