डायन प्रथा पर नहीं लग सका अंकुश | दुनिया | DW | 19.12.2016
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दुनिया

डायन प्रथा पर नहीं लग सका अंकुश

तमाम मोर्चे पर प्रगति के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में अब भी अंधविश्वास जस का तस है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है डायन के नाम पर लगातार होने वाली हत्याएं.

देश में जितने तरह के अंधविश्वास कायम हैं उनमें डायन प्रथा सबसे खतरनाक है. डायन प्रथा यानी किसी भी बुरे काम के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोषी करार देकर उसे सामूहिक तौर पर सजा देना या प्रताड़ित करना. कई मामलों में तो ऐसे लोगों की हत्या तक कर दी जाती है. अभी बीते महीने ही असम के नगांव जिले में दो महिलाओं के शव बरामद किए गए. पुलिसिया जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि उनकी हत्या डायन होने के संदेह में कर दी गई थी. बीते पांच वर्षों के दौररान राज्य में ऐसे लगभग 400 मामले सामने आए हैं. दिलचस्प बात यह है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में ऐसी कथित डायनों को पहचानने वाले ओझा भी भारी तादाद में हैं. वही लोग इन कथित डायनों  की पहचान कर गांव के लोगों को बताते हैं. उसके बाद गांव वाले डायनों  की करतूत के हिसाब से उनकी सजा तय कर देते हैं. नुकसान ज्यादा हुआ तो यह सजा मौत तक हो सकती है.

असम में यह हालत तब है जबकि बीते साल अगस्त में ही को विधानसभा ने डायन हत्या निवारक कानून (प्रीवेंशन एंड प्रोटेक्शन फ्रॉम विच-हंटिंग बिल, 2015) पारित किया था. इस कानून में किसी स्त्री को डायन करार देने वाले यानी ओझा को तीन से पांच साल की सख्त सजा और 50 हजार से पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. डायन बता कर जुल्म करनेवाले को पांच से 10 साल की सजा और एक से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है. अगर ऐसे मामलों में किसी समूह को दोषी पाया जाता है, तो उस समूह के हर व्यक्ति को पांच से 30 हजार रुपये तक का जुर्माना देना होगा. डायन बता कर किसी की हत्या करने पर धारा 302 के तहत मुकदमा चलाने का भी प्रावधान है. असम का यह कानून झारखंड, बिहार, ओडीशा और महाराष्ट्र के ऐसे मौजूदा कानूनों से ज्यादा सख्त है. बावजूद इसके डायन के नाम पर होने वाले अत्याचार और हत्याओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है.

असम में बीते पांच वर्षो में 70 महिलाओं को डायन बता कर उनकी हत्या कर दी गई. जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि इनमें से ज्यादातर मामलों का कारण जमीन और संपत्ति विवाद था. बीते एक दशक के दौरान वहां डायन प्रथा के नाम पर लगभगग 1,200 महिलाओं की हत्या हो चुकी है.

झारखंड में भी हालत लगभग समान ही है. वहां बीते एक साल के दौरान डायन के नाम पर अत्याचार व प्रताड़ना के लगभग 550 मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें लगभग 42 लोगों की हत्या हो चुकी है. इस मामले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए तुरंत प्रभावी उपाय करने का निर्देश दिया है. राज्य में बीते पांच वर्षों के दौरान ऐसे लगभग साढ़े तीन हजार मामले सामने आए हैं. इनमें से ज्यादातर मामले आदिवासी इलाकों के हैं.

वजह

देश के विभिन्न राज्यों में फैली इस प्रथा को लेकर तमाम अध्ययन हुए हैं. उनमें कहा गया है कि इस अंधविश्वास की कई वजहें हैं. खासकर असम में तो यह प्रथा ईसा मसीह से तीन हजार साल पहले से प्रचलित है. वहां तब किसी भी बीमारी, महामारी या मानसिक असंतुलन के लिए डायनों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता था. जादू-टोने करने वालों का स्वर्ग कही जाने वाली मायोंग नामक जगह भी असम में ही है. असम के काल जादू और रोजगार की तलाश में वहां जाने वाले पुरुषों को भेड़ा बना कर रखने की कहानियां तो काफी मशहूर हैं. इस काले जादू के मुकाबले के लिए ही ओझा का वजूद सामने आया था. ओझा प्रथा में पुरुषों का वर्चस्व है.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि जागरुकता व शिक्षा के अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने खासकर ग्रामीण इलाकों में इस दकियानुसी प्रथा को बढ़ावा दिया है.  छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए ओझा की शरण में जाने वाले लोगों को यह बात आसानी से समझाई जा सकती है कि उनके परिजन पर किसी भूत-प्रेत का साया है और उसके लिए अमुक महिला जिम्मेदार है. उसके बाद ही शुरू होता है उस महिला की प्रताड़ना का सिलसिला जो कई बार उसकी हत्या पर जाकर खत्म होता है. कई मामलों में तो किसी खास इलाके में बाढ़ व सूखे के लिए भी किसी कथित डायन को जिम्मेदार ठहरा कर उसकी हत्या कर दी जाती है. कई मामलों में लोग निजी खुन्नस निकालने के लिए भी किसी ओझा के साथ मिल कर इस प्रथा की आड़ में संबंधित व्यक्ति को डायन करार देते हैं.

अंकुश के उपाय

समाजशास्त्र के प्रोफेसर डां. धीरेन गोहाईं कहते हैं, "इन मामलों में सरकारी प्रयास अब तक नाकाफी हैं. जागरूकता अभियान वाले प्रचार वाहनों को बड़े तामझाम से ग्रामीण इलाकों में भेजा जाता है. लेकिन यह अभियान लगातार लंबे समय तक चलाना जरूरी है." डायन प्रथा के खिलाफ लंबे समय से जागरुकता अभियान चला रहे एक गैर—सरकारी संगठन उम्मीद के प्रवक्ता मंजीत कशयप कहते हैं, "सुदूर गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस काम किए बिना अंधविश्वास पर अंकुश लगाना मुश्किल है."

इसके अलावा इलाके में तेजी से पनपने वाले ओझाओं की गतिविधियों पर भी अंकुश लगाना होगा. इस कुप्रथा पर अंकुश लाने के लिए बने कानूनी प्रावधानों पर सख्ती से कार्रवाई करने की स्थिति में लोग किसी को डायन करार देकर उसे प्रताड़ित करने या उसकी हत्या करने से पहले सौ बार सोचेंगे.

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