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दुनिया

डीजल कारों पर और सख्ती

पर्यावरण संगठन चाहते हैं कि यूरोपीय संघ में कार कंपनियों के लिए कड़े उत्सर्जन के नियम बनाए जाएं. फोल्क्सवागेन कांड के बाद कार उद्योग खुद भारी दबाव में है.

यूरोपीय संघ के सदस्य देश 2017 से नए रोड टेस्ट को लागू करने पर राजी हो गए हैं. टेस्ट में खास तौर पर डीजल कारों पर कड़ी नजर रखी जाएगी. जर्मन कार निर्माता फोल्क्सवागेन के सॉफ्टवेयर कांड से सबक लेकर यह किया जा रहा है. फोल्क्सवागेन ने 2008 से अपनी डीजल कारों में एक सॉफ्टवेयर लगाया. सॉफ्टवेयर लैब में परीक्षण के दौरान उत्सर्जन कम दिखाता था. लेकिन अमेरिका में सड़क पर हुई जांच में पता चला कि फोल्क्सवागेन की डीजल कारें निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा हानिकारक नाइट्रोजन ऑक्साइड छोड़ रही थीं. यह गैस सांस संबंधी बीमारियां फैलाती है. फोल्क्सवागेन ने ऐसे सॉफ्टवेयर वाली कारें यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी बेचीं.

Symbolbild VW Logo Kühlergrill

फोल्क्सवागेन मुश्किल में

इस धोखाधड़ी के सामने आने के बाद यूरोप में टेस्ट हुए और यहां भी हैरान करने वाले नतीजे आए. बढ़ते दबाव के बीच यूरोपीय संघ का नया टेस्ट 2017 से बिकने वाली कारों पर लागू होगा. हालांकि लैब के नतीजों और सड़क पर आम ड्राइविंग में होने वाले उत्सर्जन के अंतर में हल्की नरमी दी गई है. यूरोपीय ऑटोमोबाइल निर्माता संघ के मुताबिक यह कोई बहुत बड़ी राहत नहीं है. संघ का कहना है, नए टेस्टिंग मापदंडों को "बहुत कम समय में पूरा कर पाना वाहन निर्माताओं के लिए बहुत मुश्किल है. इसका सीधा सा मतलब होगा कि कई तरह के डीजल मॉडल समय से पहले ही बाजार से हटाने पड़ेंगे."

वाहन निर्माताओं ने नए टेस्ट के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा है, "ऐसा करने से निर्माताओं के सामने 2021 के लिए तय किए गए कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कटौती के लक्ष्यों को पाना चुनौती भरा हो जाएगा." 2021 से प्रति 100 किलोमीटर 95 ग्राम सीओटू उत्सर्जन की सीमा लागू होगी. फिलहाल कार निर्माता इस सीमा से ज्यादा 40 फीसदी सीओटू छोड़ रहे हैं.

इस बीच पर्यावरण संगठनों ने लचीले नियम बनाने के लिए यूरोपीय संघ की आलोचना की है. विरोध का सुर फ्रांस की पर्यावरण मंत्री सेगोलेन रॉया ने भी बुलंद किया है, "इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मंत्रियों की बैठक में चर्चा होनी चाहिए और फैसला लिया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के हर नागरिक को साफ हवा में सांस लेने का अधिकार है और इसके लिए ईयू को जरूरी कदम उठाने चाहिए.

वैसे डीजल कारें सिर्फ यूरोप की ही समस्या नहीं हैं. भारत भी डीजल वाहनों से होने वाले प्रदूषण से जूझ रहा है. इसी साल नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने 10 साल से पुराने डीजल वाहनों को दिल्ली की सड़कों से हटाने का आदेश दिया. हिमाचल में भी दिल्ली जैसे नियम हैं. असल में डीजल इंजन पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा जहरीली गैसें छोड़ता है.

लेकिन सख्ती के बावजूद भारत में पुराने डीजल वाहन धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं. दिल्ली जैसे महानगरों में सीएनजी बसें और मेट्रो रेल चलाए जाने के बावजूद प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर को छूने लगा है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि हवा की गुणवत्ता के अनुसार दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषत शहर है.

भारत में इस समस्या को लेकर अपने विचार आप हमसे साझा कर सकते हैं, इस रिपोर्ट के नीचे लिखें अपनी प्रतिक्रिया.

ओएसजे/आईबी (डीपीए)

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