1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

डीएनए टेस्ट से रेप का फैसला

बलात्कार के मामलों में पाकिस्तान डीएनए परीक्षणों को सबूत मानने पर लगी रोक हटा सकता है. एक ताकतवर इस्लामी संस्था ने प्रस्तावित कानून से अपनी आपत्ति हटा ली है.

काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी ने डीएनए परीक्षणों को बलात्कार के मामलों में प्रमुख सबूत मानने का फैसला किया है. अब तक इसे दूसरे स्तर का ही सबूत माना जाता है. इसके साथ ही इस मुद्दे पर लंबे समय से चली आ रही बहस खत्म हो गई है. संस्था के फैसले के बाद इस कानून बनाने की राह की बाधाएं खत्म हो गई हैं. काउंसिल ने शरीया आधारित अपने ही उस फैसले को बदल दिया जिसमें कहा गया था कि डीएनए बलात्कार के मामलों में प्रमुख भूमिका नहीं निभा सकता.

काउंसिल के एक सदस्य ताहिर अशरफी ने बताया कि लाहौर में पांच साल की एक बच्ची के बलात्कार के बाद लोगों के भड़के गुस्से को देखते हुए इस बदलाव को मंजूरी देने का फैसला किया गया है. 1979 में यह कानून तब के सैनिक शासक रहे जनरल जिया उल हक ने लागू किया था. इसके तहत बलात्कार के आरोप की पुष्टि के लिए पीड़ित को चार वयस्क और धर्मनिष्ठ पुरुषों को गवाह के रूप में पेश करना होता है. काउंसिल ने इसी साल मई में कहा था कि यह कानून कुरान के नियमों से बना है, इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता.

DW.COM

हालांकि काउंसिल के फैसले की सामाजिक संगठनों और मीडिया में बड़ी आलोचना हुई. उनकी दलील है कि 1979 के कानून की वजह से बलात्कार के बहुत कम मामलों में आरोप सिद्ध हो पाते हैं. फातिमा जिन्ना वीमेन यूनिवर्सिटी में जेंडर स्टडीज की प्रोफेसर शहला तबस्सुम बताती हैं कि 1979 से 2010 के बीच बिना पर्याप्त सबूतों के बलात्कार की शिकायत करने के कारण हजारों पीड़ितों को जेल में डाल दिया गया.

2010 में पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने इस कानून से एक नुक्ता निकाल दिया कि अगर कोई महिला बलात्कार की बात कहे और साबित न कर पाए, तो उसे जेल में डाल दिया जाए. हालांकि डीएनए परीक्षण के प्रावधान को तब भी नहीं छुआ गया क्योंकि रूढ़िवादी इस्लामी समाज के गुस्से का डर था. तबस्सुम का कहना है, "आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि कोई बलात्कार पीड़ित गवाही के लिए चार लोगों को ले आए? मेरा ख्याल है कि हमारे समाज की महिलाओं की रक्षा के लिए डीएनए को फोरेंसिक सबूत जरूर माना जाना चाहिए."

इस्लामाबाद में रहने वाले वकील रिजवान खान का कहना है कि डीएनए टेस्टिंग को दूसरे दर्जे का सबूत मानना पर्याप्त नहीं अगर अभियोग अभी भी चार लोगों की गवाही पर टिका हो. रिजवान के मुताबिक, "अगर भरोसेमंद तकनीक मौजूद है और दूसरे देशों में इस्तेमाल की जा रही तो इसका इस्तेमाल यहां भी होना चाहिए."

मानवाधिकार आयोग और कानून मंत्रालय के मुताबिक पाकिस्तान में जनवरी 2011 से अब तक 600 महिलाओं का बलात्कार हुआ जिनमें ज्यादातर किशोर उम्र की बच्चियां हैं. पर इसी दौर में बलात्कार का कोई ऐसा मुकदमा नहीं चला, जिसमें किसी को दोषी ठहराया गया हो. खान का कहना है जब तक डीएनए परीक्षण को प्राथमिक सबूत नहीं माना जाएगा बलात्कार पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती.

एनआर/एजेए (डीपीए)

संबंधित सामग्री