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विज्ञान

टेस्ट ट्यूब गर्भाधान की भविष्यवाणी हो सकेगी

अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एक ऐसा फॉर्मूला विकसित किया है जिसकी मदद से यह भविष्यवाणी की जा सकेगी कि कृत्रिम गर्भाधान सफल रहेगा या नहीं. इस फॉर्मूला का उपयोग व्यावसायिक टेस्ट की प्रक्रिया तैयार करने के लिए किया गया है.

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शोधकर्ताओं का कहना है कि नैशनल एकेडमी ऑफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित उनका टेस्ट दम्पत्तियों को विट्रो फ़र्टिलाइजेशन के ज़रिए गर्भ धारण करने के बार बार प्रयास की परेशानी और खर्च से बचा पाएगा. विट्रो फ़र्टिलाइजेशन बांझपन के उपचार की ऐसी विधि है जो बाहरी सहायता से गर्भाधान के सभी उपायों के विफल हो जाने के बाद उपयोग में लाया जाता है. इसमें गर्भ के बाहर डिंब और शुक्राणु का मेल कराया जाया है और उसके बाद बने भ्रूण को विकास के लिए गर्भाशय में डाला जाता है.

Familie, junges Paar mit Baby

यह विधि सफल रहेगी या नहीं, इसकी भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है. चिकित्सक आम तौर पर महिला की उम्र पर भरोसा करते हैं और उसी के आधार पर अपनी राय देते हैं. शोधकर्ताओं ने कहा है कि टेस्ट से आश्चर्यजनक रूप से यह बात सामने आई है कि जिन लोगों को परंपरागत आकलन के तरीकों से और प्रयास न करने को कहा जाता, वे दरअसल गर्भ धारण करने में सफल हो सकती हैं.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की डा. मायलिन याओ के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने 2003 से 2008 तक स्टैनफ़ोर्ड अस्पताल में किए गए 5000 विट्रो फ़र्टिलाइजेशन के आंकड़ों को खंगाला. उन्होंने न सिर्फ़ महिलाओं की उम्र पर ध्यान दिया बल्कि भ्रूण के विकास की तेजी, महिलाओं की हॉरमोनल प्रतिक्रिया और गर्भाशय की स्थिति पर ध्यान दिया और उसकी उपचार की सफलता से तुलना की. डा. याओ का कहना है कि चूंकि उनका मॉडल पहले के विफल उपचारों का डाटा उपयोग में लाता है, इसलिए विट्रो फ़र्टिलाइजेशन को बांझपन का उपचार और भावी उपचार की भविष्यवाणी का साधन समझा जा सकता है.

विश्व भर में 8 करोड़ लोग बच्चा पैदा करने की स्थिति में नहीं हैं. अमेरिका में उनकी संख्या 72 लाख है. हर साल वहां लगभग डेढ़ लाख कृत्रिम गर्भाधान कराया जाता है. और यह बाज़ार तेजी से बड़ रहा है. याओ का कहना है कि अमेरिका में एक प्रतिशत नवजात शिशु विट्रो फ़र्टिलाइजेशन की मदद से पैदा होते हैं. 1978 में पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के पैदा होने के बाद विश्व भर में 10 लाख से अधिक विट्रो बच्चे पैदा हो चुके हैं.

अब याओ और उनके साथियों ने इस टेस्ट विधि के विकास और उसकी बिक्री के लिए एक कंपनी बनाई है. कंपनी ने स्टैनफ़ोर्ड से इसका लाइसेंस लेने के बाद पेटेंट के लिए आवेदन दिया है.

रिपोर्ट: रॉयटर्स/महेश झा

संपादन: एन रंजन