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ब्लॉग

टिकाऊ विकास के लिए हो ओलंपिक उम्मीदवारी

भारत 2024 ओलंपिक खेलों की मेजबानी पर विचार कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के प्रमुख थोमस बाख इस महीने पीएम नरेंद्र मोदी से मिल रहे हैं. महेश झा का कहना है कि भारत को बड़े आयोजनों की तैयारी का अनुभव मिलेगा.

थोमस बाख जर्मनी के हैं. वे जर्मनी के खेल आयोजनों के साथ पहले भी जुड़े रहे हैं और चयन की प्रक्रिया के जोड़ तोड़ से वाकिफ हैं. जर्मनी ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी है. हैम्बर्ग 2024 में ओलंपिक खेलों का आयोजन करवाने की अपनी योजना के साथ दौड़ में हैं. भारत को अभी पता भी नहीं है कि उसे मेजबानी चाहिए या नहीं. थोमस बाख के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत सूचना के हिसाब ज्ञानवर्धक और प्रोत्साहनजनक हो सकती है.

जर्मनी की उम्मीदवारी के सिलसिले में कुछ बातें दिलचस्प और सीखने वाली हैं. फैसला सरकार ने नहीं बल्कि राष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने किया. बर्लिन और हैम्बर्ग के बीच टक्कर कांटे की थी और फैसला 33 ओलंपिक खेल संघों ने बहुमत से किया. 18 हैम्बर्ग के पक्ष में थे, 11 बर्लिन के लिए और 4 दोनो के समर्थन में. व्यापक बहस व्यापक समर्थन का आधार बनती है. इस तरह आयोजनों से आम लोगों को दिक्कत होती ही है, उनके समर्थन से इस तरह के आयोजन की लोकप्रियता बढ़ जाती है. इसलिए अंतिम फैसला हैम्बर्ग की जनता एक जनमत सर्वेक्षण में करेगी जिसका आयोजन संभवतः सितंबर में होगा.

ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों का एक लक्ष्य शहरों के ढांचे में विशाल निवेश भी है. लंदन ने 2012 में शहर के एक खस्ताहाल हिस्से को चकाचक कर दिया था. हैम्बर्ग का भी यही लक्ष्य है. बड़े और महंगे खेल के बदले पर्यावरण सम्मत और निरंतरता पर आधारित खेल. थोमस बाख खुद बर्बादी के खिलाफ हैं. भविष्य में ऐसे स्टेडियम, रास्ते और घर नहीं बनाए जाएंगे जो महा आयोजन के बाद बर्बाद हों. भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान खेलगांव के इस्तेमाल का अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया है.

हैम्बर्ग यूरोपीय संघ की पर्यावरण राजधानी रहा है. इस अनुभव का लाभ वह ओलंपिक की मेजबानी के लिए भी उठाना चाहता है. खिलाड़ियों के रहने का इंतजाम इस तरह किया जाएगा कि बाद में वहां आम लोगों के रहने की जगह हो. घर ऐसे बनाए जाएंगे कि ज्यादा बिजली खर्च न हो. पानी का किफायती इस्तेमाल भी हैम्बर्ग की टिकाऊ योजना का हिस्सा है. भारत जैसे देश अगर इस तरह का अनुभव करते हैं तो उसका इस्तेमाल देश के दूसरे इलाकों में भी टिकाऊ विकास के लिए किया जा सकेगा.

ओलंपिक खेलों पर होने वाला खर्च भी एक मुद्दा है. ओलंपिक विरोधियों का कहना है कि खेलों के आयोजन पर 3 से 6 अरब यूरो खर्च होंगे. हैम्बर्ग ने आधिकारिक आंकड़ा नहीं दिया है लेकिन बर्लिन ने आयोजन के लिए 2.5 अरब यूरो का आकलन किया था. यह उस 25 अरब यूरो से बहुत कम है जो रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने सोची के शीतकालीन ओलंपिक पर खर्च किया था. हालांकि सही आंकड़े नहीं बताए गए लेकिन रिपोर्टों के अनुसार भारत ने कॉमनवेल्थ खेलों पर 10 अरब डॉलर खर्च किए थे.

भारत के लिए इसका मतलब यह होगा कि ओलंपिक के आयोजन पर करीब 60,000 करोड़ रुपये से ज्यादा ही खर्च होंगे. खेल आयोजन विकास का मोटर बनते हैं. भारत को विश्वस्तरीय ढांचागत संरचना की जरूरत है. वह ओलंपिक जैसे आयोजन का फायदा उठा सकता है. यहां तक कि उम्मीदवारी के लिए होने वाली तैयारी का भी इस्तेमाल टिकाऊ विकास के लिए अनुभव जुटाने के लिए किया जा सकता है. लेकिन दूसरी ओर ब्राजील का उदाहरण है जहां की सरकार को अपार खर्च के कारण लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ी है. यदि लोगों की सहमति और उनके सहयोग से ओलंपिक का आयोजन हो तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. आयोजन की तैयारी में लंदन और हैम्बर्ग भारत की मदद कर सकते हैं.

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