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ब्लॉग

डिग्री मामला: केजरीवाल का एक और तमाशा

भारत में इस वक्त सबसे बड़ी अदालत अरविंद केजरीवाल की है. ओंकार सिंह जनौटी का कहना है कि मोदी के डिग्री विवाद ने दिखा दिया है कि सुर्खियां बटोरने के लिए केजरीवाल किस हद तक जा सकते हैं.

डिग्री लेने के लिए क्या करना पड़ता है. कहीं दीक्षांत समारोह होता है तो कुछ जगहों पर एप्लिकेशन लिखनी होती है. उसमें अपना नाम, रोल नंबर और पास होने का वर्ष लिखना होता है. वह आवेदन फीस के साथ यूनिवर्सिटी को दिया जाता है और फिर डिग्री मिलती है. अगर छात्र खुद न जा सके तो रजिस्टर्ड डाक के जरिये डिग्री एप्लिकेशन में दिये गए पते पर भेजी जाती है. यह एक प्रक्रिया है ताकि महत्वपूर्ण दस्तावेज सही हाथों में जाए. उनका दुरुपयोग न हो.

कई नौकरियों के लिए आवेदन करते समय दसवीं, बारहवीं और डिग्री के दस्तावेज लगाने पड़ते हैं. उनकी फोटो कॉपी को कम से कम क्लास टू अफसर से अटेस्ट कराना पड़ता था. अटेस्ट कराते समय मूलप्रति भी दिखानी पड़ती थी. हां, अगर इसकी आड़ में फर्जी काम होता है तो वह जालसाजी का मामला है और उसपर कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत में जितने अटेस्टेड दस्तावेज हैं सब फर्जी हैं.

Deutsche Welle Hindi Onkar Singh Janoti

ओंकार सिंह जनौटी

वैसे भी हर साल हजारों छात्र 10वीं और 12वीं पास करने के बाद भारतीय सेना या पुलिस में भर्ती होते हैं. उनके सर्टिफिकेटों की जांच के लिए नियमावली के तहत नौकरी देने वाला विभाग इंटर कॉलेजों से संपर्क करता है. दस्तावेज रजिस्टर्ड डाक से सत्यापन के लिए भेजे जाते हैं और सत्यापन के बाद रजिस्ट्री से वापस भेजे जाते हैं. यह भी एक प्रकिया है, इससे न किसी नेता का कोई लेना देना है, न सूचना आयोग का.

तीसरा उदाहरण है, डिग्री या सर्टिफिकेट के खोने का. ऐसे में बाकायदा अखबार में विज्ञापन देकर, उसकी कटिंग एप्लिकेशन में लगाकर और अपने साक्ष्य देकर दूसरी कॉपी मांगी जाती है. यहां भी आवदेक को या खुद उपस्थित होना पड़ता है या पहचान प्रमाणित होने के बाद रजिस्टर्ड डाक के जरिए दस्तावेज भेजे जाते हैं. और ये भी एक प्रक्रिया है.

अब बात आती है अरविंद केजरीवाल स्टाइल की, जो इन सब नियमावलियों और प्रक्रियाओं से ऊपर है. जरा सोचिये कि कोई राजनैतिक इरादे से सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आपके सर्टिफिकेट या आपकी डिग्री मांगे. यूनिवर्सिटी से मांग करे कि इसे सार्वजनिक करो. यूनिवर्सिटी अगर नियमों का हवाला देकर मना करे तो कहे कि ये सबकी मिली भगत है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री के पीछे कुछ इसी अंदाज में पड़े. सोशल मीडिया टीम के जरिए ट्विटर पर आए दिन उन्होंने ऐसा माहौल बनाया कि लगने लगा कि प्रधानमंत्री डिग्री को लेकर झूठ बोल रहे हैं.

Indien Wahlen Nitish Kumar

मोदी की डिग्री कोई मुद्दा नहीं: नितीश कुमार

धीरे धीरे ऐसा हव्वा बना कि सूचना आयुक्त तक ने भी अपनी अक्ल ताक पर रख दी और यूनिवर्सिटी को डिग्री पेश करने को कहा. सूचना आयुक्त भी यह भूल गए कि बतौर छात्र अर्जित की गई डिग्री पर उस व्यक्ति का अधिकार भी है. मोदी की डिग्री को लेकर अगर कोई संशय था तो निर्वाचन आयोग से शिकायत की जानी चाहिए थी. स्मृति ईरानी के मामले ऐसा ही हुआ. दूध का दूध, पानी का पानी हो जाता, लेकिन केजरीवाल को दूसरे पर कीचड़ उछालकर सुर्खियों में बने रहने का चस्का है.

इसी क्रम में मोदी का 2001 का इंटरव्यू भी निकाला गया. उसके वो हिस्से फेसबुक पर डाले गए जिसमें उन्होंने डिग्री की बात टाल दी. मोदी विरोधियों ने उसे ताबड़तोड़ ढंग से शेयर करते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि देखो झूठ पकड़ा गया. जागरूक की जगह राजनैतिक समाज हो चले भारत में कुछ देर में उस इंटरव्यू का वो हिस्सा भी सामने आया जिसमें मोदी ने कहा कि उन्होंने बीए, एमए किया है.

राजनीति में नीतियों, भाषा और प्रशासनिक दक्षता को लेकर विरोध होना चाहिए. विरोध करना विरोधी दलों का कर्तव्य भी है और मजबूरी भी है ताकि वे अपनी उपयोगिता साबित करते रहें. लेकिन विरोध का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि लोगों को योजनाबद्ध तरीके से गुमराह किया जाए. स्वयं को न्यायालय की तरह पेश कर ईमानदारी और बेईमानी के सर्टिफिकेट बांटे जाएं. विधानसभा चुनाव से पहले केजरीवाल ने खुद को ईमानदार और शीला दीक्षित को बेईमान कहने वाले पोस्टरों से दिल्ली को पाट दिया था. 100 दिन में जेल भेजने की बात कही थी, अब वो वादे कहां हैं. उल्टा इन दिनों भी दिल्ली सरकार की आलोचना करने वाले अखबारों के विज्ञापन बंद किये जा रहे हैं. सरकारी विज्ञापनों की आड़ में केजरीवाल एफएम रेडियो का तक का एजेंडा सेट कर रहे हैं. उनकी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों की दिल्ली सचिवालय में एंट्री बंद कर दी गई है. क्या पारदर्शिता का आदर्श मॉडल यही है.

लेकिन यह कीचड़ उछाल राजनीति है. कांग्रेस और बीजेपी समेत करीबन सभी पार्टियां इसकी खुद दोषी हैं. जैसा बोया वैसा काटा जा रहा है, लेकिन यह परंपरा बंद होनी चाहिए. विरोध किसी का भी हो, वह न्यायोचित होना चाहिए, प्रायोजित नहीं.

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