1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

"टाइगर रिजर्व में आदिवासियों को नहीं मिलेंगे अधिकार"

भारत सरकार ने राज्यों को बाघ अभयारण्य में रहने वाले लोगों और आदिवासियों को कोई भी "अधिकार" न देने के निर्देश दिये हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक सरकार का यह आदेश कमजोर तबके को चोट पहुंचा सकता है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने दो हफ्ते पहले राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर अधिकारियों से वन अधिकार कानून के तहत राष्ट्रीय उद्यान या अभ्यारण्य क्षेत्र में आदिवासियों और अन्य लोगों के अधिकार निलंबित करने को कहा कहा था. कुल 17 राज्यों को जारी किये गये इस नोटिस में कहा गया है, "राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्य पर दिशानिर्देशों के अभाव में इन बाघ क्षेत्रों में कोई भी अधिकार नहीं दिये जायेंगे."

वन्य अधिकार कानून (एफआरए) 2006, आदिवासियों और वनों में रहने वालों को फसल और वन संसाधनों का उपयोग कर अपनी परंपरागत आजीविका बनाये रखने का अधिकार देता है. इस कानून से देश की 1.2 अरब की कुल जनसंख्या के पांचवें हिस्से को लाभ मिलने की उम्मीद थी. लेकिन इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका और अब राज्यों और आदिवासी समुदायों के बीच भी संघर्ष बढ़ता नजर आ रहा है.

भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और देश में जमीन की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है. ऐसे में भूमि की कमी के चलते वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ता रहा है. वहीं वन्यजीवों मसलन बाघ, हाथी और गैंडे जैसे पशुओं के लिये आरक्षित जमीन पर भी आदिवासी रहते हैं और अक्सर इनके टकराव के मामले सामने आते हैं.

गैरलाभकारी संस्था फांउडेशन फॉर इकोलॉजिकल सेक्योरिटी के बृजेश दुबे के मुताबिक यह नया आदेश इन कमजोर और संवेदनशील तबकों में केवल संघर्ष को बढ़ायेगा. उन्होंने कहा कि अब ज्यादा लोग इन जगहों से बेदखल होंगे, क्योंकि सरकार यह दिखाना चाहती है कि उसे बाघों की कितनी चिंता है. उन्होंने कहा कि अब तो साबित हो चुका है कि आदिवासी समुदाय न केवल अवैध शिकार को रोकने में मदद करते हैं बल्कि संरक्षण के प्रयासों में साथ भी देते हैं.

देश में तकरीबन 3,200 बाघ हैं. वन्य जीवन पर्यटन आर्थिक मोर्चे पर देश के लिये काफी लाभकारी साबित होता रहा है लेकिन इस पर संरक्षकों में मतभेद है. कुछ का मानना है कि पर्यटन से पशुओं के इलाकों में अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता है.

विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी की नेता वृंदा करात ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस आदेश को वापस लेने के लिये पत्र लिखा है. अपने पत्र में करात ने कहा है कि यह खुलेआम ऐसे कानून की अवेहलना है जो आदिवासियों और वनों में रहने वालों को अधिकार देते हैं.

एए/आरपी (रॉयटर्स) 

DW.COM

संबंधित सामग्री