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दुनिया

ट्राई ने की इंटरनेट पर भेदभाव को रोकने की सिफारिश

नेट न्यूट्रलिटी यानी नेट निरपेक्षता पर दुनिया भर में लंबे अरसे से चल रही बहस के बीच भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने साफ कर दिया है कि देश के हर नागरिक का इंटरनेट पर समान अधिकार है.

 उसने अपनी सिफारिशों में कहा है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) कंपनियां उपभोक्ताओं को सेवाएं देने के मामले में किसी तरह का भेदभाव नहीं कर सकतीं. इससे उपभोक्ताओं को तो फायदा होगा, लेकिन टेलिकॉम ऑपरेटरों के संगठन सीओएआई ने इन सिफारिशों का विरोध किया है. इन सिफारिशों के लागू होने की स्थिति में उनकी मनमानी पर अंकुश लग जाएगा. ट्राई की ये सिफारिशें ऐसे समय आई हैं जब अमेरिकी संघीय संचार आयोग के चेयरमैन अजित पई ने वर्ष 2015 के उन नियमों को समाप्त करने का प्रस्ताव किया है जिसके तहत सेवा प्रदाताओं को हर  तरह के कंटेंटे के प्रति समान व्यवहार करना होता है. चिली, नीदरलैंड्स और दक्षिण कोरिया जैसे देश नेट निरपेक्षता पर पहले ही कानून बना चुके हैं. चिली तो वर्ष 2010 में ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश था. सूचना तकनीक मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने भी हाल में कहा था कि इंटरनेट इस्तेमाल के नागरिकों के अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और सरकार किसी भी कंपनी को लोगों की इंटरनेट तक पहुंच सीमित करने की अनुमति नहीं देगी.

Kavin Mittal (Imago/Hindustan Times/M. Zakir)

हाइक मैसेंजर के सीईओ कैविन मित्तल

सिफारिशें

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने मंगलवार को नेट न्यूट्रलिटी यानी नेट निरपेक्षता के पक्ष में कई तरह की सिफारिशें की हैं. इनके लागू होने की स्थिति में उपभोक्ताओं को काफी राहत की उम्मीद है. ट्राई ने लंबी जद्दोजहद और तमाम कंपनियों से विचार-विमर्श के बाद कहा है कि इंटरनेट सर्विस प्रदाता कंपनियों के लाइसेंस करार में संशोधन करना भी जरूरी है. नियामक संस्था ने कहा है कि किसी भी सामग्री, वेबसाइट, प्लेटफार्म, एप्लीकेशन, अटैचमेंट या संचार साधनों का उपयोग करने के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाता अलग-अलग शुल्क नहीं तय कर सकते और न ही ज्यादा शुल्क वसूलने के लिए इंटरनेट को धीमा, तेज या बंद किया जा सकता है.

अगर इन सिफारिशों को स्वीकार किया जाता है तो इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) किसी वेब ट्रैफिक को न तो ब्लॉक कर सकेंगे और न ही उनको भुगतान के आधार पर तेज इंटरनेट की सुविधा दे सकेंगे. यह रोक कंप्यूटर, लैपटाप व मोबाइल फोनों समेत सभी माध्यमों पर लागू होगी. यानी दूरसंचार ऑपरेटर इंटरनेट पर सेवाओं के लिए भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपना पाएंगे. इसके अलावा ट्राई ने कंपनियों के लाइसेंसिंग नियमों में भी बदलाव की वकालत की है ताकि सामग्री के आधार पर इंटरनेट तक पहुंच के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जा सके.

ट्राई की ये सिफारिशें ऐसे समय पर आई हैं जब दुनिया भर में नेट निरपेक्षता को लेकर अभियान चल रहा है. इसके समर्थकों का सवाल है कि अमेरिका, ब्राजील, नीदरलैंड्स जैसे कई देशों में जब नेट निरपेक्षता का पालन हो रहा है तो फिर भारत समेत दूसरे देशों में इसे लागू क्यों नहीं किया जा सकता? ध्यान रहे कि एयरटेल ने 2014 में इंटरनेट के जरिए फोन कॉल करने पर अलग से शुल्क वसूलने का फैसला किया था, जिसे बाद में ट्राई और उपभोक्ताओं के विरोध की वजह से टाल दिया गया था. इसी तरह कुछ दूसरी कंपनियों ने व्हट्सऐप, ट्विटर जैसी सेवाओं के लिए अलग से शुल्क लेने की तैयारी कर ली थी. ट्राई के अध्यक्ष आरएस शर्मा कहते हैं, "भारत के लिए इंटरनेट एक महत्वपूर्ण मंच है. यह पूरी तरह मुक्त व मुफ्त होना चाहिए. वह कहते हैं कि इंटरनेट का कोई मालिक नहीं है. इसलिए इस तक सबकी समान पहुंच होनी चाहिए."

(कैसे पैसा बनाता है फेसबुक)

सूचना मंत्री की दलील

सूचना तकनीक मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने भी हाल में कहा था कि नागरिकों के इंटरनेट इस्तेमाल के  अधिकार से कोई समझौता नहीं किया जा सकता और सरकार किसी भी कंपनी को लोगों की इंटरनेट तक पहुंच सीमित करने की अनुमति नहीं देगी. राजधानी दिल्ली में साइबरस्पेस सुरक्षा पर एक वैश्विक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि सरकार मानती है कि इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री हर हाल में बिना किसी रुकावट के उपभोक्ताओं तक पहुंचनी चाहिए. मंत्री का कहना था, "सरकार ने प्रमुख सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक के फ्री बेसिक्स कार्यक्रम को मंजूरी नहीं दी. इसकी वजह यह थी क्योंकि यह चुनिंदा इंटरनेट सेवाओं को ही प्राथमिकता देता था." ध्यान रहे कि फेसबुक ने कुछ दूरसंचार कंपनियों के साथ मिलकर नि:शुल्क बेसिक इंटरनेट पहुंच के लिए वर्ष 2015 में यह कार्यक्रम शुरू किया था. लेकिन इस पर उपजे विवाद और देशव्यापी बहस के फेसबुक ने फरवरी 2016 में इसे को बंद कर दिया.

विरोध

इन सिफारिशों के लागू होने पर आम उपभोक्ताओं को लाभ होना तय है. लेकिन टेलिकॉम ऑपरेटरों के संगठन सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (सीओएआई) ने ट्राई की सिफारिशों को नेट न्यूट्रीलिटी की संकीर्ण परिभाषा करार दिया है. हालांकि उसने सैद्धांतिक तौर पर इन सिफारिशों पर सहमति जताई है. संगठन ने वॉयस काल, व्हट्सऐप, स्काइप, बीवर और गूगल डूओ जैसी सेवाओं को लेकर चिंता जताई है. सीओएआई के महानिदेशक रंजन मैथ्यूज कहते हैं, "नेट निरपेक्षता के मुद्दे पर विस्तृत नजरिया अपनाना जरूर है. इसके तहत देश के एक अरब लोगों तक इंटरनेट की पहुंच सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए." वह कहते हैं कि मैसेजिंग और कॉलिंग ऐप वाली कंपनियों को लाइसेंस देने की बात भी सिफारिशों में शामिल की जानी चाहिए. दूसरी ओर, नेट कंपनियों के संगठन इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया (आईएएमएआई) ने इन सिफारिशों को व्यवहारिक व प्रगतिशील करार दिया है. संगठन का कहना है देश में डिजिटल सेवाओं का विस्तार बेहद जरूरी है. सूचना तकनीक क्षेत्र की कंपनियों के सबसे बड़े संगठन नैस्कॉम ने भी इन सिफारिशों का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे इंटरनेट तक तमाम नागरिकों की समान पहुंच सुनिश्चित होगी.

लेकिन साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ट्राई की सिफारिशों को उनके मूल स्वरूप में लागू होने की स्थिति में ही उपभोक्ताओं को इसका असली फायदा होगा. इसलिए सरकार को इनको अमली जामा पहनाने की दिशा में शीघ्र ठोस पहल करनी चाहिए.

(सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनियां)

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