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विज्ञान

टीकों से डरने की जरूरत नहीं

बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए टीके दिए जाते हैं. इनमें से कुछ के बारे में माना जाता है कि उनके गंभीर साइड इफेक्ट होते हैं. एक स्टडी का कहना है कि ऐसा बहुत ही दुर्लभ मामलों में होता है.

इस स्टडी में बच्चों को छह साल की उम्र से पहले दिए जाने वाले कई टीकों पर हुए गंभीर अध्ययनों का व्यवस्थित आकलन किया गया है. नतीजों को यूएस पेडियाट्रिक्स पत्रिका में प्रकाशित किया गया है. इस रिपोर्ट का मकसद अमेरिका और यूरोप में माता पिताओं में बच्चों को टीका न दिलवाने की बढ़ती रुझान की समस्या का सामना करना है. इसकी वजह से दुनिया के कुछ हिस्सों में खसरे और कुकुरखांसी के मामले फिर से उभरने लगे हैं. अध्ययन में हेपेटाइटिस ए, हेमोफीलियस टाइप बी, पोलियो, रोटा वायरस और निमोकोकोल कंजुगेट टीके को शामिल किया गया है.

इस अध्ययन के लेखकों में शामिल कर्टनी गीडेनगिल कहती हैं, "हमने पाया कि टीके से जोड़े जाने वाले गंभीर नुकसान सचमुच दुर्लभ हैं और जब वे होते भी हैं तो इतने गंभीर नहीं होते." गीडेनगिल हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में प्रोफेसर हैं और बॉस्टन के चिल्डरेन हॉस्पिटल में बच्चों की डॉक्टर हैं. उनका कहना है, "हम समझते हैं कि यह इस सबूत की पुष्टि करता है कि टीके के फायदे गंभीर साइड इफेक्ट के जोखिम से काफी ज्यादा हैं." यह अध्ययन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसीन की उस रिपोर्ट की भी पुष्टि करता है जिसमें टीके के कुछ साइड इफेक्ट की बात की गई थी लेकिन उसकी वजह से स्वास्थ्य को समस्या का कोई साफ सबूत नहीं पाया.

साइड इफेक्ट

खसरा, मम्प्स, रुबेला (एमएमआर) और निमोकोकोल टीके के साइड इफेक्ट में बुखार और दौरा पड़ने के संभावित खतरे शामिल हैं. एमएमआर और हेपेटाइटिस ए के टीकों को पुरपुरा नाम के साइड इफेक्ट के साथ जोड़ा गया, जिसमें त्वचा के नीचे रक्त वाहिकाएं लीक करने लगती हैं. इसके अलावा इस बात के भी संकेत थे कि चेचक का टीका पाने वाले कम रोग प्रतिरोधी क्षमता वाले बच्चों को इंफेक्शन या अलर्जिक रिएक्शन हो सकता था.

रोटा वायरस के टीकों रोटाटेक और रोटारिक्स को इंटससेप्शन के साथ जोड़ा गया जिसमें आंत का एक हिस्सा दूसरे हिस्से में चला जाता है.लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा होने का खतरा बहुत ही दुर्लभ था. एक लाख मामलों में 1 से 5 मामलों में ऐसा होता था. ऊटा यूनिवर्सिटी की शोध विभाग की प्रमुख कैरी बाइंग्टन ने अपने संपादकीय में लिखा है, "बच्चों को नियमित रूप से रोग प्रतिरोधी टीका देने वाले क्लिनिक अधिकारियों ने अपनी प्रैक्टिस में इस तरह के मामलों का अनुभव किया होगा, खासकर बुखार के दौरों का, लेकिन सौभाग्य से ऐसे मामले कम थे और गंभीर स्थिति पैदा होने के कुछ समय बाद अधिकांश मामलों में ठीक हो जाने की संभावना थी. "

कोई मौत नहीं

2010 से 2013 तक किए गए शोध में जिसमें 67 अध्ययनों को शामिल किया गया, मौत के कोई मामले नहीं पाए गए. शोध में शामिल हर अध्ययन में एक कंट्रोल या तुलनात्मक ग्रुप था और उसमें 2011 तक अमेरिकी बाजार के लिए स्वीकृत टीके शामिल थे. रिपोर्ट में बंद कर दिए गए पोलियो के टीकों का खाने की एलर्जी से कोई रिश्ता नहीं पाया गया. इसी तरह बचपन में दिए जाने वाले टीकों और ल्यूकीमिया के मामलों के बीच भी कोई संबंध नहीं था. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एमएमआर टीकों का ऑटिज्म से कोई संबंध नहीं है.

इस व्यवस्थित रिव्यू में अमेरिकी टीका रिपोर्टिंग सिस्टम में की गई शिकायतों को शामिल नहीं किया गया है जिनमें एकल व्यक्तियों या स्वास्थ्य अधिकारियों ने संदह होने पर टीके के बारे में रिपोर्ट की थी. रिपोर्ट की सह लेखिका मार्गरेट मेगलियोने ने कहा, "हमने इस डाटा को इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि वहां कोई तुलनात्मक ग्रुप नहीं था और उसकी वैधता या विश्वसनीयता को आंकने का मौका नहीं था." रिपोर्ट में टीकों को अमेरिका में चेचक के खात्मे और पोलियो, खसरा, रुबेला और दूसरे संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण के लिए 20वीं सदी की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि बताया गया है.

एमजे/आईबी (एएफपी)