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ब्लॉग

ड्रग्स में घिरा खेल

विश्वनाथन आनंद, सुशील कुमार या साइना नेहवाल जैसे कुछ ही खिलाड़ी हैं, जो भारत में क्रिकेट से इतर अपनी जगह बनाते हैं. विजेंदर सिंह भी उनमें शामिल है. लेकिन ड्रग्स के मामले में फंसने के बाद वह टूटता सितारा लगने लगे हैं.

भारत के लिए मुक्केबाजी में ओलंपिक का पहला पदक जीतने वाले विजेंदर न सिर्फ एक मुक्केबाज, बल्कि स्टेटस सिम्बल बन गए थे. हरियाणा के लंबे चौड़े गबरू जवान विजेंदर इश्तिहारों में छाने लगे थे. अपने बच्चों को किसी तरह सचिन तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग बनाने वाले मां बाप उन्हें विजेंदर भी बनाने की बात करने लगे थे.

अभी कुछ भी साबित नहीं हुआ है और कानून की नजर से फिलहाल कोई मुजरिम भी नहीं है. लेकिन यहां जुर्म और कानून की बात से अलग खेल और शख्सियत को जानना जरूरी है. खेलों में जहां मामूली पाबंदी वाली दवाइयां करियर खत्म कर देती हैं, वहां हेरोइन लेना कहीं बड़ा गुनाह है. ऊपर से जांच के लिए नमूने नहीं देने की जिद. कामयाबी जब सिर चढ़ती है, तो बहुत ऊपर ले जाती है. लेकिन अगर इस कामयाबी को संभाला न जा सके, तो यह नीचे भी बहुत ज्यादा गिराती है.

सिर्फ ओलंपिक पदक जीतने की वजह से क्या कोई ऐसे आरोपों से इनकार कर सकता है, क्या कोई खिलाड़ी खुद तय कर सकता है कि वह बाल या खून के नमूने देगा या नहीं. वो तो भला हो अंतरराष्ट्रीय डोपिंग एजेंसी वाडा का, जिसकी वजह से सभी टेस्ट हो पा रहे हैं. भारतीय डोपिंग एजेंसी नाडा के पास हेरोईन टेस्ट करने की सुविधा नहीं है. भारतीय मीडिया का दावा है कि पिछले कुछ महीनों में विजेंदर ने 12 बार हेरोईन ली है.

विजेंदर की जिद अगर सिर्फ बॉक्सिंग रिंग तक होती, तो वह एक बड़े मुक्केबाज बन सकते थे. सिल्वेस्टर स्टैलोन और मुहम्मद अली को आदर्श मानने वाले विजेंदर ने भिवानी के छोटे से रिंग से करियर की शुरुआत करके उसे ओलंपिक के पोडियम तक पहुंचाया है. ये नतीजे मेहनत और लगन के साथ कुछ कुछ जिद से भी निकलते हैं. लेकिन यह जिद गलत जगहों पर लगने लगे, तो उसका अंजाम वैसा ही होता है, जो अभी देखने को मिल रहा है.

दुनिया ने अभी हाल में ऑस्कर पिस्टोरियस और लांस आर्मस्ट्रांग की मिसालें देखी हैं. दुनिया के सिरमौर बने खेल सितारे रातों रात विलेन बन जाते हैं. भारतीय खेल प्रेमी विजेंदर में एक और पिस्टोरियस या आर्मस्ट्रांग नहीं देखना चाहेगा.

ब्लॉगः अनवर जे अशरफ

संपादनः आभा मोंढे