″डॉयचे वेले एक खुली खिड़की के सामान है″ | फीडबैक | DW | 05.11.2012
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फीडबैक

"डॉयचे वेले एक खुली खिड़की के सामान है"

अकसर हमें पाठकों की तारीफों, सुझावों के संदेश मिलते रहते हैं, क्या लिखा है इन संदेशों में, चलिए जानते हैं..

DW के टीवी धारावाहिक मंथन में इस हफ्ते दिमागी चिप की जानकारी रोचक और आश्चर्यजनक लगी.दिमाग के अंदर चिप फिट करने के बाद मनुष्य जैसा सोचेगा,वैसे ही काम ऑटोमैटिक होने लगेगा.दिमाग को कंप्यूटर से जोड़ना अजूबा लगता है. खासकर लकवा ग्रस्त(स्ट्रोक) के मरीजों के लिए यह तकनीक वरदान है. ऊंचे आल्प्स पर्वत के चटखने और जलवायु परिवर्तन के संबंध में भूगर्भशास्त्री मार्सिया फिलिप्स की रिपोर्ट चिंताजनक लगी.जर्मनी में चाकलेट की खपत और उत्पादन देखकर मुंह में पानी आ गया. इतनी अच्छी और दिलचस्प जानकारी के लिए DW और DD का हार्दिक धन्यवाद.
चुन्नीलाल कैवर्त,ग्रीन पीस डी-एक्स क्लब सोनपुरी, जिला बिलासपुर,छत्तीसगढ़

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डॉयचे वेले मेरे लिए,बाहरी दुनिया को जानने के लिए,एक खुली खिड़की के सामान है. जर्मनी मेरे लिए काफी दूर का एक सपना जैसा था, लेकिन अब मेरा सपना डॉयचे वेले के सहयोग से साकार हो गया है. जर्मनी मेरे लिए अब एक अंजान देश नहीं रहा. जर्मनी का दौरा करने के लिए मेरे पास क्षमता तो नहीं है, लेकिन हर दिन डॉयचे वेले के साथ मैं यह अनुभव करता हूं कि मैं जर्मनी में ही हूं, जहां अतीत को वर्तमान से जोड़ा जाता है और भविष्य फूलों की कली की तरह अपेक्षा में रहता है. जर्मनी के बारे में विस्तृत,निष्पक्ष व सजीव जानकारियां मुझे डॉयचे वेले के वेबसाइट से ही मिलती है.यह हमारे सामने वास्तविक जर्मनी को लाता है. परन्तु डॉयचे वेले के कार्यक्रमों को रेडियो पर प्रसारित न करने के इस निर्णय से हम सब बहुत ही निराश हैं. हो सके तो नए साल से आप अपने कार्यक्रमों की फिर से रेडियो पर लाये.

मो. अकबर खान, जर्मन रेडियो फ्रेंड्स क्लब, विजयवाडा, आंध्र प्रदेश

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आत्मदाह के बाद हजारों तिब्बतियों का विरोध प्रदर्शन नामक आलेख बेहद संवेदनापूर्ण था.मुझे समझ नहीं आता है कि चीन इतना अत्याचारी कैसे हो सकता है.अपनी मातृभूमि के प्रति यदि तिब्बती समाज समर्पित है तो उसकी भावनाओं का सम्मान होना चाहिए.ताकत के दम पर किसी को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है.मैं दुआ करता हूं कि तिब्बती जनता को उसका जायज हक मिले.
उमेश कुमार यादव,रिज़र्व बैंक कॉलोनी,अलीगंज,लखनऊ,उत्तर प्रदेश

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संकलनः विनोद चड्ढा

संपादनः आभा मोंढे