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दुनिया

टीवी कर रहा टॉर्चर की बड़ाई

दुनिया भर में आतंक के खिलाफ लड़ाई के कारण टॉर्चर बहुत ही सामान्य मुद्दा हो गया है. 24 व होमलैंड जैसे टीवी शो इस अमानवीय हरकत का महिमामंडल भी कर रहे हैं.

लंदन के एमनेस्टी इंटरनेशनल मानवाधिकार संस्थान अब प्रताड़ना को खत्म करने के लिए नया अभियान शुरू कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र ने 30 साल पहले ही टॉर्चर पर पूरी रोक लगा दी थी. लेकिन अभी तक इसका खात्मा नहीं हो सका है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि उसने 141 देशों में प्रातड़ना के मामले दर्ज किए हैं और इनमें वो 79 देश भी शामिल हैं जिन्होंने टॉर्चर के खिलाफ हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. 1984 में हुए इस संयुक्त राष्ट्र के समझौते में दुनिया के 155 देशों ने दस्तखत किए थे.

21 देशों में 21,000 लोगों के वैश्विक सर्वे में सामने आया है कि अभी भी यंत्रणा दी जाती है. 44 फीसदी लोगों को डर लगता है कि अगर कभी उन्हें पकड़ा गया तो उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा. हालांकि तीन फीसदी ऐसे भी लोग थे जिन्होंने कहा कि कुछ मामलों में टॉर्चर जरूरी होता है और ये भी अगर मुद्दा लोगों की सुरक्षा का है तो जरूरी जानकारी निकलवाने के लिए अत्याचार स्वीकार्य है.

एमनेस्टी के महासचिव सलिल शेट्टी ने स्टॉप टॉर्चर अभियान के लॉन्च के दौरान पत्रकारों से कहा, "यह (टॉर्चर) बहुत ही सामान्य हो गया है, एकदम रुटीन की तरह. आतंक के खिलाफ लड़ाई के दौरान यंत्रणा का इस्तेमाल, खासकर अमेरिका में और उसके प्रभावक्षेत्र में, राष्ट्रीय सुरक्षा की उम्मीदों के मद्देनजर बहुत ही सामान्य हो गया है."

टॉर्चर का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या हर देश में अलग अलग थी. भारत और चीन में जहां ये 74 प्रतिशत हैं वहीं ग्रीस में सिर्फ 12 और अर्जेंटीना में 15 फीसदी हैं. ग्लोब स्कैन नाम की अंतरराष्ट्रीय पोलिंग कंपनी ने ये आंकड़ें जमा किये हैं. ब्रिटेन जहां यंत्रणा का डर सबसे कम है वहां भी 29 फीसदी लोगों ने इसे सही बताया. ब्रिटेन में एमनेस्टी की निदेशक केट एलेन के मुताबिक इसका कारण हिंसा से भरे, जासूसी टीवी शो हैं. वह कहती हैं, "24 और होमलैंड जैसे टीवी शो के कारण एक पीढ़ी में यंत्रणा की वाहवाही हो रही है. लेकिन स्क्रीनराइटरों के इस नाटक और टॉर्चर चैंबर में सरकारी एजेंटो द्वारा सच के टॉर्चर में बहुत फर्क है."

यंत्रणा का खात्मा

1977 में एमनेस्टी को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था क्योंकि उनका काम टॉर्चर के खिलाफ संघर्ष करना था. अब दो साल के इस अभियान के तहत इस मुद्दे को फिर से उठाया जाएगा. इस ग्रुप ने आंका कि कैसे संयुक्त राष्ट्र समझौते के कारण यंत्रणा को दुनिया की सरकारों ने खत्म करने की कोशिश की लेकिन साथ ही उसने चेतावनी भी दी है कि सच्चाई में कई इसे आगे बढ़ा रहे हैं और इस पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे.

एमनेस्टी ने एशिया में पुलिस की क्रूरता के बारे में बताया जहां टॉर्चर रोजमर्रा का काम है और कहा कि अफ्रीका में भी 30 से ज्यादा देश हैं जहां इस तरह के अत्याचारों पर सजा के लिए कोई कानून नहीं है.

नया अभियान पांच देशों पर केंद्रित है जहां यातना की समस्या सबसे ज्यादा और जहां इस अभियान का असर पड़ सकता है. ये अभियान मेक्सिको, फिलीपींस, मोरक्को, पश्चिमी सहारा, नाइजीरिया और उज्बेकिस्तान में चलाया जाएगा.

एएम/ओएसजे (एएफपी)

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