डार्कनेटः जासूसी से बचने का उपाय | मंथन | DW | 20.09.2013
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मंथन

डार्कनेटः जासूसी से बचने का उपाय

डाटा देखना एनएसए के लिए बाएं हाथ का खेल है. लेकिन इंटरनेट की दुनिया में ऐसे भी इलाके हैं जहां अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए नहीं पहुंच सकती. यह है डार्कनेट की दुनिया.

इस जासूसी से क्या इंटरनेट पर अपराधियों और आतंकियों की संख्या कम हो गई है या इंटरनेट की दुनिया उनके लिए बंद हो गई है. नहीं ऐसा नहीं है. और इसका एक कारण है डार्कनेट. जितना ये सामान्य लोगों के लिए पहचान छिपाने का रास्ता होता है उतना ही अपराधियों के लिए भी छिप कर काम करने का ठिकाना.

एक ओर तो नेता और जानकार इंटरनेट में तेजी और डाटा हाईवे की बात करते हैं वहीं डार्कनेट इसी हाईवे के किनारे वाली छोटी सड़क है जहां कोई दिशानिर्देश नहीं है. यहां रास्ता तलाशने के लिए तकनीक से दोस्ती होनी चाहिए. अपना रास्ता भी खुद ही ढूंढना होता है. डार्कनेट में गूगल या किसी और सर्च मशीन जैसा कुछ नहीं होता. सिर्फ एक तरह का कैटलॉग होता है जिसमें सारी जानकारियां मौजूद हों यह जरूरी नहीं है. यह जानबूझ कर ऐसा डिजाइन किया गया है क्योंकि डार्कनेट का उद्देश्य ही पहचान छिपाना है.

विकेंद्रीकृत और पहचान छिपाने वाला

सामान्य इंटरनेट और डार्कनेट में यही दो सबसे बड़े अंतर हैं. डार्कनेट का कोई सेंटर नहीं है और इसमें पहचान पूरी तरह छिप सकती है. क्योंकि दोनों बिलकुल अलग तरह से बनाए गए हैं. इंटरनेट में काम दूसरी तरह से होता है. उदाहरण के लिए एक व्यक्ति फेसबुक में लॉग इन करने के लिए वह एक सिस्टम के जरिए अपने फोटो और टेक्स्ट लिखता है. दूसरा व्यक्ति अगर ये जानकारी जुटाना चाहे तो उसे भी फेसबुक में ही जाना होगा. तो मुख्य सेंटर फेसबुक का सर्वर है जहां सभी यूजरों की जानकारी होती है.

आंकड़ों सुरक्षा की नजर से देखा जाए तो यही इंटरनेट का रोचक हिस्सा है. जो भी फेसबुक गूगल या बड़ी वेबसाइट से जाता है उसे देखा जा सकता है. यही काम एडवर्ड स्नोडेन के मुताबिक अमेरिका ने किया.

डार्कनेट में ऐसा कोई सेंट्रल प्वाइंट नहीं होता. हर कंप्यूटर एक सर्वर है. लेकिन वह कुछ ही सूचना लेता है. ये एनकोडेड होता है. कंप्यूटर से कंप्यूटर को पहुंचने वाला डेटा भी कोड में बंद होता है और एनॉनिम ही चलता है. तो पकड़ने वाले डेटा तो देख सकते हैं लेकिन किसने भेजा है ये पकड़ में आना डार्कनेट में संभव नहीं.

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मेटाडेटा भी राज

डार्कनेट बनाने वालों ने नेट को पहचानहीन बनाने के लिए और कदम उठाया. नेट में इस्तेमाल किए जाने वाला मेटाडेटा भी बाहर वाले के लिए बेकार कर देते हैं. मेटा डाटा में रिसीवर, सेंडर और पीसी दर्ज होता है. जो भी सामान्य इंटरनेट इस्तेमाल करता है देख सकता है कि दो कंप्यूटर के बीच किस तरह का डाटा इस्तेमाल हो रहा है. भले ही डाटा एनकोडेड हो लेकिन ये पता चल जाता है कि दो कंप्यूटरों के बीच किस तरह का लेन देन हुआ है. जासूसी करने के यहां कई मौके हैं. वहीं डार्कनेट में डाटा तीन अलग अलग कंप्यूटरों से भेजा जाता है. तो हर बार नया पता मिलता है. जब संदेश लक्षित कंप्यूटर पर पहुंचता है तो पता नहीं चल पाता कि किसने डाटा भेजा. हालांकि इसी कारण डार्कनेट सामान्य इंटरनेट से धीमा भी होता है.

विरोधियों और अपराधियों पसंद

डार्कनेट के कारण अपराधियों को काफी फायदा होता है. यहां सिल्क रोड, ब्लैक मार्केट रिलोडेड जैसे बाजार मिलते हैं जो हथियारों के बाजार हैं. जो खुद वायरस नहीं बना सकता उसे यहां मदद मिल जाती है. बिना पहचान जाहिर किए बिल भी चुकाया जा सकता है. इसके लिए दुकानदार और ग्राहक बिटकॉइन का इस्तेमाल करते हैं. इस दौरान डाटा एनॉनिम लिया दिया जाता है. मुद्रा भी इन्हीं डाटा से बनी होती है जिसे इच्छा के हिसाब से कम ज्यादा नहीं किया जा सकता. कानूनन इसे मुद्रा में आराम से बदला जा सकता है.

सरकार विरोधियों में भी डार्कनेट बहुत पसंद किया जाता है. जिसके पास भी सामान्य इंटरनेट है वह टोर सॉफ्टवेयर के जरिए डार्कनेट इस्तेमाल कर सकता है. एडवर्ड स्नोडेन ने भी गार्डियन के रिपोर्टर से इसी तरह संवाद बनाया था.

पुराने दौर की ओर

डार्कनेट यूजरों को पकड़ना पुलिस या खुफिया एजेंटों के लिए आसान नहीं है. यहां डाटा लेना और उसका विश्लेषण करना काफी नहीं है. बल्कि पुलिस इसके जरिए ड्रग डीलरों का सुराग पकड़ रही है. इसके लिए पुलिस खुद इस प्रणाली में शामिल होती है और फिर ग्राहक या खरीददार बन कर अपराधियों को पकड़ती है. या फिर कोशिश करती है कि व्यक्ति को विश्वास में लेकर उसकी पहचान की जाए.

रिपोर्टः योर्ग ब्रुन्समन/एएम

संपादनः एन रंजन