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दुनिया

डूब रहा है ब्रिटेन का सूरज

अच्छे कपड़े पहनना, भीतर की घबराहट के बावजूद सलीके से बातचीत करना. नौकरी के लिए ब्रिटेन के युवा आए दिन ऐसा कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर के हाथ निराशा लग रही है. इस बुरी हालत में प्रतिभाशाली ब्रिटेन से पलायन करने लगे हैं.

'हमें यह बताते हुए खेद हो रहा है कि इस नौकरी के लिए आपको नहीं चुना जाता. भविष्य के लिए शुभकामनाएं' नौकरी पानी की कोशिश कर रहे ब्रिटेन के ज्यादातर युवाओं को आए ऐसे ईमेल मिल रहे हैं. रोजगार के अभाव ने युवाओं में निराशा का माहौल पैदा कर दिया है. इसकी वजह से छात्र पढ़ाई के बाद दूसरे देशों का रुख करने लगे हैं.

यूनिवर्सिटी की पढ़ाई खत्म करने वाले तीन छात्रों में से औसतन एक से ज्यादा को नौकरी नहीं मिल रही है. अच्छे भविष्य की तलाश में ज्यादार छात्र एशिया या ऑस्ट्रेलिया का रुख कर रहे हैं. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से 2008 में स्नातक कर चुके जैमी डेवोनशायर फिलहाल हॉन्ग कॉन्ग में हैं. वहां उन्होंने छोटा सा इनवेस्टमेंट फंड कारोबार शुरू किया है. जैमी कहते हैं, "मैं यहां दो साल से हूं और बहुत आनंद में हूं. मौसम, जीवनशैली और नौकरी सब बढ़िया चल रही है."

जैमी से जब यह पूछा गया कि वह ब्रिटेन लौटना पसंद करेंगे, तो उनका जवाब था करीब करीब नहीं, "फिलहाल मुझे यूके लौटने में कोई फायदा नहीं दिखता. वहां रोजगार बाजार कमजोर है और पहली बार खरीदारी करने वाले के लिए घर-संपत्ति के दाम कल्पना के बाहर हैं." हाल ही में जैमी की गर्लफ्रेंड भी हॉन्ग कॉन्ग चली गईं. वह टीचर हैं और हॉन्ग कॉन्ग में उन्हें बतौर शिक्षिका ब्रिटेन से बेहतर नौकरी मिली है. तनख्वाह भी ज्यादा है.

Symbolbild Abschlussball Abitur

एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर पलायन

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटियों से पढ़ चुके 25 फीसदी छात्र यूरोप से बाहर नौकरी कर रहे हैं. दूसरे महाद्वीपों में नौकरी करने के इस सिलसिले में तेजी 2008 के बाद आई. विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के बाद यूरोप में लाखों नौकरियां गई. यूके की ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों में पढ़ चुके 47 फीसदी छात्र 2012 में यूरोप से बाहर निकले हैं.

Spanien Proteste in Madrid

स्पेन में बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन

वारविक यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक ब्रिटेन में 40 फीसदी युवाओं को यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के बाद ऐसी नौकरी करनी पड़ रही है जिसके लिए स्नातक डिग्री की जरूरत नहीं. 2009 में लीड्स यूनिवर्सिटी से स्नातक करने वाले टोरी पील-येट्स अब बेल्जियम में नौकरी पा चुके हैं. दूसरे देश को वह ब्रिटेन से ज्यादा अच्छा मान रहे हैं, "मैं नौकरी के आवेदन लिखते लिखते और फिर हर जगह से आ रही ना, ना सुनने से खीझ चुका था."

इसाबेल क्रैब्ट्री-कोंडोर 2009 में नौकरी की तलाश में यूगांडा गई, फिर वापस नहीं लौटीं. वह कहती हैं, "लंदन में युवा स्नातकों की संख्या और श्रम बाजार को देखने से मुझे यह महसूस हुआ कि विदेश जाना अनिवार्य हो गया है." इसाबेल अफ्रीकी देश में विकास सलाहकार की नौकरी कर रही हैं.

26 साल की इसाबेल ने 2009 में स्नातक किया. यूगांडा जाने से पहले उन्होंने ब्रिटेन में ही दो नौकरियां कीं. दूसरी नौकरी पाने में उन्होंने 600 युवाओं से मुकाबला किया. उनके मुताबिक उनकी क्लास से करीब 100 छात्रों में से सिर्फ पांच या छह ही ब्रिटेन में ढंग की नौकरी पा सके. छात्र यह भी मानने लगे हैं कि बाहर काम करने से उनके सीवी का वजन भी बढ़ता है.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के करियर सर्विस निदेशक गॉर्डन चेस्टरमान भी मानते है कि छात्रों का पलायन बढ़ा है, "हम छात्रों से कहते हैं कि वे ध्यानपूर्वक प्लान बी और प्लान सी भी बनाए. हो सकता है कि प्लान बी के तहत उन्हें शुरुआती करियर को चार से पांच साल देने पड़ें."

युवाओं की पहली पसंद एशिया बन रहा है. ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों से पढ़ने वाले 51 फीसदी छात्र एशिया जा रहे हैं, जो वहां नहीं जा रहे वे ऑस्ट्रेलिया का रुख कर रहे हैं. ओईसीडी के आंकड़ों के मुताबिक मंदी की वजह से अभी भी स्पेन और ग्रीस जैसे देशों में बेरोजगारी दर 40 फीसदी से ज्यादा है. वहीं ऑस्ट्रेलिया, भारत और चीन का रोजगार बाजार अभी भी उछाल पर दिखाई पड़ रहा है. वित्त और बिजनेस मैनेजमेंट के छात्रों को सबसे ज्यादा चीन अपनी तरफ खींच रहा है.

प्रतिभा के पलायन से अब ब्रिटेन के गृह विभाग के कान खड़े हो गये हैं. पिछले हफ्ते जारी एक रिपोर्ट में कहा गया, "इसका असर ब्रिटेन में प्रतिभाओं की मौजूदी पर पड़ सकता है."

ओएसजे/एनआर (रॉयटर्स)

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