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दुनिया

ट्यूनीशिया में हक की लड़ाई

डिग्निटी यानी आत्म सम्मान. यही है इस साल के विश्व सामाजिक सम्मलेन का नारा. 11 साल से हो रहे इस सम्मलेन को पहली बार किसी अरब देश में आयोजित हो रहा है. वर्ल्ड सोशल फोरम के लिए ट्यूनीशिया में दुनिया भर से लोग जमा हुए हैं.

2011 में ट्यूनीशिया में हुई क्रांति को जैसमीन रेवोल्यूशन का नाम दिया गया. ट्यूनीशिया के साथ साथ और भी कई अरब देशों में लोग तानाशाही के खिलाफ और समानाधिकार के लिए खड़े हुए. इसने दुनिया भर में अरब देशों की एक नई छवि प्रस्तुत की. यही वजह है कि सामाजिक अधिकारों के लिए लोगों का ध्यान खींचने के लिए दुनिया भर से लोग इस बार ट्यूनीशिया में जमा हुए हैं. पांच दिन तक चलने वाले इस सम्मलेन की आयोजन कमेटी के मोहेउद्दीन शेरबिब देश में हो रहे सम्मलेन की एहमियत समझते हैं, "क्रांति के बाद यहां ऐसा आयोजन होना बहुत बड़ी बात है." शेरबिब कहते हैं कि बेन अली के शासन में देश में इस तरह के आयोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

वर्ल्ड सोशल फोरम का आयोजन दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक सम्मलेन के विकल्प के तौर पर बनाया गया है. जहां दावोस में दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष भाग लेते हैं वहीं, वहीं इस सम्मलेन में आम जनता हिस्सा लेती है. रविवार तक ट्यूनिस यूनिवर्सिटी के कैम्पस में करीब 3,000 वर्कशॉप होंगी. साथ ही कई कार्यक्रम और रैलियां भी होंगी. फोरम के आयोजन में 4,500 लोग लगे हैं. ट्यूनीशिया के युवा दुनिया भर से 50,000 लोगों के यहां पहुंचने की उम्मीद कर रहा है. ये लोग मिल कर वैश्वीकरण, महिलाओं के अधिकारों और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे हैं. शेरबिब कहते हैं, "हमारे लिए लोकतंत्र की राह बहुत कठिन है, मैं उम्मीद करता हूं कि फोरम से हमें फायदा मिलेगा."

महिला संगठन ट्यूनीशिया की सत्ताधारी इस्लामिक पार्टी की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं. सम्मलेन में हिस्सा ले रही एक यूनिवर्सिटी की छात्रा जेनेब चीही ने कहा, "वे शरिया कानून लगाना चाहते हैं और महिलाओं को उनकी आजादी से वंचित करना चाहते हैं. मिस्र में भी यही हो रहा है." महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उन्हें राजनीति से दूर रखने के खिलाफ यहां आवाज उठाई जा रही है. महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ रहीं हलीमा यूनी का कहना है, "हम चाहते हैं कि यहां बदलाव आए, सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले, औरतों और आदमियों के साथ बराबरी से पेश आया जाए और लोकतंत्र बने."

लेकिन पहली बार यहां हो रहे सम्मलेन को कुछ परेशानियों से भी जूझना पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पैसा तो जमा किया है, लेकिन वह यहां देर से पहुंच रहा है. मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने मंगलवार को इस बात की शिकायत की थी कि अल्जीरिया ने करीब 100 कार्यकर्ताओं के ट्यूनिस आने पर रोक लगाई हुई है.

रिपोर्ट: साराह मेर्श/ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

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